स्वतंत्रता, समता और देश का लोकतांत्रिक स्वरूप

  • 2016-05-13 04:33:58.0
  • राकेश कुमार आर्य

व्यक्ति की संप्रभुता क्या है? -व्यक्ति की स्वतंत्रता। समाज की संप्रभुता क्या है? -समाज की समतामूलक सोच। देश की संप्रभुता क्या है? -देश का लोकतांत्रिक चरित्र। यदि इन तीनों बातों पर विचार किया जाए तो पता चलता है कि व्यक्ति, समाज और देश की संप्रभुता एक दूसरे की पूरक हैं। स्वतंत्रता, समता और लोकतंत्र कभी भी एक दूसरे के विपरीत हो ही नही सकते। हमारे ऋषियों ने व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के मध्य उचित समन्वय स्थापित करने के लिए ही राज्य की उत्पत्ति या राजा पद की सृजना की थी। जिस समाज से व्यक्ति की स्वतंत्रता, समाज की समता और देश का लोकतांत्रिक चरित्र नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है-वहां अशांति, उपद्रव, उत्पात, उग्रवाद, अराजकता, एक दूसरे का शोषण, एक दूसरे के अधिकारों का हनन इत्यादि अलोकतांत्रिक अव्यवस्था के दुर्गुण स्पष्ट भासने लगते हैं।

हमारे लोगों ने अर्थात हमारे उत्कृष्ट चिंतनशील पूर्वजों ने एक ऐसे ‘चक्रवर्ती सम्राट’ की कल्पना की, जो सबका संरक्षक हो-विष्णु हो-भरण पोषणकर्ता हो। इसके कई लाभ थे-जैसे व्यक्ति और समाज के मध्य किसी प्रकार की टकराहट इस व्यवस्था में संभव नही है। जैसे ईश्वर अपने सभी पुत्रों के लिए या अपनी समस्त प्रजा के लिए एक कानून या एक व्यवस्था प्रदान करता है वैसे ही एक राजा या एक सम्राट समस्त भूमंडल के लिए एक कानून या एक व्यवस्था स्थापित करे, जिससे विश्व समाज में समता स्थापित हो, और जब समता स्थापित हो जाएगी तो विश्व में और देश में भी व्यक्ति की स्वतंत्रता स्वयं ही स्थापित हो जाएगी। व्यक्ति की स्वतंत्रता और समाज की समता के मध्य उचित समन्वय  स्थापित करना ही राज्य या राष्ट्र का लोकतांत्रिक स्वरूप है। एक प्रकार से जैसे घर में मुखिया घर के सदस्यों और घर की व्यवस्था के मध्य उचित समन्वय स्थापित करता है वैसे ही राजा का कार्य होता था कि वह व्यक्ति और समाज के मध्य उचित समन्वय बनाये। इस महत्वपूर्ण कार्य के संपादन के लिए ‘एक मुखिया, एक कानून’ की नीति बनाकर चक्रवर्ती सम्राट की कल्पना की गयी और उसे साकार रूप भी दिया गया। इस प्रकार सम्राट व्यक्ति या समाज के अधिकारों का शोषक न होकर पोषक था। इस व्यवस्था ने मानवजाति का युगयुगों तक सफल नेतृत्व किया और परिवार (‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना के कारण संपूर्ण विश्व को) बिखरने नही दिया, अर्थात विभिन्न राष्ट्रीयताओं का उदय नही होने दिया। संपूर्ण वसुधा को, संपूर्ण मानवजाति का घर बनाकर रखा और व्यक्ति को विश्व के किसी भी स्थान पर जाने की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की गयी।

धीरे-धीरे भारत की इस वास्तविक लोकतांत्रिक व्यवस्था में घुन लगने लगा। समय परिवर्तन शील है। जिसके अंतर्गत विश्व में कई संप्रदायों (मजहबों) का प्रादुर्भाव हुआ। भारत की पुरातन-सनातन संस्कृति से इस प्रकार जन्मे संप्रदायों का जन्मना वैर आरंभ हो गया। क्योंकि संप्रदाय व्यक्ति की पहचान मानव न रखकर किसी संप्रदाय विशेष के रूप में रखना चाहते थे। उनकी सोच थी कि व्यक्ति को संप्रदाय के आधार पर पहले जाना जाए और मानव के रूप में बाद में जाना जाए। भारत की सनातन धर्मी सोच और संप्रदाय की इस प्रकार की सोच के मध्य गंभीर विवाद उत्पन्न हो गया। फलस्वरूप विश्व में जहां-जहां भी सनातन धर्मी परंपरायें थी उन्हें नष्ट-भ्रष्ट कर सांप्रदायिक लोग अपनी पताका फहराते गये और चक्रवर्ती सम्राट की भारत की परंपरा और भारत के सनातन धर्म का लोप होता गया। इस प्रकार भारत की चक्रवर्ती सम्राटों की परम्परा और सनातन धर्म के विलोपीकरण की प्रक्रिया जब आगे बढ़ी तो हमने देखा कि इस पवित्र परंपरा के स्थान पर क्रूर राज्यों के निर्माण का क्रम आरंभ हो गया। राजशाही की निर्ममता और निर्दयता के नीचे व्यक्ति और समाज के मौलिक अधिकार अर्थात स्वतंत्रता और समता को मसला जाने लगा। इससे भारत की उस पवित्र लोकतांत्रिक व्यवस्था का अंत होने लगा जिसके अंतर्गत भारत की ऋषि परंपरा ने व्यक्ति को ‘अमृतपुत्र’ तथा समाज को समानता का जनक कहकर उन्हें एक संस्था स्वीकार किया था। भारत की इस संस्थापरक सोच के कारण कितने ही महान ऋषि और विद्वान स्वयं एक संस्था बने और उन्होंने महानतम आविष्कार किये। पर अब दुर्दिनों का दौर था। संप्रदाय ने भारत की इस परंपरा को समाप्त करने का क्रम आरंभ कर दिया था। ऐसी परिस्थितियों में भारत व्यक्ति की स्वतंत्रता, समाज की समानता और राज्य के लोकतांत्रिक चरित्र की रक्षा के लिए आंदोलनरत हो उठा। भारत ने अपनी स्वतंत्रता की लड़ाई इन्हीं मूल्यों को लेकर लड़ी। पर इस दीर्घकालीन स्वतंत्रता संग्राम को ‘गांधी की अहिंसा’ की भेंट चढ़ा दिया गया और अपने गौरवमयी इतिहास पर पर्दा डाल दिया गया।

परिणामस्वरूप हम यह नही समझ पाये कि व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का समन्वय क्या है? हमने समाज को व्यक्ति की स्वतंत्रता में बाधक माना और व्यक्ति व समाज की स्वतंत्रता में राज्य को बाधक माना। ईसाइयत और इस्लाम ने विश्व को कितने ही देशों में बांट-बांटकर और व्यक्ति की उच्छं्रखलता को बढ़ावा दे देकर कितने ही देश स्थापित करा दिये और व्यक्ति की स्वतंत्रता को तानाशाहों की जेलों (देशों की सीमाएं भी जेल हैं) में डाल दिया। इन लोगों ने जनता को संप्रदाय के भावुक नारों से अपने साथ लगाया। संप्रदाय के नारे लगाये गये अपने ‘संप्रदाय को खतरा है’ ऐसा कह कहकर लोगों को अपने साथ लगाया गया और समाज की समता को लोगों की परस्पर की घृणा से खण्ड-खण्ड करा दिया।

अपने पूर्वजों के सारे परिश्रम और बौद्घिक मार्गदर्शन को हमने ‘साबरमती के संत’ के चरणों में समर्पित कर दिया और देश के लोगों को दिखाया कि-‘देखिए इस संत के चरणों से निकलने वाली गंगा से ही भारत का जन्म हो रहा है, इसलिए इस ‘भगीरथ’ को राष्ट्रपिता मानो। मत समझो कि भारत इससे पूर्व भी था और विश्व का सबसे पहला ऐसा देश था जिसने धर्म संस्कृति की ध्वजा को मानवहित में उठाये रखा।’

इस उलट पलट की भयावह परिणति यह हुई कि हमने भी व्यक्ति की स्वतंत्रता और समाज की समता के मध्य संघर्ष कराने की ठान ली। साथ ही राज्य ने इन दोनों संस्थाओं के परस्पर के संघर्ष में बंदरवाला न्याय करना आरंभ कर दिया। उसने व्यक्ति को उच्छं्रखल बनाना आरंभ कर दिया और समाज को पंगु बनाना आरंभ कर दिया। इससे व्यक्ति ने धीरे-धीरे अपने दांत बढ़ाने आरंभ किये और वह समाज को खाने लगा। व्यक्ति ने अपनी जाति, संप्रदाय, गोत्र, क्षेत्र, आदि की हिंसक पहचानों को जीवित कर लिया और इन पहचानों के नुकीले दांतों से उसने समाज पर हमला बोल दिया। जैसे मध्यकाल में लोग अपने-अपने राज्य स्थापित करते थे वैसे ही स्वतंत्र लोकतांत्रिक भारत में नये-नये राज्य स्थापित करने के कीटाणु मानव मस्तिष्क में मचलने लगे। इन नये राज्यों की कमान संभालने के लिए कुछ ‘लोकतांत्रिक राजवंश’ (जैसे उत्तर प्रदेश में मायावती, मुलायमसिंह यादव, हरियाणा में चौटाला परिवार बिहार में लालू परिवार, तमिलनाडु में जयललिता और उनके परम्परागत विरोधी अन्य राजनीतिज्ञ) हर प्रांत में उभरकर सामने आये। हर प्रांत में परिवारवादी लोकतंत्र अपने हाथों में फरसा लेकर लोकतंत्र की ओर दौड़ पड़ा दिखायी देता है। व्यक्ति की स्वतंत्रता और समाज की समता को जाति आदि के हिंसकभावों से कुचलकर यह वर्ग भारत में अपनी ‘दादागीरी’ चला रहा है। जिससे लोकतंत्र सिसकियां ले रहा है।

राजनीतिज्ञों की निजी महत्वाकांक्षाएं जहां लोगों की स्वतंत्रता को जबरन मतदान अपने पक्ष में कराके शांत कर देती हों और समाज की समता को विभिन्न विविधताओं में बांटकर उसकी शांति को समाप्त कर डालने की क्षमता रखती हों, उनसे किसी नये राज्य की स्थापना कराके उसका समग्र विकास कराने की अपेक्षा नही की जा सकती। यही कारण है कि भारत में नये राज्य भी पुराने ढर्रे पर चलने लगते हैं और वहां भी विकास मृग मरीचिका बनकर रह जाता है। जब तक राजनीतिज्ञों की सोच को व्यक्ति की स्वतंत्रता और समाज की समता के अनुकूल नही किया जाएगा तब तक राज्य और राजनीतिज्ञों से देश का भला नही हो सकता। हमें नही पता कि हमारे देश में लोकतंत्र भी गुलाम है-राजनीति का। जिस दिन यह राज हम समझ लेंगे और इससे स्वयं को मुक्त कराने के लिए उठ खड़े होंगे उस दिन छोटे राज्यों की मांग को छोडक़र ‘चक्रवर्ती राज्य’ की स्थापना के लिए चल पड़ेंगे। हमारे लोकतंत्र का अंतिम लक्ष्य भी यही है।