एक सच्ची अनकही रोमांचकारी ऐतिहासिक घटना

  • 2016-04-06 12:30:55.0
  • अमन आर्य

हमारे क्षत्रिय कभी कितने बहादुर हुआ करते थे, इसकी कितनी ही कहानियां आपने सुनी होंगी। हमारे इन वीरों को विदेशी शासकों ने इस प्रकार बलहीन और बुद्घिहीन करने का प्रयास किया, यह भी देखने की बात है। साथ ही यह भी विचारणीय है कि हम आज भी उसी रास्ते पर बढ़े चले रहे हैं जिस पतन के रास्ते को विदेशी शासकों ने हमारे लिए चुना था। इस सच्ची कहानी को पढक़र हमें विचार करना चाहिए कि-
हम क्या थे क्या हो गये
और क्या होंगे अभी?

आओ बैठकर विचारें,
हम ये समस्याएं सभी।

मुगल बादशाह का दिल्ली में दरबार लगा था और हिंदुस्तान के दूर दूर के राजा महाराजा दरबार में हाजिर थे, उसी दौरान मुगल बादशाह ने एक दम्भोक्ति की-‘है कोई हमसे बहादुर इस दुनिया में ?’  सभा में सन्नाटा सा पसर गया, एक बार फिर वही दोहराया गया, तीसरी बार फिर उसने ख़ुशी से चिल्ला कर कहा-‘है कोई हमसे बहादुर जो हिंदुस्तान पर सल्तनत कायम कर सके?’

सभा की खामोशी को तोड़ती एक बुलन्द शेर सी दहाड़ गूंजी तो सबका ध्यान उस शख्स की ओर गया, वे जोधपुर के महाराजा राव रिड़मल थे ।

एक सच्ची अनकही रोमांचकारी ऐतिहासिक घटना

रिड़मल जी ने कहा-मुगलों में बहादुरी नही कुटिलता है, सबसे बहादुर तो राजपूत हैं दुनिया में, मुगलों ने राजपूतों को आपस में लड़वा कर हिंदुस्तान पर राज किया, कभी सिसोदिया राणा वंश को कछावा जयपुर से तो कभी राठोड़ों को दूसरे राजपूतों से  लड़ाया।

बादशाह का मुँह देखने लायक था , ऐसा लगा जैसे किसी ने चोरी करते रंगे हाथों पकड़ लिया हो ।

अधिक बातें मत करो राव, उदाहरण दो वीरता का । रिड़मल ने कहा क्या किसी कौम में देखा है किसी को सिर कटने के बाद भी लड़ते हुए ?

बादशाह बोला ये तो सुनी हुई बात है देखा तो नही, रिड़मल बोले इतिहास उठाकर देख लो कितने वीरों की कहानियां हैं सिर कटने के बाद भी लडऩे की ...

बादशाह हंसा और दरबार में बैठे कवियों की ओर देखकर बोला इतिहास लिखने वाले तो मंगते होते हैं, मैं भी 100 मुगलों के नाम लिखवा दूँ, इसमें क्या ? मुझे तो जिन्दा ऐसा राजपूत बताओ जो कहे कि मेरा सिर काट दो मैं फिर भी लड़ूंगा ।

राव रिड़मल निरुत्तर हो गए और गहरे सोच में डूब गए।

रात को सोचते-सोचते अचानक उनको रोहणी ठिकाने के जागीरदार का ख्याल आया ।

एक दिन अचानक रात को 11 बजे रोहणी ठिकाना (जो की जेतारण कस्बे जोधपुर रियासत में है) में दो घुड़सवार बुजुर्ग जागीरदार के पोल पर पहुंचे और मिलने की इजाजत मांगी। ठाकुर साहब काफी वृद्घ अवस्था में थे फिर भी उठ कर मेहमान की आवभगत के लिए बाहर पोल पर आये-घुड़सवारों ने प्रणाम किया और वृद्घ ठाकुर की आँखों में चमक सी उभरी तो मुस्कराते हुए बोले -‘जोधपुर महाराज! आपको मैंने गोद में खिलाया है और अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दी है, इस तरह भेष बदलने पर भी मैं आपको आवाज से पहचान गया हूँ। हुकम आप अंदर पधारो। मैं आपकी रियासत का छोटा सा जागीरदार, आपने मुझे ही बुलवा लिया होता ।’

राव रिड़मल ने उनको झुककर प्रणाम किया और बोले एक समस्या है , और बादशाह के दरबार की पूरी कहानी सुना दी, अब आप ही बतायें कि जीवित योद्धा का कैसे पता चले कि ये लड़ाई वह सिर कटने के बाद भी लड़ेगा ?

रोहणी जागीरदार बोले-‘बस इतनी सी बात मेरे दोनों बच्चे सिर कटने के बाद भी लड़ेंगे और आप दोनों को ले जाओ, दिल्ली दरबार में ये आपकी और रजपूतों की लाज जरूर रखेंगे।’

राव रिड़मल को घोर आश्चर्य हुआ कि एक पिता को कितना विश्वास है अपने बच्चों पर , मान गए राजपूती धर्म को ।

सुबह जल्दी दोनों बच्चे अपने अपने घोड़ों के साथ तैयार थे , उसी समय ठाकुर साहब ने कहा , महाराज थोड़ा रुकिए मैं एक बार इनकी माँ से भी कुछ चर्चा कर लूँ इस बारे में । राव रिड़मल ने सोचा आखिर पिता का ह्रदय है, कैसे मानेगा अपने दोनों जवान बच्चों के सिर कटवाने को , एक बार रिड़मल जी ने सोचा कि मुझे दोनों बच्चो को यहीं छोडक़र चले जाना चाहिए ।

ठाकुर साहब ने ठकुरानी जी को कहा-आपके दोनों बच्चों को दिल्ली मुगल बादशाह के दरबार में भेज रहा हूँ सिर कटवाने को, दोनों में से कौन सा सिर कटने के बाद भी लड़ सकता है?

आप माँ हो आपको ज्यादा पता होगा , ठकुरानी जी ने कहा-बड़ा लडक़ा तो कि़ले और कि़ले के बाहर तक भी लड़ लेगा पर छोटा केवल परकोटे में ही लड़ सकता है-क्योंकि पैदा होते ही इसको मेरा दूध नही मिला था इसलिए ।।

लड़ दोनों ही सकते हैं, आप निश्चिन्त् होकर भेज दो ।

दिल्ली के दरबार में आज कुछ विशेष भीड़ थी और हजारों लोग इस दृश्य को देखने जमा थे ।

बड़े लडक़े को मैदान में लाया गया और मुगल बादशाह ने जल्लादों को आदेश दिया कि इसकी गर्दन उड़ा दो , तभी बीकानेर महाराजा बोले-ये क्या तमाशा है ? राजपूती जान इतनी भी सस्ती नही हुई है , लड़ाई का मौका दो और फिर देखो कौन बहादुर है ?

बादशाह ने खुद के सबसे मजबूत और कुशल योद्धा बुलाये और कहा ये जो घुड़सवार मैदान में खड़ा है उसका सिर काट दो, 20 घुड़सवारों का दल रोहणी ठाकुर के बड़े लडक़े का सिर उतारने को लपका और देखते ही देखते उन 20 घुड़सवारों की लाशें मैदान में बिछ गयी ।

दूसरा दस्ता आगे बढ़ा और उसका भी वही हाल हुआ , मुगलों में घबराहट और झुरझ्ुारी फैल गयी , बादशाह के 500 सबसे ख़ास योद्धाओं की लाशें मैदान में पड़ी थीं और उस वीर राजपूत योद्धा के तलवार की खरोंच भी नही आई।

ये देख कर मुगल सेनापति ने कहा-500 मुगल बीबियाँ विधवा कर दीं, आपकी इस परीक्षा ने अब और मत कीजिये हुजूर, इस काफिऱ को गोली मरवाईए हुजूर, तलवार से ये नही मरेगा , कुटिलता और मक्कारी से भरे मुगलों ने उस वीर के सिर में गोलियां मार दीं । सिर के परखचे उड़ चुके थे पर धड़ ने तलवार की मुगलों मजबूती कम नही करी और मुगलो का कत्लेआम खतरनाक रूप से चलता रहा ।

बादशाह ने छोटे भाई को अपने पास निहत्थे बैठा रखा था ये सोच कर कि यदि ये बड़ा बहादुर निकला तो इस छोटे को कोई जागीर देकर अपनी सेना में भर्ती कर लूंगा, लेकिन जब छोटे ने ये अंन्याय देखा तो उसने झपटकर बादशाह की तलवार निकाल ली। उसी समय बादशाह के अंगरक्षकों ने उनकी गर्दन काट दी फिर भी धड़ तलवार चलाता गया और अंगरक्षकों समेत मुगलों का काल बन गए ।

बादशाह भाग कर कमरे में छुप गया और बाहर मैदान में बड़े भाई और अंदर परकोटे में छोटे भाई का पराक्रम देखते ही बनता था । हजारों की संख्या में मुगल हताहत हो चुके थे, और आगे का कुछ पता नही था।

बादशाह ने चिल्ला कर कहा-अरे कोई रोको इनको । एक मौलवी आगे आया और बोला इन पर शराब छिडक़ दो।  राजपूत का इष्ट कमजोर करना हो तो शराब का उपयोग करो । दोनों भाइयों पर शराब छिडक़ी गयी ऐसा करते ही दोनों के शरीर ठन्डे पड़ गए। मौलवी ने बादशाह को कहा- हुजूर ये लडऩे वाला इनका शरीर नही बल्कि इनका इष्ट देव है । और ये राजपूत शराब से दूर रहते हैं और अपने धर्म और इष्ट को मजबूत रखते हैं ।

यदि मुगलों को हिन्दुस्तान पर शासन करना है तो इनका इष्ट और धर्म भृष्ट करो और इनमे दारु शराब की लत लगाओ। यदि मुगलो में ये कमियां हटा दें तो मुगल भी मजबूत बन जाएंगे ।

उसके बाद से ही राजपूतों में मुगलों ने शराब का प्रचलन चलाया और धीरे-धीरे राजपूत शराब में डूबते गए और अपने इष्ट देव को नाराज करते गए ।

और मुगलों ने मुसलमानों को कसम खिलवाई कि शराब पीने के बाद नमाज नही पढ़ी जा सकती । इसलिए इससे  दूर रहिये ।।

(साभार)

अमन आर्य ( 358 )

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