ईसा की वैदिक-शिक्षाएं

  • 2015-12-23 03:34:17.0
  • राकेश कुमार आर्य

वैराग्य पूर्णं जीवन शैली ने आपको जॉन नामक महात्मा से मिलने के लिए प्रेरित किया। ये महात्मा स्वयं आपके व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुए। जॉर्डन नदी में डुबकी लगाकर आपने दिव्य ज्ञान की प्राप्ति की। इस डुबकी लगाने को ही दीक्षा ग्रहण भी माना जाता है। आप चालीस दिन तक जंगल में निराहार तपस्या करते रहे। लोगों ने आपको शिव संकल्प तोडऩे के लिए भांति-भांति की यातनाएं दी पर आप शांतमना और स्थिर चित्तावस्था से अपने पथ पर दृढ़ रहे। जंगल में आपने पर्वत पर चढक़र अपने श्रद्घालु भक्तों को उपदेश प्रदान किया। जोकि ईसाई जगत में ‘सेरेमन ऑन दि माउंट’ के नाम से विख्यात है। यह उपदेश वेद के सर्वथा अनुकूल था। वेद की मान्यता है कि हमारा मन सभी संकल्पों विकल्पों का जनक है। अत: इसका शिव संकल्प वाला होना अनिवार्य है। इंद्रियों के स्वामी मन की विजयोपरांत ही ईश्वरीय दर्शन सुलभ होंगे। आपकी भी मान्यता थी कि-

‘‘धन्य हैं वे जिनका मन शुद्घ है, क्योंकि उन्हें परमेश्वर के दर्शन होंगे। ‘पशून पाहि’ अर्थात पशुओं की रक्षा करो। और मां हिंसी तन्वा: अर्थात शरीर से हिंसा मत कर, वेद की ये पावन आज्ञाएं हमें प्राणिमात्र के प्रति अहिंसक व दयालु होने का ही संदेश दे रही है। हमारे मनीषियों ने दया को धर्म का मूल स्वीकार किया है। यजुर्वेद की आज्ञा है-‘मित्र स्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे (यजु 36/18) अर्थात मैं सब प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखता हंू। वेद की इस प्रकार की दयालुतापूर्ण बातों को आपने भी स्वीकार किया और कहा-

‘‘धन्य हैं वे जो दयालु हैं, क्योंकि वे ईश्वर की दया प्राप्त करेंगे।’’ वैदिक संस्कृति में धर्म को कर्म और विज्ञान का समुच्चय स्वीकार किया गया है। धर्म से अभ्युदय की प्राप्ति और नि:श्रेयस की सिद्घि होना माना गया है। संक्षेप में कहें तो जिससे लोक और परलोक दोनों ही सुधरे वही धर्म है। ऐसे ‘धर्म’ के बिना मनुष्य पशु के समान है। धर्मेण हीना पशुभि समाना:’’ आपकी भी मान्यता थी कि-‘धन्य हैं वे जिन्हें धर्म की भूख है, क्योंकि उनकी भूख तृप्त हो जायेगी।’’ हमारी मान्यता रही है कि ‘विद्या ददाति विनयम्’ अर्थात विद्या विनम्रता प्रदान करती है। ‘ज्ञानेन हीना पशुभि समाना:’ यह उक्ति भी सत्य है। विद्या पदार्थ के यथार्थ स्वरूप का सत्य ज्ञान कराती है। आत्म तत्व के जिज्ञासु के लिए जब आत्म तत्व भी प्राप्त कर लिया जाता है। श्रद्घा उमड़ कर आंखों में नम्रता ला ही देती है। इसीलिए आपका भी आदेश था-‘धन्य हैं वे जो नम्र हैं, क्योंकि उन्हें स्वर्ग का राज्य मिलेगा।’
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संसार से संग है तो ये सारवान है। संग नहीं तो असार है। जगत का व्यापार संसार में चल रहा है। आवागमन लगा हुआ है। काल पटल पर सब दौड़ लगा रहे हैं, और कोई दौड़ नहीं रहा। जन्म और मृत्यु के अंतद्र्वन्द्व से सभी ग्रसित हैं और कोई ग्रसित नहीं। यही सब संसार का, जगत का मायाजाल है। मायाजाल में हम सब फसकर जीवन को विनाश की ओर प्रेरित करने वाली प्रवृत्तियों के दास हैं। हर व्यक्ति एक दूसरे से कुंठित है, तनावग्रस्त है। हम एक दूसरे की जड़ काटने में बड़े कुशल हैं। संसार से मानवता पलायन कर गयी लगती है। मनुष्य बनकर एक दूसरे के सहयोगी और सहभागी बनने की हमारी भावना मृतप्राय हो गयी है। वेद ने चेताया था-

‘मनुर्भव जनया दैव्यं जनम’। (ऋ.10/53/6) अर्थात् देवों की हितकारी संतान को उत्पन्न कर। वेद का कहना है कि स्वयं मनुष्य बन और संसार को जोडऩे वाली उत्तम संतान उत्पन्न कर। ईसा का संदेश था-

‘धन्य हैं वे जो मेल कराने वाले हैं, वे ईश्वर की संतान कहलायेंगे।।’’ प्रभु ईसा के आदर्श कतिपय वेदानुकूल ही थे।

आपके आदर्श भी सर्वथा वेदानुकूल थे। आपका कहना था-जब दान दो तो उसका ढोल न पीटो जैसा कि ढोंगी लोग करते हैं ताकि लोग उनकी बड़ाई करें। तुम दान दो तो तुम्हारे बांए हाथ को ज्ञान न होने पाये कि आपका दाहिना हाथ क्या कर रहा है। वेद भी दान की भावना का हिमायती है। उसका पवित्र निर्देशन है-

‘आयुर्यज्ञेन कल्पताम्...यज्ञोयज्ञेन कल्पताम्।’ (यजु. 22/33)

अर्थात् आयु यज्ञ से सफ ल हो,...यज्ञ यज्ञ से सफ ल हो। यज्ञ त्याग अर्थात् दान की सर्वोत्कृष्ट भावना का नाम है। वेद ने यज्ञ से जीवन को तो सफ ल माना ही है, यज्ञ को भी यज्ञ की (अर्थात् त्याग की) भावना से ही सफ ल माना। कहने का अभिप्राय है कि त्याग का भी त्याग वेद का परमादेश है।

ईसा का आदर्श था कि जो व्यवहार आप दूसरों से -

‘‘अपने प्रति चाहते हो, वैसा ही व्यवहार तुम दूसरों के प्रति करो।’’

वैदिक संस्कृति में भी इस भावना की पूजा होती है। यहां भी माना गया है-

‘‘आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत।’’

अर्थात जो व्यवहार आपको दूसरों से अपने प्रति अच्छा न लगे उसे दूसरों के साथ भी मत करो।

आपकी मान्यता थी कि-

‘‘जो कोई मेरे उपदेश सुनेगा और उनके अनुसार आचरण करेगा, उसे मैं उस बुद्घिमान मनुष्य के समान मानूंगा जिसने कि चट्टान पर अपना मकान बनाया जो वर्षा बाढ़ और आंधी आने पर भी गिरा नहीं।’’


वेद भी आचरण पर विशेष बल देता है। आचरण की सभ्यता के बिना सारा ज्ञान तीतर के हाथ बटेर’ वाली बात को ही चरितार्थ करता है। आचरणशील उपदेशक में (ऋग्वेद 5/65/2) उपदेश्य विषय का ज्ञान सदाचार, ईश्वर निपुण, प्रभु की भक्ति, न्यून से न्यून इतने गुण तो होने ही चाहिये। जिस आचरणशील व्यक्ति में ऐसे गुण होंगे वह ही सच्चा उपदेशक हो सकता है।

प्रभु यीशु का मानना था कि ‘पाप से घृणा करो। पापी से नहीं।’ पापी को तो संभव है कि देर सवेर सद्विवेक की प्राप्ति हो जाये और वह पुन: सदाचरणशील बन जाये। किंतु आपने स्वयं यदि पाप से घृणा करना नहीं सीखा तो अनर्थ हो सकता है। आज के विश्व में ऐसा ही तो हो रहा है कि लोग पापी से तो घृणा करते हैं, पाप से नहीं।

प्रभु ईसा की ऐसी शिक्षाएं मानवता के लिए आज भी अनमोल ध्रोहर हैं। आपके धर्म का आधर ‘प्रेम’ और क्षमा रहा। इन दोनों पुष्पों ने आपके जीवन को भी सुगंधि का पर्याय बना दिया। यह मानवता के लिए और विश्व समाज के लिए दुर्भाग्य पूर्ण तथ्य रहा कि आपके अनुयायी आपकी शिक्षाओं का अक्षरश: पालन करने में असमर्थ रहे। सम्प्रदाय और धर्म के नाम पर जिन लोगों ने दूसरे लोगों पर अपनी विचारधारा, सभ्यता और संस्कृति को बलात थोपने का नैसर्गिक न्याय के विरूद्घ कार्य किया, उनमें आपके अनुयायी भी अग्रणी रहे हैं। पिछले दो हजार वर्ष का इतिहास विश्व में सम्प्रदायवाद के नाम पर किए गये युद्घों से रक्त रंजित है। कितनी बड़ी त्रासदी है कि जो व्यक्ति प्रेम और क्षमा के आदर्शों के लिए आजीवन संघर्षरत रहा, उसी के अनुयायियों ने उसकी शिक्षाओं को इस प्रकार उपहास और तिरस्कार का पात्र बना दिया।