हमारे संविधान की प्रस्तावना

  • 2015-11-27 02:00:31.0
  • राकेश कुमार आर्य

inm_21012_p_consitutionहमारे संविधान की प्रस्तावना निम्न प्रकार है:-

हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न समाजवादी पन्थनिरपेक्ष लोकतन्त्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और  उपासना की स्वतन्त्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता, प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सबमें, व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता को सुनिश्चित करने वाली बन्धुता को बढाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज दिनांक 26.11.1949 मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी सम्वत

दो हजार छ: विक्रमी को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।’

‘समाजवादी पन्थनिरपेक्ष’ शब्द 1973 ई. में 42 वें संवैधानिक संशोधन के द्वारा लाये गये।

प्रस्तावना और संविधान का विरोधाभास भारतीय संविधान के संबंध् में हमारे जितने भी व्याख्याकार हैं वे सभी ‘हम भारत केलोग......’ शब्द समुच्चय की व्याख्या करते हुए लिखते हैं कि भारत के लोग ही सर्वोच्च प्रभुता रखते हैं। अत: संविधान का आधार उन लोगों का प्राधिकार है।

यदि यह व्याख्या सही है तो ऐसे व्याख्याकारों से हमारा प्रश्न है तब भारत को भारत ही माना जाये या भारत संघ, क्योंकि संविधान की प्रस्तावना भारत को ‘भारत’ ही कहती है-‘भारत संघ’ नहीं।

दूसरे, संविधान के अनुच्छेद एक में जम्मू कश्मीर भी भारत के राज्य क्षेत्र का अंग है। इसलिए भारत के सर्वोच्च प्रभुता सम्पन्न लोगों द्वारा बनाया गया संविधान स्वत: ही जम्मू एवं कश्मीर पर लागू हो जाता है। किन्तु व्यवहार में ऐसा नहीं है। तब प्रश्न उत्पन्न होता है कि भारत के लोगों की सर्वोच्च प्रभुता को फि र किसने चुनौती दी है-दोहरा संविधान देश में लागू करके।

ऐसी स्थिति में भारत के लोगों की सर्वोच्च प्रभुता कहाँ रही? और यदि है तो देश के राज्य क्षेत्र में अलग संविधान रहे कि नहीं, वह देश का भाग है कि नहीं, इस विषय पर जनमत संग्रह जम्मू-कश्मीर के लोगों का नहीं अपितु सारे देश के लोगों का होना चाहिए। जम्मू-कश्मीर भारत के संविधान में विशेष स्थिति पा सकता है कि नहीं, इस विषय पर संविधान निर्मात्री सभा को कोई अधिकार विशेष व्यवस्था देने या बनवाने का नहीं था। क्योंकि उन्हें जिस जनता ने संविधान बनाने भेजा था उस समय उनके निर्वाचन के लिए यह नहीं पूछा गया था और न ही ये बात थी कि समय और आवश्यकता के अनुसार ये लोग किसी राज्य को संविधान में विशेष स्थिति प्रदान कर सकते हैं, अथवा किसी राज्य के लिए अलग संविधान भी देश में हो सकता है कि नहीं।

अत: जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति संविधान में डालना या रखना संविधान सभा के क्षेत्राधिकार से बाहर की बात थी। जो उसने करके दिखा दी। उसके ऐसा करने से ‘हम भारत के लोग........’ शब्द समुच्चय की व्याख्या अतार्किक लगती है। इस प्रकार की व्याख्या का औचित्य तभी है जब कि देश की जनता की भावनाओं केअनुरूप देश में एक निशान, एक विधान और एक प्रधान की व्यवस्था रखी जाती।

जब तक जम्मू-कश्मीर का दर्द राष्ट्र के हृदय में है तब तक ‘हम भारत के लोग......’ की उपरोक्त वर्णित प्रचलित व्याख्या भ्रामक है। जिसे शब्द विलास से अध्कि वुफछ नहीं माना जा सकता।  ‘गणराज्य’ संविधान के अधीन सभी प्राधिकारों का स्त्रोत भारत के लोग हैं। भारत एक स्वाधीन राज्य हैं और अब वह किसी बाहरी प्राधिकारी के प्रति निष्ठावान नहीं है। हमारे देश का राष्ट्रपति अप्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा निर्वाचित राष्ट्रपति है। अब इस पद सहित किसी भी पद पर भारत के नागरिक की नियुक्ति होना संभव है। इसकी व्याख्या को थोड़ा विस्तार दिया जाना चाहिए था। राष्ट्रपति को राजा के स्थान पर निर्वाचित प्राधिकारी माना जाता।  जिसका कार्य वेद के अनुसार कुछ इस प्रकार होता-हे राजन आप प्रकृष्टï बुद्घिवाले, छल-कपटयुक्त अयज्वा और अक्रती लोगों को, दस्युओं को, कम्पायमान कीजिए और जो यज्ञ न करके अपने पेट भरते हैं उन दुष्टों को दूर कीजिए, और इन उपद्रव, अशांति, अज्ञानता और नास्तिकता फैलाने वाले जनों के नगरों को भग्न कर दीजिए।’

पूरे संविधान को आप पलट लें। इस देश के मुखिया को आपातकालीन परिस्थितियों में भी दस्यु-दलन का अधिकार नहीं दिया गया है। जबकि गणराज्य में जनहित सर्वोपरि होता है। इसलिए जनहित में दस्यु-दलन का विशेषाधिकार राष्ट्रपति के लिए रखना अपेक्षित था। इसके लिए भारत के प्राचीन साहित्य और धर्मग्रंथों का अनुशीलन करके निष्कर्ष स्थापित किये जाने चाहिए थे। दस्यु से हमारा अभिप्राय समाज के प्रत्येक ऐसे व्यक्ति से है जो राष्ट्र की एकता और अखण्डता को तथा सामाजिक व्यवस्था को क्षत-विक्षत करने की गतिविधियों में संलिप्त है अथवा संलिप्त पाया जाता है।

दस्यु किसी वर्ग का नाम नहीं है। दस्यु एक व्यक्ति है, एक विचार है, जो मानव समाज के लिए सर्वथा अनुपयुक्त है। उसे समाज के लिए उपयोगी बनाने के लिए विशेष उपायों की आवश्यकता होती है। इन उपायों में दस्यु दलन अथवा दस्यु वर्ग की पूर्ण समाप्ति भी एक उपाय है। संविधान ने इन दस्युओं को चिन्हित नहीं किया कि कौन-कौन से लोग ‘दस्यु’ कहे जायेंगे? और उनकेसाथ किस प्रकार निपटा जायेगा।

ऐसी व्यवस्था के अभाव में ‘दस्यु’ सांसद बन रहे है, विधायक बन रहे हैं और अपने अधीनस्थ और कनिष्ठ दस्युओं का हित संरक्षण कर रहे हैं। गणराज्य का चेहरा विद्रूपित हो चुका है। संविधान मौन है। जबकि एक लोकतंत्रात्मक गणराज्य इस संविधान से अपेक्षा की जाती थी कि देश के लोकतांत्रिक स्वरूप और विभिन्न संप्रदायों, भाषाओं, और विचारों के लोगों को एकात्मता के साथ यह संविधान जोडक़र दिखाएगा और  अपनी प्रस्तावना के अनुरूप लोगों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय दिलाने में सहायक सिद्घ होगा। यदि संविधान ऐसा नही कर पाया है तो हमें 26 नवंबर को संविधान दिवस पर अपने आपसे यह अवश्य पूछना चाहिए कि यह संविधान हमारे लिए अनुपयुक्त है या हम स्वयं इस संविधान के लिए अनुपयुक्त सिद्घ हो चुके हैं?

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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