एक परिवार की परिक्रमा बाहर निकलते कांग्रेसी

  • 2015-12-30 01:55:06.0
  • राकेश कुमार आर्य

देश के लिए यह प्रसन्नता का विषय है कि कांग्रेस के मुख पत्र ‘ कांग्रेस दर्शन’ में प्रकाशित एक लेख में सरदार पटेल और  नेहरू के बीच तुलना करते हुए सरदार पटेल को नेहरू की अपेक्षा कहीं अधिक अंक दिये गये हैं। पत्रिका में छपे एक लेख में स्पष्ट किया गया है कि पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निमाण का संकल्प लिया जो नेहरू के विरोध के बाद भी बना। पटेल कश्मीर में जनमत संग्रह कराने और कश्मीर समस्या को यू.एन.ओ. में ले जाने को उचित नही मानते थे और नेहरू के ऐसे प्रत्येक प्रयास के विरोधी थे। पटेल की दूरदर्शिता का लाभ लिया जाता तो विदेश नीति से जुड़ी कई समस्याओं का जन्म ही नही होता। ऐसे कई बिंदुओं को ‘कांग्रेस दर्शन’ में छपे लेख में बड़ी बारीकी से स्पष्ट किया गया है और लेखक ने नेहरू की आलोचना करते हुए सरदार पटेल को उनसे अधिक प्रमुखता प्रदान की है। ऐसे लेख का कांग्रेस के 131वें स्थापना दिवस पर प्रकाशित होना और भी महत्वपूर्ण है। इससे गांधी नेहरू परिवार के उस आवरण की पोल खुल जाती है जो इस परिवार ने कांग्रेसियों से भी  बनाकर रखा है और उन्हें सच की कभी जानकारी ही नही होने दी।
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नेहरू के बारे में यह सच है कि उस समय के भारत के पंद्रह राज्यों में से केवल दो राज्यों ने उन्हें भारत का प्रथम प्रधानमंत्री बनने के लिए अपना समर्थन दिया था। जब हम यह कहते हैं कि पंद्रह राज्यों में से दो राज्य नेहरू के साथ थे, तो इसका अभिप्राय यह होता है कि उस समय के कुल पंद्रह राज्यों में से दो ही कांग्रेस इकाईयां यह चाहती थीं कि देश का पहला प्रधानमंत्री नेहरू को बनाया जाए। जबकि बारह प्रदेश कांग्रेस इकाईयां सरदार पटेल को देश का पहला प्रधानमंत्री बनाना चाहती थीं। इस तथ्य से ही यह स्पष्ट है कि कांग्रेस में भी उस समय नेहरू की अपेक्षा सरदार पटेल ही अधिक स्वीकार्य और लोकप्रिय थे।

कांग्रेस के उस समय के बड़े नेता मौलाना अब्दुल कलाम आजाद थे जिन्होंने नेहरू को पहला प्रधानमंत्री बनवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। परंतु अपने अंतिम दिनों में वह स्वयं भी नेहरू से निराश हो चुके थे और उन्होंने हुमायूं कबीर से कहा था कि  सरदार पटेल के स्थान पर नेहरू को प्रधानमंत्री बनवाकर उन्होंने बड़ी भूल की है-कांग्रेस के अपने इतिहासकारों ने ही इस तथ्य को भी स्पष्ट किया है। अब कांग्रेस का नेतृत्व ‘कांग्रेस दर्शन’ में छपे लेख पर अपनी ‘असहिष्णुता’ का प्रदर्शन कर रहा है और नेहरू के विरूद्घ लिखने वालों के विरूद्घ कठोर कार्यवाही कर रहा है तो ऐसा करने से पहले उसे यह भी देखना चाहिए कि अब से पहले जितने लोगों ने नेहरू को सरदार पटेल की अपेक्षा उस समय का कमजोर नेता माना है या सिद्घ करने का प्रयास किया है उनके विरूद्घ वह क्या कार्यवाही करेगी?

अब पूरा देश यह भलीभांति जान गया है कि अंग्रेजों ने भारत को स्वतंत्र करते समय देशी रियासतों के समक्ष जिन तीन विकल्पों को रखा था, वे थे कि रियासतें चाहें तो भारत के साथ अपना विलीनीकरण कर लें और चाहें तो पाकिस्तान के साथ चली जाएं या चाहें तो अपना स्वतंत्र अस्तित्व कायम रखते हुए स्वतंत्र देश की घोषणा कर दें। इसका अभिप्राय था कि अंग्रेजी सत्ताधीशों ने भारत के एक नही अनेक टुकड़े करने का षडय़ंत्र रचा था। इस षडय़ंत्र से देश को उस समय उबारकर बाहर लाने वाले भी सरदार पटेल ही थे। कांग्रेसी मानसिकता के इतिहासकारों और लेखकों ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि उस समय हैदराबाद और जूनागढ़ को जितनी सावधानी और समझदारी से सरदार पटेल भारत के साथ ले आये थे, उस कार्य को केवल वही कर सकते थे। देश ने उनके जज्बे को नमन किया और उनके साहसपूर्ण विवेक से वर्तमान भारत को बनते हुए देखा। उस समय यदि नेहरू की चलती तो पूरा काश्मीर हाथ से निकल गया होता, पर सरदार पटेल ने उसमें भी समय रहते रूचि ली और उसे अपने साथ लाने में सफलता प्राप्त की। यदि नेहरू कश्मीर में अनावश्यक और अनुचित हस्तक्षेप नही करते और शेखअब्दुल्ला के प्रति अपने प्रेम का अधिक प्रदर्शन न करते तो पाक अधिकृत काश्मीर भी आज भारत का ही अंग होता। क्योंकि सरदार पटेल इस राज्य को भारत का अंग उसी दिन घोषित कर चुके थे जिस दिन 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरिंसिंह  ने इस राज्य के भारत के साथ ‘विलयपत्र’ हस्ताक्षर कर दिये थे।

नेहरूजी ने स्वतंत्रता मिलते ही अपनी तुष्टिकरण की नीति का प्रदर्शन कश्मीर से ही प्रारंभ किया था। उन्होंने सरदार पटेल की कश्मीर संबंधी नीति और सम्मति की ओर तनिक भी ध्यान नही दिया था, नेहरू की कश्मीर के प्रति ऐसी उपेक्षापूर्ण नीति से दुखी होकर सरदार पटेल  ने 23 दिसंबर 1947 को त्याग पत्र का प्रारूप नेहरू जी को प्रेषित करने के लिए तैयार कर लिया था। परंतु इस प्रारूप को नेहरू को भेजने से पहले ही उन्हें मना लिया गया था।

ऐसे व्यावहारिक दृष्टिकोण के धनी, ओजस्वी, तेजस्वी, मनस्वी और तपस्वी तप:पूत को कांग्रेसियों और कांग्रसी सरकारों ने आज तक उपेक्षित किया है, जो कि एक अक्षम्य अपराध है। कश्मीर के विषय में सरदार पटेल ने एच.वी. कॉमत से कहा था कि यदि जवाहरलाल नेहरू और गोपालसामी अयंगर कश्मीर मुद्दे पर हस्तक्षेप नही करते और उसे गृहमंत्रालय से अलग न करते तो मैं हैदराबाद की भांति ही इस मुद्दे को भी बड़ी सरलता से देशहित में सुलझा लेता।

काश्मीर के प्रति सरदार पटेल जितना अधिक जागरूक रहे उतना  उस समय का कोई अन्य कांग्रेसी नेता नही था। आज कांग्रेस भीतर भी सरदार पटेल के प्रति यदि सहानुभूति और सम्मान का माहौल बना है तो यह एक अच्छी बात है, कांग्रेस में बुद्घिजीवी रहे हैं और आज भी हैं, जो सच को समझते भी हैं, जानते भी हैं और मानते भी हैं। ऐसी मानसिकता के कांग्रेसियों ने किसी एक परिवार की परिक्रमा से बाहर निकलने का प्रयास किया है जिसका प्रमाण उक्त लेख है, तो इसका स्वागत होना ही चाहिए।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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