महान कलाम को सलाम

  • 2015-07-29 02:15:35.0
  • राकेश कुमार आर्य

A P J abdul kalamसंपूर्ण मानवता के लिए दुख और शोक की घड़ी है कि भारत के पूर्व राष्ट्रपति और भारत रत्न डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम नही रहे। एक ऐसा महान व्यक्तित्व जिसे किसी प्रकार की संकीर्णताएं बांध नही सकीं, जिसे भाषा ने रोका नही और संप्रदाय ने टोका नही, जिसकी मानवता सदा ऊपर रही और जो आत्मिक प्रेरणा से प्रेरित होकर मानवता की सेवा करता रहा, जो गरीबी से झुका नही-अभावों में रूका नही और जीवन के बीहड़ जंगलों में जिसने अपना मार्ग स्वयं प्रशस्त किया, जो लक्ष्य से भटका नही, ऐषणाओं में अटका नही और शांत-निभ्र्रांत हो जीवन पथ पर आगे बढ़ता रहा... बढ़ता रहा, उस कलाम के बिना आज देश सूना है। मानवता कराह रही है और आसमान रो रहा है।

जिसके रोम-रोम में भारत बसा था, जिसके रोम-रोम में रामायण का काव्य रमा था, जिसके रोम-रोम में गीता का संदेश रचा था, जिसके हृदय में ज्ञान की अनंत प्यास थी और जिसके पास था उस प्यास को बुझाने का शांति प्रदायक उपाय। जिसने वेद को अपना माना, कुरान को अपना जाना, बाइबिल को अपना माना, और उनके सारतत्व से अपने दिव्य जीवन का निर्माण किया, उस कलाम के बिना आज हर दिल का हर कोना सूना है।

जिसकी हर सांस में भारत था, जिसके हर प्रयास में भारत था, जिसकी हर आश में भारत था, जिसका आवास भारत था, प्रवास भारत था, उपवास भारत था, हास भारत था, परिहास भारत था, उस कलाम को आज ‘भारत रत्न’ सलाम कर रहा है। क्योंकि ऐसे कितने लोग हैं जिन्हें ‘भारत रत्न’ मिला, पर फिर भी लोगों ने कहा कि इस व्यक्तित्व के सामने तो ‘भारत रत्न’ भी छोटा है।

गरीबी और अभावों से जूझता एक सिपाही, जिसका कोई नही था हमराही, जिसे मार्ग दिखाती आशा ही, जिसने क्षितिज पर एक नई आभा को जन्म दिया और उस आभा के लिए जीवन भर संघर्ष किया, वह दिव्य जीवन का पथिक और दिव्यता का उपासक मानवता का मसीहा बन गया, और तेजस्विता का साधक। आज उस दिव्यात्मा के लिए शब्द कम पड़ रहे हैं। शब्दकोश कम पड़ रहे हैं, कहां से और कैसे शब्द लाकर उस महामानव को श्रद्घांजलि दी जाए, कुछ समझ नही आता।

डा. कलाम सचमुच एक ऐसे इंसान थे, जिन्हें पाकर इंसानियत जिन्दा हो गयी थी, दिव्यता जीवित हो गयी थी। उनके बालों ने उन्हें निरालापन दिया, उनके विनम्र स्वभाव ने उनकी सौम्यता और शालीनता को नयी परिभाषा दी और उस परिभाषा का नाम लोगों ने ‘कलाम’ समझ लिया। आज जब वह दिव्य जीवन कहीं अनंत में विलीन हो गया है तो लोग अपने द्वारा गढ़ी गयी परिभाषा को ही समझने का प्रयास कर रहे हैं कि उसे कलाम कहें या सलाम कहें? कलाम सलाम में विलीन हो गया और सलाम कलाम का रूप हो गया-इतना उच्च जीवन मिलना और सबके प्रेम का भाजन बनना हर किसी के वश की बात नही है।

पतंग उड़ाने वाला एक बच्चा देश के सुदूर दक्षिण में रामेश्वरम् में अपने जीवन का शुभारंभ करता है और पतंग उड़ाते-उड़ाते मां से कह बैठता है कि-‘मां! एक दिन मैं भी उडूंगा।’ मां बच्चे की बचपन की बात को यूं ही उड़ा देती है, पर वह बच्चा कोई साधारण बच्चा नही था। वह उठा और उठकर एक दिन उसने सचमुच उडऩा आरंभ कर दिया। पहले सपनों में उड़ा-फिर सच में उड़ा, और इतना उड़ा कि सारे भारत को अपने साथ उड़ाने लगा। देश के लिए सोचता था, मानवता के लिए सोचता था और कभी किसी प्रकार की संकीर्णता से स्वयं को बांधता नही था, वह महामानव देश को 2020 ई. तक एक विकसित राष्ट्र बनाने के लिए संकल्पित था। ‘वामन से विराट’ बना मानवता का सम्राट बना यह दिव्य जीवन अनंत में विलीन होने से पूर्व अंतिम क्षणों तक कर्मशील रहा। उसकी कर्मठता और कर्मशीलता युग-युगों तक के लिए भारत की माटी के साथ एकाकार हो गयी है। जब भी कोई जिज्ञासु इस माटी से कर्मठता और कर्मशीलता को खोजने की कोशिश भविष्य में करेगा तो उसे इस मिट्टी से कलाम की खुशबू अवश्य आएगी।

लोग मिट्टी में मिल जाने को जीवन का अंत समझ लेते हैं, जो लोग वक्त के सांचों में ढल जाते हैं-उन्हीं के लिए यह बात सच है, पर जो लोग वक्त के सांचे बदल जाते हैं उनके लिए मिट्टी में मिल जाना भी जीवन के संगीत को हर जिज्ञासु हृदय में उतार देने के समान होता है। बहुत बड़ी साधना का फल होता है यह। कलाम इस साधना में सफल रहे तभी आज सारा देश भारतमाता के इस सच्चे सपूत को अपनी विनम्र श्रद्घांजलि अर्पित कर रहा है। जिस साधना के लिए कलाम जिये उसे यह कृतज्ञ राष्ट्र युग-युगों तक स्मरण रखेगा। उनका प्रकाशमयी जीवन देश को ही नही अपितु सारी मानवता को रास्ता दिखाएगा। कम ही लोगों के जीवन में ऐसे अवसर आया करते हैं जब इतिहास उनके पास से झुककर निकलता है और रूककर उन्हें सलाम करता है। आज सारा देश देख रहा है कि खुद तवारीख अपने ‘महानायक’ को कंधा देकर उसे अपना सलाम कर रही है, और उसे सजा-संवारकर इतिहास के महानायक की पदवी से नवाज रही है। मां भारती के ऐसे सच्चे सपूत को ‘उगता भारत’ परिवार एवं समस्त पाठकों की ओर से कोटि-कोटि प्रणाम्।

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राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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