‘दूध में शक्कर की तरह मिल जाओ’

  • 2015-11-05 02:30:52.0
  • राकेश कुमार आर्य

दूध में आप नींबू डालें। देखें कि क्या प्रतिक्रिया हुई? दूध देखने पर ज्ञात हुआ कि नींबू का रस दूध में जाते ही दूध फ ट गया। अत: दूध के लिए नींबू का संस्कार बना-फाड़ना, नींबू-दूध के साथ मिलकर नहीं रह सकता। इसलिए उसने दूध के साथ विखण्डन पैदा कर दिया। भारी विनाश पैदा कर दिया और पता चला कि दूध अपने दूधत्व की और अपने अमृतपन की रक्षा नहीं कर पाया। अब इसी प्रकार आप दूध में शक्कर डालो। इसे भी देखो कि क्या प्रतिक्रिया हुई? शक्कर उसके अणु-अणु में रम गयी और उसके साथ एक रस होकर एकाकार हो गयी। अब आपसे कोई कहे कि जरा दूध से शक्कर को अलग कर दो, तो आप उसे ये ही कहेंगे कि ऐसा होना अब असम्भव है। क्योंकि शक्कर का मूल स्वभाव है, संस्कार है, और उसका अपना गुण है कि वह दूध के साथ ‘एकरस’ रह सकती है।human_body_lies_soul


गीता में श्रीकृष्ण जी महाराज ने श्रद्धा के तीन रूप बताये हैं। उनका कहना है कि श्रद्धा सात्विक, राजसिक एवम् तामसिक हो सकती है। जो लोग देवताओं की संगति करते हैं, उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की स्तुति करते हैं, उनके सत्कार्यों को अंगीकार कर उन्हें अपने जीवन में ग्रहण करते हैं, वो लोग सात्विक श्रद्धा (यहां श्रद्धा एक संस्कार मानी जा सकती है) के स्वामी होते हैं। उनके जीवन से प्रेरणा लेते हैं और संसार में नित्य प्रगति करते हैं। ये लोग दूसरों से मिलकर चलते हैं और दिव्य मानव समाज के निर्माण के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। दूसरे राजसिकश्रद्वा के लोग हैं। ये लोग यक्षों (जो ना तो देवता हैं और ना ही राक्षस हैं) और राक्षसों की पूजा करते हैं। सोचा जा सकता है कि क्या राक्षसों की पूजा करने वाले लोग भी कभी हुए हैं, या हो सकते हैं? जी हां, ये लोग हुए भी हैं और हैं भी। रावण और दुर्योधन को सम्मान देने वाले लोग उनके काल में भी विद्यमान थे और आज भी हैं, ओसामाबिन लादेन को सारा संसार आतंकी मानता रहा है, पर इसके उपरान्त, उसके प्रशंसक लोग भी इसी संसार में हजारों लाखों की संख्या में हैं। ऐसे लोग ही राजसिक श्रद्धा के पुजारी होते हैं। ये लोग समाज के लिए विखण्डन और अलगाव की बातें करते हैं और राष्ट्रीय समाज में आतंक मचाते हैं।

आप इसके लिए एक डकैत का उदाहरण भी ले सकते हैं। एक डकैत के प्रति भी श्रद्धा दिखाने वाले उसके शिष्य अथवा अनुयायी आपको मिल जायेंगे। जैसे ही डकैत किसी पुलिस मुठभेड़ में या अन्य किसी घटना में मारा जाता है तो उसकी ‘गद्दी’ का उत्तराधिकारी किसी को उसी प्रकार बनाया जाता है जैसे एक राजा के मरने पर उसके राजकुमार को उसका उत्तराधिकारी बनाया जाता है। एक शिष्य को अपने गुरू का उत्तराधिकारी बनने पर बड़ी प्रसन्नता होती है और वह भी अपने गुरू के बताये मार्ग पर चलकर उसके अधूरे कार्यों को पूर्ण करने की शपथ लेता है। तब उसके लिए वहां भी तालियों की गडगड़ाहट होती है। मानो, जाने वाला डकैत संसार में पुन: जीवित हो उठा हो। अत: सिद्ध हुआ कि संसार में राजसिक श्रद्धा के लोग भी रहते हैं।

अब तामसिक श्रद्धा के लोगों पर आते हैं। ये लोग वो हैं जो समाज में भूत प्रेतों की बातें करते हैं और उनकी पूजा में लगे रहते हैं। किसी पीपल के वृक्ष के नीचे ये भूत मानते हैं, किसी व्यक्ति पर भूतों का प्रभाव मानते हैं, इत्यादि। आज भी छोटे वर्ग के लोग इसी प्रकार के कार्यों में लगे रहते हैं। पर दु:ख जब होता है कि जब किसी शिक्षित व्यक्ति को भी ऐसे ही कार्यों में लगे देखते हैं। इसका अभिप्राय ये भी है कि शिक्षित हो जाना भी तामसिक श्रद्धा के भ्रमजाल से ऊपर उठ जाने के लिए पर्याप्त नहीं है। जैसी जिसकी श्रद्धा होती है, वैसा ही उसका भगवान होता है।

सात्विक श्रद्धा का व्यक्ति अपने ईश्वर को असीम, अनन्त, सर्वाधार, सर्वव्यापक आदि दिव्य गुणों से परिपूर्ण मानता है। इसलिए उसकी दृष्टि में, दृष्टि और दृष्टिकोण में व्यापकता होती है, विशालता होती है, महानता होती है। वह जग के कण-कण में रचे बसे एवम् रमे हुए अपने प्यारे प्रभु के दर्शन करता है। जबकि राजसिक वृ़ित्त का व्यक्ति आवश्यक नहीं कि ऐसा ही मानता हो और तामसिक वृत्ति के लोगों से तो ऐसी अपेक्षा ही नहीं की जा सकती। क्योंकि उन पर अज्ञान और अविद्या का गहन अन्धकार (तमस) छाया पड़ा है। इसलिए इसी वर्ग के उत्थान और उद्वार के लिए महापुरूष प्रयास किया करते हैं। राजनीतिज्ञ (राजसिक वृत्ति का व्यक्ति) इनकी अविद्या और अज्ञान की स्थिति का लाभ उठाता है और एक समाज सुधारक (सात्विक वृत्ति का व्यक्ति) इनके कल्याण के लिए कार्य करना चाहता है। क्योंकि महापुरूषों का ये संस्कार होता है कि वह लोकोपकार को अपना ध्येय बनाकर चलते हैं। भगवद्भक्ति उनके जीवन का श्रंगार होती है और मानवभक्ति उनका संस्कार होता ह ै। सात्विक विचारधारा के लोग चाहे कहीं भी जायें वो ‘शक्कर’ के संस्कार है।  क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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