रैलियों का रैला

  • 2016-07-14 04:23:11.0
  • राकेश कुमार आर्य

raily

स्वतंत्रता पूर्व पुरूषार्थी, उद्यमशील, राष्ट्रप्रेमी, राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व होम करने वाले, राष्ट्र की बलिवेदी के परवाने हमारे नेतागण जनता का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने में सफल होते थे। उनके संकेत की देर होती थी कि भीड़ अपने आप जुट जाती थी।

इसी दौर में आर्य समाज भी अपने उत्कर्ष पर था, इसके पास भी एक से बढक़र एक समाज और धर्म के सुधारक, राष्ट्रोद्घारक मानुष मोती थी। लगता था कि जैसे पूरा राष्ट्र और राष्ट्रीय आंदोलन 'आर्यसमाजमय' हो गया था।

इसके नेताओं के आह्वान को, अपील को, पुकार को, ललकार को और जोशीली हुंकार को सुनकर राष्ट्र और धर्म पर मर मिटने के लिए जवानों की बाजुएं फडक़ने लगती थीं, चेहरा तमतमा जाता था उनका जोश मर मिटने की प्रेरणा देने लगता था।

पर स्वतंत्रता के पश्चात स्थिति में आमूलचूल परिवर्तन आ गया। अब न तो भारत की जनता को नेताओं पर विश्वास रहा और न ही आर्यसमाज पर। राजनीति को भ्रष्टाचार और व्यभिचार की जंग लग गयी तो आर्यसमाज को निष्क्रियता, प्रमाद, स्वार्थ, आलस्य और अहम ने घेर लिया।

अब उन आर्यसमाजियों को जो अज्ञान अंधकार में भटकती जनता के लिए गड्ढों में कूद जाया करते थे और अपनी हुंकार भरी फुंकार और पुकार से लोगों के मानस को आंदोलित कर दिया करते थे उन्हें जनता के सब लोग स्मरण करते हैं, और कहते हैं-

-कहां गये वे लोग?
-कहां गयी उनकी दीवानगी?
-कौन खा गया उनके जोश को?
-किसने लील दी उनकी विरासत?

-कौन है इस बात का उत्तरदायी?

आज का समाज इसका निर्णय करे। प्रारंभ में तो जनता इन रैलियों, जलसों व जुलूसों में स्वेच्छा से जाया करती थी, फिर उसने जब देखा कि स्वार्थी और राष्ट्रद्रोही लोग मूर्ख बनाकर अक्ल बेचने के धंधे में लगे हैं तो उसने इन सब बातों से मुंह फेर लिया है।

जनता की इस 'मुंह-फेर-नीति' को ठीक करने के लिए हमारे जननेताओं ने अपनी शान के विरूद्घ समझा। अत: उन्होंने रियायत (सब्सिडी) देना आरंभ कर दिया। अर्थात लोगों को आने-जाने के लिए अपनी गाडिय़ां और अन्य वाहन देने आरंभ कर दिये।

कहते हैं बेचारे कि आप हमारे सम्मेलन में अवश्य आएं, तुम्हें ले जाने के लिए हम स्वयं आएंगे, आप केवल हमें सुन जाओ। जनता ने इस आने-जाने की सुविधा की 'सब्सिडी' का मुद्दा उठाया कि यह 'सब्सिडी' कम है। किंतु फिर भी बात नही बनी। फिर बात बिगड़ती देख इन नेताओं ने और भी 'सब्सिडी' दी, और कहा-

''हम खाना नि:शुल्क देंगे। जो मजदूर हैं उनकी दिहाड़ी (पारिश्रमिक) भी देंगे बस! आप आ जाओ, हमें सुनो और हमारा मनोबल बढ़ा जाओ।''


आज स्थिति यह हो गयी है कि लोग दिहाड़ी लेकर, खाना लेकर और भी सुविधाएं लेकर जाने को तैयार नही हैं। क्योंकि नेताओं के आचरण भ्रष्ट हो गये हैं और उनके कृत्य निकृष्ट हो गये हैं।

जिस राष्ट्र के नेताओं को जनता में इतना सम्मान भी प्राप्त नही है कि उनके आह्वान पर वह जनता मैदान में उतर आये, उनकी आवाज के पीछे चलती हुई वहीं पहुंच जाए, जहां वह पहुंचाना चाहता है, तो ऐसे नेताओं की निष्ठा पर अपने आप ही प्रश्नचिन्ह लग जाता है। स्वार्थ और तिजोरी भरने की प्रवृत्ति चोरों की होती है, राष्ट्रनायकों की नही। 'जूदेव' और 'जोगी' प्रकरण जिस राष्ट्र के नायकों का चरित्र बन गया हो उन्हें चोर तो माना जा सकता है, परंतु 'राष्ट्रनायक' कदापि नही।

जनता तो नायकों के पीछे चला करती है, चोरों के पीछे नही। क्योंकि उसे चोरी में से हिस्सा नही चाहिए, अपितु राष्ट्र के मूल्यों का संरक्षण, संवद्र्घन और पोषण चाहिए। वह उसे जहां भी मिलेगा, वह उसी और भूखे शेर की भांति टूट पड़ेगी।

रैलियों के रैले से राष्ट्र को भ्रमित किया जा सकता है, राष्ट्र का नेतृत्व कदापि तैयार नही किया जा सकता। रैलियों के प्रति भारतीय जनसामान्य की उपेक्षावृत्ति इसी बात का प्रमाण है। जो धूर्त अभी भी इसी धंधे में लगे हुए हैं वह इस युग के सबसे बड़े छद्म 'कलाकार' हैं। राष्ट्र को इन कलाकारों को पहचानना होगा। कहते हैं 'यथा राजा तथा प्रजा' अर्थात जैसा राजा होगा वैसी ही प्रजा होगी। जब राजा (शासक वर्ग) ने जनता का मूर्ख बनाना प्रारंभ कर दिया तो जनता ने अब उनका 'कलमा' पढऩा आरंभ कर दिया है।

अभी हाल ही में देश के राजस्थान, छत्तीसगढ़, दिल्ली, मध्य प्रदेश और मिजोरम प्रांतों में विधानसभा के चुनाव कराये गये हैं। इन चुनावों में स्थानीय जनता ने चुपचाप अपने मत का उपयोग कर बहुत से नेताओं का कलमा पढ़ दिया। जो आश्वासन झूठे तौर पर ये लोग जनता को अपने घरों पर दिया करते थे, वहीं झूठे आश्वासन जनता ने इन्हें मत देने के बारे में दिये और मत वहीं दिया जहां देना था।

परिणामस्वरूप सबके सर्वेक्षण निष्फल हो गये, अनुमान और दावे सबके सब गलत सिद्घ कर दिये। झूठों, चालबाजों और कोरे आश्वासनों के सपने दिखाने वालों को जनता ने 'तुर्की ब तुर्की' उत्तर दे दिया। अन्यथा इसी देश में एक वह भी दौर था जब जनता जिससे मत देने के लिए 'हां' कर लिया करती थी, मत उस प्रत्याशी को ही मिलता था। पर आज नेताओं के भ्रष्ट आचरण से दुखी जनता ने अपनी कार्यप्रणाली में भी परिवर्तन कर लिया है। स्पष्ट है कि नेता ही वे धूर्त हैं जिनकी धूर्तता से राष्ट्र के मूल्य उजड़ रहे हैं। अब आवश्यकता है कि-चइन राष्ट्रद्रोहियों की पहचान हो।

-इनके कार्य-व्यवहार की पहचान हो।
-इनके क्रियाकलापों की पहचान हो।
-इनकी मानसिकता की पहचान हो।

लगता है जनता अब समझ गयी है कि खोखले वृक्षों से तूफान के समय में लिपटना अपनी मृत्यु को निमंत्रण देना है। अत: बुद्घिमत्ता इसी में है कि इनसे किनारा किया जाए। इसीलिए इस लेखनी को यह भी लिखना पड़ रहा है कि-

''जो नेता दूसरों को समझा रहे थे कि तुम्हारी औकात क्या है?
जनता ने उन्हें ही समझा दिया कि तुम्हारी औकात क्या है?
झंडा लेकर मूल्यों का जो बने हुए थे राष्ट्र के पहरेदार,
उन्हें समझा दिया गया कि पहरेदारी की कीमत क्या है?''

(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडयंत्र : दोषी कौन?' से)