होली मनाने की पुरातन परंपरा बनाम आधुनिक परंपरा

  • 2016-03-25 03:30:35.0
  • राकेश कुमार आर्य

भारतवर्ष के प्राचीन समाज में होली मनाने की प्राचीन परंपरा से वर्तमान परंपरा की यदि तुलना की जाये तो आज की होली मनाने की प्रचलित परंपरा अत्यंत निम्न कोटि की ही परंपरा कही जायेगी। प्राचीन काल में ऋषि लोग इस पावन पर्व पर विशाल यज्ञों का आयोजन किया करते थे। इन विशाल यज्ञों में सर्वजन कल्याणार्थ आहुतियां अर्पित की जाती थीं। यही विशाल यज्ञ धीरे-धीरे सारे गांवों और नगरों के सामूहिक यज्ञ बन गये। जिन्हें हम आजकल सामूहिक होलिदा दहन कार्यक्रम के रूप में देखते और मनाते हैं। वास्तव में यह परम्परा पुराणकाल की है।

इस काल में भी यह बात विशेष रूप से उल्लेखनीय और अच्छी रही कि सारा गांव एक ही होलिका का दहन करता था और कोई ब्राह्मण कुछ न कुछ मंत्रों का उच्चारण कर वातावरण को अच्छा बनाने का प्रयत्न करता था। इसके पश्चात् यह प्रक्रिया भी क्षीण से क्षीणतर होती चली गयी। जिसने आज का विकृत और घिनौना स्वरूप ले लिया।

आजकल तो गांवों में सारे गांव की एक होली नहीं जलती, अपितु मुहल्ले-मुहल्ले की अलग-अलग होली जलती हंै। यह प्रवृत्ति हमारी विखंडित सोच की सूचक है। कृति में विखंडन, वृत्ति के विखण्डन का परिणाम है। होली तो समाजवाद की दिशा में हमारे ऋषि पूर्वजों द्वारा उठाया गया एक सराहनीय पग था। क्योंकि इस दिन सभी लोग गले मिलकर और प्रकृति से रंग और उल्लास के गुणों को ग्रहण कर उन्हें एक दूसरे पर बिखेरकर यह प्रकट करते थे कि हम सब एक हैं और हमारे बीच किसी प्रकार का कोई मनोमालिन्य नही है।

होली मनाने की पुरातन परंपरा बनाम आधुनिक परंपरा

व्यक्ति ईष्र्या और द्वेष की घृणित वृत्ति को इस पर्व पर अग्नि को समर्पित कर हृदय की शुद्घता और पवित्रता पर ध्यान केन्द्रित करता था। इस प्राचीन परंपरा के स्थान पर आजकल व्यक्ति ईष्र्या और द्वेष के सर्प को पूरे वर्ष दूध पिलाता है और होली आने तक उसे पूर्णरूपेण पाल-पोसकर नवयुवक बना डालता है। यौवन की मदोन्मत्तता उसे किसी से गले मिलने को नहीं अपितु किसी का गला काटने के लिए प्रेरित करती है।

अत: आज के दूषित परिवेश में इस पर्व की पावनता को मानव की प्रतिशोध् की भावना ने इस प्रकार विषैला बना डाला है। वाह रे, आधुनिक सभ्य मानव! तेरी जय हो। अरे, मूर्ख! यह पर्व तुझे तोडऩे की नहीं जोडऩे की शिक्षा देता है। गले काटने का घिनौना खेल छोड़, मानव मन से नाता जोड़, वैर विरोध् की प्रतिशोध् की प्रवृ मन से नाता जोड़, वैर विरोध् की प्रतिशोध् की प्रवृत्ति छोड़, इस पर्व के माध्यम से सामाजिक समरसता की स्थापना में सहायक बन और भारत की संस्कृति के मानवीय पक्ष को उद्घाटित करता हुआ संसार को इस पर्व की भावना के साथ जोडऩे का पुनीत कार्य कर।

आज होली मनाने में लोग निंदनीय कृत्य करने लगे हैं। पहले शराब पी जाती है, फिर एक दूसरे के साथ गाली-गलौच की जाती है। कई लोग मद्यपानादि के खेल में मस्त हो जाते हैं तो कई जुआ जैसे खेलों में स्वयं को व्यस्त कर लेते हैं। प्राचीन काल में हमारे ऋषि लोगों ने इस पर्व पर पुष्पों के इत्र को एक दूसरे पर छिडक़ कर जीवन की सुगंध् को पुष्पों की सुगंध् से द्विगुणित करने की अच्छी परंपरा को विकसित किया था। आज मानव मष्तिष्क में एक दूसरे के प्रति ईष्र्या और द्वेष की कीचड़ की सड़ांध् भरी हुई है। इसलिए पुष्पों के इत्र के स्थान पर कीचड़ प्रयुक्त होने लगा है। पढ़ा-लिखा व शहरी बाबू अंग्रेजी शिक्षा दीक्षा में पल-पढक़र अधिक मूर्ख और चतुर हो गया है। वह कूटनीतिक अंदाज में व्यवहार करता है। इसी को ये लोग चतुरता और अपना बुद्घि-कौशल समझते हैं। उनका जीवन छल-कपट की नीतियों का ही पर्याय बन गया है।

छल-कपट को कूटनीति से जोडक़र कूटनीति को स्वयं पर भी लज्जा आती है। छल-कपट का नाम यदि कूटनीति होता तो इन मूर्खों को पता होना चाहिए कि फिर इसे राजनीति के साथ जोडक़र न देखा जाता और इसका नाम भी तब कपट-नीति ही होना चाहिए था। वस्तुत: ऐसा नहीं है।

खैर...शहरी बाबू की बात पर ही आते हैं। ये लोग भी भीतर से कलुषित होते हैं, अत: उसी कालुष्य का परिचय इनके व्यवहार में होता है। इनके पास इत्र के स्थान पर ऐसे रंग व गुलाल होते हैं जो हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत ही घातक हैं। अब यही गुलाल और इससे भी निम्न स्तर के रंग हमारे गांवों में भी प्रचलित हो चले हैं। कहने का अभिप्राय है कि इस पर्व की पावनता और उच्च परंपरा काल के थपेड़ों में घिस-पिटकर इतनी विद्रूपित हो गयी है कि उसे पहचानना तक कठिन हो गया है।
होली मनायें तो कैसे:

होली रंगों का त्यौहार है। रंग हमारे उत्साह और उल्लास से गहन संबंध् रखते हैं। यौवन में उत्साह अधिक होता है तो उस समय वस्त्र भी मनुष्य को चटक रंग के ही प्रिय लगते हैं। तत्पश्चात् ज्यों-ज्यों प्रौढ़ता आती चली जाती है त्यों-त्यों कपड़ों के रंगों के प्रति भी हमारा दृष्टिकोण परिवर्तित होता चला जाता है। ये रंगों का त्यौहार हमारे उत्साह को, कार्य को, लगन को, जीवन को अपने ध्येय के प्रति पूर्णत: समर्पित करने की भावना के साथ प्रतिवर्ष आता है। हमारा हृदय और मस्तिष्क पुष्पों के इत्र की भांति उच्च विचारों से सुगंधित हो, उच्च विचारों की सुगंध् से हमारा जीवन भी सुगंधित हो यह संदेश पावन पर्व होली का होता है। हमें इसी संदेश को अपने जीवन में यथावत उतार लेना चाहिए। होली पर यदि हमने किसी को अपने गले लगाया है तो उससे हृदय भी लगा लें। कहने का अभिप्राय है कि हृदय में भी उस व्यक्ति के प्रति कोई दुर्भाव ना रखें। ऐसी भावना से जब होली का पर्व मनाया जाता है तो इसका वास्तविक संदेश लोगों के बीच भाईचारा पैदा करता है जिससे वास्तविक समाजवाद स्थापित होता है। अपने बच्चों को इस पर्व का वास्तविक अर्थ समझाकर जीवन के परम सत्य की ओर बढऩे के इसके निहित संदेश को उन्हें समझाएं। परिवार के लोग आबाल-वृद्घ मिल बैठकर यज्ञ का आयोजन करें। यज्ञ में अपने परिवार में भी ऐसी दुश्प्रवृत्तियों को अग्नि के समर्पित कर दें जिनसे परिवार का परिवेश पूरे वर्ष भर में कभी भी प्रदूषित हुआ हो अथवा जिसके कारण कहीं न कहीं कोई गतिरोध् उत्पन्न हुआ।

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