‘हिन्दुत्व’ के ये नये व्याख्याकार

  • 2015-11-09 02:53:10.0
  • राकेश कुमार आर्य

hindu-rashtra-1‘आज तक’ टी.वी. चैनल पर आचार्य धर्मेन्द्र, प्रमोद कृष्णम् व उनके साथ कुछ अन्य धर्माचार्यों की बहस सुन रहा था। बहस का विषय था-क्या सांई भगवान हो सकते हैं? बहस के समय आचार्य धर्मेन्द्र ने धर्म की सर्वव्यापक और पंथनिरपेक्ष परिभाषा रखते हुए हुए कहा कि धर्म वह है जो हमें धारण करता है। हमें धारता है हमें सामाजिक नैतिक मर्यादाओं में रखता है। इस प्रकार जिसके धारण करने से हमारा सामाजिक, नैतिक, आत्मिक एवं आध्यात्मिक उत्थान एवं कल्याण हो वह धर्म है। धर्म अनेक नही हो सकते, मानव धर्म एक ही हो सकता है।

प्रमोद कृष्णम् ने अनेक धर्मों की बात कही और सर्वसमन्वय को हिंदुत्व का प्रमुख गुण बताते हुए और इसके विराट स्वरूप की कल्पना करते हुए कहा कि यह इतना उदार है कियह सबको अपने भीतर समाहित कर लेता है। यदि इसका  यह गुण समाप्त हो गया तो हिंदुत्व समाप्त हो जाएगा।

प्रमोद कृष्णम्  का यह कथन हिंदुत्व की उन्हीं प्रचलित बातों को प्रकट करता है, जिनके कारण इसे पिछले लंबे समय से कष्ट उठाने पड़े हैं और नष्ट होना पड़ा है। ंिहन्दुत्व सर्वसमन्वयी अवश्य है परंतु उनके साथ है, जो इसे नष्ट नही करना चाहते, जो इसे नष्ट करना चाहते हैं उनसे अपनी रक्षा के लिए यह उग्र भी है, पता नही इस तथ्य को क्यों लोग भूल जाते हैं? जो लोग इसे उदार कहकर ऐसा स्थापित करने का प्रयास करते हैं कि अगला जो कुछ करना चाहे वह करता रहे, पर तुम्हें कुछ नही कहना, वह भी इसके शत्रु हैं। सही बात यह है कि इस सर्वसमन्वयी और उदार जीवन व्यवस्था के प्रतीक हिन्दुत्व के आदर्शों और मूल्यों के प्रति दूसरों को भी सर्वसमन्वयी और उदार रहना चाहिए, और उसके लिए प्रमोद कृष्णम्  जैसे लोगों को उन पर दबाव बनाना चाहिए।

प्रमोद कृष्णम् के दुर्बल तर्कों पर आचार्य धर्मेन्द्र ने बहस में ही उन्हें लताडऩा आरंभ किया। वास्तव में प्रमोद कृष्णम् जैसे हिंदुत्व के कई व्याख्याकार देश में बड़ी तेजी से उभरकर आये हैं, इन पर पैसे लेकर हिंदुत्व के विरूद्घ बोलने का आरोप लगता रहा है। जिससे ये हिन्दुत्व का भला करने के स्थान पर उसे क्षति अधिक पहुंचा रहे हैं।

यह दुख का विषय है कि जो लोग धर्म की परिभाषा तक को कहीं जानते वे ‘धर्माचार्य प्रमुख’ बन जाते हैं और जनता के पैसों का दुरूपयोग निहित स्वार्थ में करते हैं। कपड़ों और दाढ़ी का ‘ट्रेडमार्क’ अपनाते ही ये लोग अपने आपको धर्माचार्य प्रमुख मानने लगते हैं और धर्म व समाज का अहित करने लगते हैं। इन लोगों को आर्यत्व अर्थात हिंदुत्व के मर्म की भी जानकारी नही होती उसका इतिहास पता नही होता। बस, एक बात पता होती है कि हिंदुत्व उदार है। सर्व समन्वयवादी है, और सबको फलने फूलने का अवसर देता है। इसलिए इनकी परिभाषा के अनुसार ईसाई और इस्लाम वाले हिंदुत्व को और उसके कलेजा को खाते रहें तो इनके अनुसार ‘सब चलेगा।’

जबकि सच यह है कि हिंदुत्व पारसी जैसे संप्रदायों को फलने फूलने दे सकता है, जैनियों, बौद्घों से उसे कोई शिकायत नही है, क्योंकि ये हिंदुत्व के शत्रु नही हैं, उसे मिटाना इनका उद्देश्य नही है। पर ईसाइयत और इस्लाम हिंदुत्व को जड़ से मिटाना चाहते हैं। इतिहास इसके अनेकों प्रमाणों से भरा पड़ा है। प्रमोद कृष्णम् जैसे लोगों को इतिहास का भी अवलोकन करना चाहिए और वर्तमान परिस्थितियों पर भी चिंतन करना चाहिए जिनमें ईसाइयत और इस्लाम हिंदुत्व को मिटा रहे हैं। इन जैसे लोगों के पास पूर्वोत्तर भारत में ईसाइयत की गतिविधियों के कारण मिट रहे ‘हिंदुत्व’ को बचाने का कोई उपाय नही है, ना ही कश्मीर में दम तोड़ रहे हिंदुत्व की रक्षा का कोई मार्ग है। उन्हें यह भी पता नही है कि हिंदुत्व की सर्वसमन्वयवादी और उदारता परिभाषा के बार-बार रटते रहने से संपूर्ण भूमंडल पर चक्रवर्ती राज करने वाले आर्यों का संपूर्ण वैभव और गौरव कैसे क्षीण होता चला गया? हम उनको कलेजा लगाते रहे और वे आकर हमारा कलेजा खाते रहे। देश के एक नही अनेकों टुकड़े हुए और हम आज भी वही मूर्खतापूर्ण बयान देते जा रहे हैं कि सर्वसमन्वयवाद और उदारता हिंदुत्व के महान गुण हैं, यह इसके विराट स्वरूप के लक्षण हैं, जो इसे मिटने नही देते, परंतु सच ये है कि हिन्दुत्व अपने इन्हीं सद्गुण विकृतियों के कारण ही मिटा है। आज इन्हीं बातों को फिर प्रश्रय देना मूर्खता होगी, और यदि उसी मूर्खता की वकालत प्रमोद कृष्णम्  जैसे लेाग करते हैं तो मानना पड़ेगा कि ये हिंदुत्व के अज्ञानी व्याख्याकार हैं।

प्रमोद कृष्णम् जैसे लोग हिंदुत्व के ऐसे व्याख्याकार हैं जो काश्मीर में इस्लाम के द्वारा मिटाये जा रहे हिंदुओं और पूर्वोत्तर भारत में चल रही ईसाई मिशनरियों के राष्ट्रविरोधी कृत्यों के विरूद्घ बोलने का साहस नही कर पाते। हिंदुत्व अपने धर्माचार्य प्रमुखों से ऐसी कायरता की या दोगलेपन की नीतियों की अपेक्षा नही करता। वैसे प्रमोद कृष्णम् स्वयं को कल्कि का अवतार घोषित करने की तैयारी कर रहे हैं, और अपने आपको किसी प्रकार से ‘कृष्ण’ सिद्घ करना चाहते हैं। पर उन्हें ज्ञात होना चाहिए कि कृष्ण दुष्टों के संहार और सज्जनों के उत्थान के लिए सदा सचेष्ट और सक्रिय रहे। क्या वह ऐसा कर पा रहे हैं? वह तो मनुष्य की राक्षसी वृत्तियों का समर्थन कर राक्षस पन को और बढ़ावा दे रहे हैं। इसलिए यह सर्वमान्य होने पर भी कि सांई मुस्लिम था और वह हिंदू समाज के प्रति घृणा  का भाव भी रखता था, इसलिए वह हिंदू समाज के लिए पूजनीय नही हो सकता, प्रमोद कृष्णम् सांई को भगवान मानकर उसे हिंदुओं का इष्टदेव बनाने की बात कहकर हिंदुत्व का विनाश करने पर तुले हैं।

आचार्य धर्मेन्द्र ने उक्त बहस को सही दिशा देने का प्रयास करते हुए सांई समर्थकों को निरूत्तर कर दिया। उन्होंने कहा कि सांई मुस्लिम था और उसके मुस्लिम होते हुए आप उसे तनिक ‘खुदा’ कह दो या कोई सांई भक्त अपने मस्तक पर ईसाइयत का क्रास और मुस्लिमों का ‘चांद सितारा’ का धार्मिक चिह्न लगाकर चलके दिखाए, उसे आटे-दाल का भाव पता चल जाएगा। फिर यह हिंदुत्व के साथ ही क्यों होता है कि कोई भी व्यक्ति आकर कह देता है कि मैं भी भगवान हूं? मुझे भी पूज लो। यह तो निरा अत्याचार है। अत्याचार को किसी ‘उदारता’ या ‘सर्व समन्वयवाद’ के नाम पर झेलना उचित नही है।

हिंदू समाज को किसी भी ऐसे व्यक्ति को अपना प्रवक्ता बनाने से रोकना चाहिए जिस पर ‘भाड़े पर’ बोलने का आरोप लगता हो। इन लोगों का वैदिक धर्म के विषय में कुछ भी ज्ञान नही होता और  न ही यह जानकारी होती है कि भारत के इतिहास को मिटाने के लिए हमारा किस प्रकार सर्वनाश किया गया है? दोहरे मानदण्ड और दोहरे-दोगले चेहरे लेकर बैठ जाना सबसे बड़ा ‘पाप’ है। राष्ट्र के प्रति अपराध और मानवता के प्रति अन्याय है। इन्हें ज्ञात होना चाहिए कि धर्म अनेकों पहचानो को एक पहचान में विलीन करने की प्रक्रिया का नाम है, और वह एक पहचान मानवता है। उस मानवता को मजहब ने विकृत किया है परिणामस्वरूप मजहब के दानवपन के कारण मानवता ईसाइयत, इस्लाम, हिंदू, बौद्घ आदि में विभाजित कर दी गयी है। हमें कोई आपत्ति नही होगी कि मानव की केवल मानवता को मुखरित करने के लिए कोई ऐसा सर्व स्वीकृत धर्म अपनाया जाए जो साम्प्रदायिक पहचानों को समाप्त करा दे, निस्संदेह वह धर्म वैदिक धर्म ही होगा। वेद के  पंथनिरपेक्ष स्वरूप की कल्पना को साकार करने के लिए प्रमोद कृष्णम् जितना संघर्ष करेंगे उतना ही वह ‘कल्कि अवतार’ बनते जाएंगे। पर वह जिस मार्ग पर जा रहे हैं उससे तो लगता नही कि वह कोई बड़ा कार्य कर पाएंगे? स्वार्थ व्यक्ति को नीचे गिराता है और यथार्थ ज्ञान व्यक्ति को महान बनाता है। आचार्य धर्मेन्द्र आर्य धर्म (हिंदुत्व) की सही व्याख्या करने के लिए बधाई के पात्र हैं।

राकेश कुमार आर्य ( 1581 )

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