हमारा मूल विदेशों में नही, भारत में है

  • 2016-03-18 03:30:15.0
  • राकेश कुमार आर्य

भारत में जातियों का वर्गीकरण और उनकी सामाजिक स्थिति को विकृत करने का काम अंग्रेजों ने किया। भारत की प्राचीन वर्णव्यवस्था कर्म के आधार पर थी। कर्म से ही व्यक्ति का वर्ण निश्चित किया जाता था, कर्म परिवर्तन से वर्ण परिवर्तन भी सम्भव था। इसलिए एक शूद्र के ब्राह्मण बनने की पूर्ण सम्भावना थी। कालान्तर में शिक्षा के अभाव, वर्ण व्यवस्था को परम्परागत बनाने की मानव की प्रकृति, (कुम्हार का बच्चा कुम्हार बन जाता है) तथा अपने-अपने वर्ण के लिए निश्चित कर्म (जैसे ब्राह्मण का कर्म वेद का पढऩा-पढ़ाना है) में बरते जाने वाले प्रमाद के कारण स्थिति बदल गयी और वर्णव्यवस्था हमारे लिए एक परम्परागत रूढि़ बन गयी। तब ब्राह्मण का कम पढ़ा-लिखा बच्चा भी ब्राह्मण माना जाने लगा।

इस रूढि़ को समाप्त कर भारत की प्राचीन वर्णव्यवस्था को सुधारने की आवश्यकता थी। लेकिन इसमें कोई सुधार नहीं किया गया। अंग्रेजों के सामने दो बातें थीं-एक तो वह भारत को सही अर्थ और संदर्भों में समझने और जानने के लिए तैयार नहीं थे, दूसरे वह भारत के सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक क्षेत्र में व्याप्त अंतर्विरोधों और विसंगतियों को और भी अधिक गहरा करके उनका राजनीतिक लाभ उठाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने भारत के बारे में सर्वप्रथम यह तथ्य स्थापित किया कि यहाँ पर प्राचीन काल से बाहरी लोगों का आना लगा रहा। ‘‘काफि ले आते गये और हिन्दुस्तान बनता गया’’ आर्यों को भी विदेशी बताया गया और उस काल से लेकर शक, हूण, कुषाण, गूर्जर, सातवाहन, तुर्क, मुगल, पठान, अंग्रेज़, डच, फ्रांसीसी, और पुर्तगाली लोगों के आने वाले काफि लों को यहाँ के मूल समाज के साथ कुछ यूँ संलग्न किया गया कि ऐसा लगने लगा, जैसे यहाँ के मूल निवासी तो जंगली जीवन ही जीते थे। उनके सामाजिक रीति-रिवाज आदिकाल के थे, और बाहरी लोगों ने आकर ही यहाँ आदिवासी जनजातियों के रूप में उन्हें स्थापित किया। इस प्रकार हमारे विषय में विदेशियों द्वारा एक झूठ को सच के रूप में स्थापित किया गया और हम भारतीयों ने विदेशियों की इस वैचारिक जूठन को पूँछ हिला-हिलाकर खाना आरम्भ कर दिया, और आज तक खा रहे हैं। इसलिए देश में आज राष्ट्रवाद की भावना संकट में हैं। हम एक थे, एक हैं, और मुट्ठी भर विदेशी लोगों को छोडक़र शेष सारा भारतवर्ष ऋषि पूर्वजों और लोकहित के लिए समर्पित रहे मान्धाता, भगवान राम, युधिष्ठिर, कृष्ण और ऐसे ही विभिन्न भूपतियों की संतानें हैं-यह बात स्थापित होनी चाहिए थी, परन्तु की नहीं गयी। आज सब जैसे ‘‘मेड इन इंग्लैंड’’ से क्रय करते हैं, वैसे ही हम ‘‘मेड इन अमेरिका’’ के भारत विषयक विचारों को क्रय रहे हैं, और विद्वान होने के पदक को पाकर अपनी पीठ स्वयं ही थपथपा कर धन्य भाग हो रहे हैं। यह अशोभनीय सोच हमारा पीछा कर रही है और हम झूठ मूठ ही कहे जा रहे हैं-‘गर्व से कहो मैं भारतीय हूँ,’ अपनी जड़े विदेशों में टटोलकर भी भारतीय होने पर गर्व कैसे हो सकता हैं?

भारत

अनुसंधान की दिशा ठीक नही है, तो हिंदुस्तान की दशा भ्रमित हो गयी। भारत को भारत में टटोलना होगा। स्मरण रहे कि यदि भारत विदेशी होता तो भारत का नाम भारत नहीं होता। यह किसी विदेशी भाषा का ही नाम होता।

जहाँ तक भारत में जातियों को ‘जहर का इंजेक्शन’ बनाकर  अंग्रेजों द्वारा भारत की नसों में चढ़ाने का प्रश्न है तो 1861 की जनगणना के अंतर्गत जे.ए.बेन्स ने जातियों को उनके परम्परागत व्यवसाय का आधार प्रदान किया, और चरवाहों को उसने वन जातियों के सदस्य कहा। उनकी संख्या उस समय एक करोड़ आठ लाख अनुमानित की गयी। 1901 की जनगणना के समय उन्हें प्रकृतिवादी कहा गया। 1911 की जनगणना में उन्हें ‘‘जनजातीय प्रकृतिवादी अथवा जनजातीय धर्म को मानने वाले कहा गया। 1921 की जनगणना में उन्हें ‘‘पहाड़ी व वन्य जातियों’’ का नाम दिया गया। 1931 में उन्हें ‘‘आदिम जनजातियाँ’’  कहा गया। भारत सरकार अधिनियम 1935 में जनजातीय जनसंख्या को ’’पिछड़ी जनजातियाँ’’ कहा गया। सन्  1941 की जनगणना में उन्हें केवल ‘‘जनजातियाँ’’ कहा गया। तब उनकी कुल जनसंख्या लगभग 2.47 करोड़ आँकी गयी।

स्वतंत्रता के पश्चात भारत के संविधान के अंतर्गत अनुसूचित जनजातियों का उल्लेख किया गया है। जिन्हें राष्ट्रपति घटा या बढ़ा सकते हैं। तब से कुछ लोगों को स्थायी रूप से हमने इन जनजातिया के सदस्य मानना आरंभ कर दिया है। 1891 में जो एक बुराई आरम्भ हुई थी, 1950 के संविधान ने उस पर अपनी मुहर लगाकर उसे सही होने का नाम दे दिया। अंग्रेजों ने आदिवासी लोगों के मध्य अपनी मिशनरीज स्थापित कीं और हमारे अनुसूचित जनजाति के लोगों को भारतीय समाज से अलग स्थापित कर ईसाई बनाया। आज के अधिकांश ईसाई ऐसे ही पुराने भारतीय समाज के लोग हैं। जबकि आज की सरकारें उन्हें आरक्षण दे देकर शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्रों में बढऩे के लिए विद्यालय और स्थान न देकर उन्हें अकर्मण्य कर रही हैं, इसलिए वे लोग आज भी धर्मपरिवर्तन कर रहे हैं। 1947 से अब तक हमने अनुसूचित जनजातियों को लेकर इतना ही विकास किया हैं।

मानव ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट कृति है। मानव मानव परस्पर बन्धु हैं, क्योंकि वह सब एक ही पिता की सन्तानें हैं। हर मानव अमृत पुत्र है, आर्य पुत्र है। भारत की इसी पुरातन सोच के अनुकरणीय मूल्य को वर्तमान के जातिवादी समाज में स्थापित करने की आवश्यकता है। तभी भारत ‘विश्वगुरू’ बनेगा।