हमें सुपथ से ले चलें

  • 2016-05-08 14:10:17.0
  • विमलेश बंसल ‘आर्या’

अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम ॥ ऋ. 1/189/1
अर्थ—हे (देव) आनन्द के देने वाले (अग्ने) स्वप्रकाश-स्वरूप (विद्वान) सकल शात्रों के ज्ञाता परमेश्वर! आप (अस्मान) हम मोक्ष चाहने वाले लोगों को (राये) धनादि ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये (सुपथा) धर्मयुक्त सरल मार्ग से (विश्वानि) समस्त (वयुनानि) उत्तम-उत्तम ज्ञानों को (नय) प्राप्त कराइए। (जुहुराणमेन:) कुटिलता से उत्पन्न पाप को (अस्मत्) हम से (युयोधि) अलग कीजिए जिसमें हम (ते) आपकी (भूयिष्ठाम) बहुत अधिक (नम उक्तिम) सत्कार के साथ स्तुति का (विधेम) विधान करें।
सुपथ वही होता है जिसमें बाधायें न हों। बाधायें दो प्रकार की होती हैं। पहली बाधा मार्ग का टेढ़ा-मेढ़ा होना, ऊबड़-खाबड़ भूमि, झाडिय़ाँ, गड्ढे या कीचड़ आदि और जो सीधा न जाकर घुमावदार हो, उसे पार करने में विलम्ब होता है। दूसरे प्रकार की बाधा मार्ग में चोर-उचक्के और हिंसक प्राणियों का होना है। ऐसे मार्ग से यात्रा करना संकट को जान बूझकर मोल लेना है।
मनुष्य का जीवन एक पथ ही तो है और हम उसके पथिक बन अपने गन्तव्य की ओर जा रहे हैं। मार्ग सही है या गलत यह विचारणीय है। जिस मार्ग पर जाना है उसका ज्ञान और आने वाली बाधाओं का निवारण कैसे किया जाये इसका भी ज्ञान रहे तो फिर बिना किसी संकोच के उस मार्ग से चलते हुये अपनी मंजिल तक पहुंचा जा सकता है।
मानव जीवन की मंजिल पाने के लिये मार्ग का अनुगमन किया जाये या नया मार्ग खोजा जाये इसके लिये मत्र कहता है अग्ने नय सुपथा राये हे परमेश्वर! आप स्वयं हमारे पथ-प्रदर्शक बन कल्याण के मार्ग से ले चलिये। हम विषय-वासना के बीहड़ वन में कहीं भटक न जायें। हमने सुना है कि जो कोई तेरा दामन थाम लेता है, उसके मार्गदर्शक आप स्वयं बन जाते हो और उसे सत्य, धर्म और विज्ञान वाली सीधी राह दिखाते हुये अपनी मंजिल पर पहुँचा देते हो।
हे प्रभो! अपनी पवित्र वेदवाणी द्वारा आपने यह तो बता दिया कि सच्चाई का मार्ग कौन सा है और सच्चाई की पहचान यह है कि सत्य में श्रद्धा और असत्य में भय, शंका, लज्जा आदि का भाव रहता है। सत्य सदा सरल और असत्य में कुटिलता, छल, कपट आदि होते हैं। परन्तु कितने लोग हैं जो इन दो कसौटियों पर सत्यमार्ग की पहचान करते हैं। प्राय: लोग गतानुगतिको लोक: भेड़ चाल चलने वाले होते हैं।
धर्म क्या है? इस विषय में अधिकांश लोग भ्रमित हैं। धर्म व्यवस्था के संस्थापक मनु महाराज कहते हैं—वेदोऽखिलो धर्ममूलम सारा वेद ही धर्म का मूल है। वेद में जिन कत्र्तव्य कर्मों का विधान किया है उसका पालन करना धर्म और इसके विपरीत चलना अधर्म है।
वेद के अनुकूल ऋषियों के जो ग्रन्थ हैं वे भी मान्य हैं। जहाँ उनका मत वेदों से पृथक् दिखाई दे वहाँ वेद ही प्रमाण मानने चाहियें। सज्जन, आप्त, धर्मात्मा वृद्ध जनों का आचरण भी धर्म ज्ञान में प्रमाण है। सबसे अन्त में शुद्धान्त:करण होने पर अपनी आत्मा जिस कार्य को करने के लिये साक्षी दे, उसे करना धर्म और उसके प्रतिकूल चलना अधर्म है।
हे प्रभो! इनका तो हम पालन करेंगे ही परन्तु आपकी सहायता के बिना सुपथ पर चलना हमारे अकेलों के वश की बात नहीं है। हम आपका सहयोग लेने के लिये अनुनय विनय कर रहे हैं।
हे परमेश्वर! विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् हमें उत्तम ज्ञान, विज्ञान की प्राप्ति कराइए जिससे हम स्वयं ही कुटिल मार्ग को छोड़ सुपथ पर चल सकें। जब हम अधर्म या असत्य के मार्ग पर चलते हैं उस समय यद्यपि आप सावधान करते हो परन्तु अन्त:करण के मलिन होने से हम इस चेतावनी को अनसुनी कर देते हैं। जब कभी अपनी गलती का ध्यान आता है उस समय तक बहुत देर हो चुकी होती है।
हमारा अन्त:करण कुटिल व्यवहार और पापकर्मों से इतना मलिन हो गया है कि कई बार आपकी चेतावनी सुनाई ही नहीं देती अत: युयोध्यस्मज्जुहुराणमेन: हमारे सभी कुटिल व्यवहार और पाप कर्मों को हम से पृथक् कीजिए। जब चित्त में आपके ज्ञान का प्रकाश हो जायेगा तब कुटिलता और पाप कर्म क्षणभर में भस्म हो जायेंगे। जहाँ आपका निवास नहीं है अर्थात् आपकी चेतावनी को लोग अनदेखी कर देते हैं वहीं अधर्म और असत्य की बेल फलती-फूलती है।
हे सत्यधर्म के प्रेरक प्रभो! भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम हम आपकी नम्रतापूर्वक स्तुति, प्रार्थना, उपासना कर रहे हैं।
हमें ऐसा बना दो प्यारे पिता जीवन में लगे ठोकर न कभी।
जाने अनजाने में हमसे नुकसान किसी का हो न कभी।।
आपके बताये सुपथ पर चलने से ही हमें अभ्युदय और नि:श्रेयस की प्राप्ति होगी। अग्ने नय सुपथा राये= हमें सुपथ अर्थात् कल्याण के मार्ग पर चलाइए।
-विमलेश आर्या