हाईकोर्ट बैंच पर मुख्यमंत्री बोले...

  • 2015-12-15 03:29:52.0
  • राकेश कुमार आर्य

akhilesh yadavउत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बड़ी सावधानी के साथ परंतु स्पष्टतापूर्वक पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अधिवक्ताओं के लिए हाईकोर्ट की बैंच स्थापित करने की उनकी पुरानी मांग को अस्वीकार कर दिया है। इतना ही नही मुख्यमंत्री ने छोटे राज्यों की किसी मांग को भी खारिज कर दिया है और उत्तर प्रदेश के किसी अन्य विभाजन की संभावना से इंकार किया है। इससे जहां अधिवक्ताओं के आंदोलन को झटका लगा है, वहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग प्रदेश बनाने की मांग करने वाले लोगों को भी बुरा लगा है।

प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री यह भली प्रकार जानते हैं कि उन्हें प्रदेश की सत्ता की कमान सौंपने में पूर्वी उत्तर प्रदेश ने ही अधिक सीटें दी हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश ने उनका साथ अधिक नही दिया। इसलिए अच्छा यही होगा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अभी झटका ही दिया जाए। बिहार चुनाव परिणामों से उत्साहित प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री यादव को सत्ता में लौटाने की अपनी संभावनाएं फिर बलवती होती दीख रही हैं, इसलिए उन्होंने पूर्वांचल को अपनी झोली में डाले रखने के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों के लिए ‘दिल तोडऩे वाले’ राजनीतिक बयान दिये हैं।

वास्तव में जब कोई पार्टी सत्ता में आये और कोई व्यक्ति उसकी ओर से किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री का दायित्व संभाले तो उस पार्टी के और उसके मुख्यमंत्री के लिए अपेक्षित है कि वे नागरिकों को मध्य किसी प्रकार का विभेद उत्पन्न न करें। लोकतंत्र और पंथनिरपेक्षता का तकाजा यही है। परंतु भारत में कोई भी पार्टी इस स्वस्थ लोकतांत्रिक मूल्य की रक्षा नही कर पाई। इसलिए यहां शासन और प्रशासन की नीतियों में सदा पक्षपात बना रहा है। उत्तर प्रदेश में जिस पार्टी की सरकार आ जाती है उसी पार्टी  की समर्थक जातियों के लोगों और उसी के कार्यकर्ताओं के जमघट सरकारी कार्यालयों में होने लगते हैं। उनके कार्य सरकारी अधिकारी बड़े आराम से करने लगते हैं। यह प्रवृत्ति यद्यपि खतरनाक है परंतु उत्तर प्रदेश में एक सच के रूप में आसन लगाये बैठी है। इसलिए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने वही किया है जो उनसे अपेक्षा थी।

जहां तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट की बैंच की स्थापना की बात है तो यह मांग इस क्षेत्र के लोगों की बहुत पुरानी है। विश्व में लगभग आधा दर्जन देश ही ऐसे हैं जो जनसंख्या में उत्तर प्रदेश से बड़े हैं, पर उनके यहां अनेकों उच्च न्यायालय हैं, इतना ही नही जो उत्तर प्रदेश से (जनसंख्या में) छोटे देश हैं उनमें भी जनता के वादों के त्वरित निष्तारण के लिए अनेक उच्च न्यायालय हैं। वहां यह केवल जनता को सस्ता और सुलभ न्याय दिलाने के लिए ही किया जाता है। पर जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट की बैंच मांगी जाती है तो यहां के मुख्यमंत्री के द्वारा जनहित को गौण करके उसे उपेक्षित कर दिया जाता है। यह तो सरासर अन्याय है। पता नही जनता को हमारे मुख्यमंत्री कैसे सस्ता और सुलभ न्याय देंगे? वोटों की राजनीति ने सारी व्यवस्था का गुडग़ोबर करके रख दिया है।

यह सभी जानते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश पूर्वी उत्तर प्रदेश की अपेक्षा संपन्न है, और तो इसी कारण से इस क्षेत्र को हाइकोर्ट की बैंच नही दी जा रही। क्योंकि इसके संपन्न वादकारी जब हाईकोर्ट जाते हैं तो वहां के अधिवक्ताओं द्वारा उनसे मनमानी फीस ली जाती है। कितने ही होटलों में इन लोगों को रात में रूकना पड़ता है जिससे वहां के लोगों को इनसे पैसा ऐंठने का अवसर मिलता है। इस प्रकार जिन लोगों ने न्याय को अपनी आजीविका का साधन बना लिया है, उनके संरक्षक बनकर मुख्यमंत्री अखिलेश खड़े हो गये हैं। इस प्रकार सस्ते और सुलभ न्याय को महंगा और दुर्लभ न्याय कर दिया जाता है। शासन की नीतियां और संवैधानिक व्यवस्था चाहे जो हो पर यह सत्य है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के वादकारियों को महंगा और दुर्लभ न्याय ही मिल रहा है। हाइकोर्ट जाने के लिए गरीब वादकारी तो हिम्मत ही नही जुटा पाता। पर प्रदेश के समाजवादी मुख्यमंत्री के लिए ‘समाजवाद’ यही है किपश्चिमी उत्तर प्रदेश का गरीब किसान महंगे व दुर्लभ न्याय के लिए दो पाटों के बीच यों ही दला जाए।

जो लोग यह मान रहे थे कि प्रदेश का विभाजन हो जाने पर व पश्चिमी उत्तर प्रदेश अलग बन जाने पर हाईकोर्ट स्वयं ही मिल जाएगा, उन्हें भी मुख्यमंत्री के इरादों को समझना चाहिए। क्योंकि मुख्यमंत्री ने प्रदेश के किसी और विभाजन की किसी भी संभावना से इंकार किया है। इसका अर्थ स्पष्ट है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों को अपना अलग प्रदेश और हाईकोर्ट लेने के लिए अभी लंबी लड़ाई लडऩी होगी। इस सरकार के चलते उनकी मांगें पूर्ण नही होने वालीं। वैसे मुख्यमंत्री ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों की भावनाओं को ना समझकर और ‘न्याय’ का व्यापारीकरण करने की प्रक्रिया को बलवती करके लोगों के साथ अन्याय ही किया है।

जहां तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाइकोर्ट की बैंच की स्थापना के लिए संघर्ष कर रहे वकीलों का प्रश्न है तो इनकी संघर्ष समिति में ऐसी विभिन्न दम्भी प्रतिभाओं ने अपना स्थान बना लिया है जिनके अपने-अपने अहम परस्पर भिड़ रहे हैं। इन्हें किसी एक मंच पर आप बैठे हुए नही देख सकते। मंच संचालन के लिए भी झगड़ते हैं और वकील एकता का नारा लगाकर भी वकीलों में परस्पर ‘जूतम-पैजार’ कराते हैं। जिससे हाईकोर्ट की बैंच की स्थापना संबंधी संघर्ष प्रभावित होता है और लोगों के लिए वकीलों का संघर्ष उपहास का पात्र बनकर रह जाता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वकीलों की संघर्ष समिति अपने आंदोलन को इसीलिए जनसंघर्ष नही बना पायी कि इसकी अहम की लड़ाई कभी भी शांत नही हो पाती। अब ऐसे नेता जिस संगठन के हों उससे आप क्या अपेक्षा कर सकते हैं?

इन सबके बीच भाजपा ने अच्छा संकेत दिया है कि वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अलग हाईकोर्ट बैंच की स्थापना की समर्थक है। जबकि बसपा पहले ही अपना वकील समर्थक दृष्टिकोण स्पष्ट कर चुकी है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश विकास पार्टी इस क्षेत्र को अलग प्रांत बनाने के लिए अपनी जनचेतना बैठकों का आयोजन कर रही है, तो ऐसे में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों के लिए वकीलों के लिए उचित होगा कि वे आगामी चुनावों में लोगों का जनसमर्थन ऐसी पार्टी को दिलायें जो उनकी उन मांगों को पूर्ण कराने का आश्वासन दे। अच्छा हो कि भाजपा और बसपा एक साथ एक मंच पर आयें और जनहित से जुड़ी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों की मांगों को पूर्ण करें।

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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