‘दूध में शक्कर की तरह मिल जाओ’ भाग-2

  • 2015-11-06 02:56:01.0
  • राकेश कुमार आर्य

humanमानव समाज में दूध में शक्कर की भांति एकरस जाते हैं। उन्हें अपने आप से अलग करना लोगों के लिए कठिन हो जाता है। उदाहरण के लिए भारत का पारसी समाज है। कहते हैं कि ईरान पर जब यज्दगई का शासन था तो अरब वालों ने ईरान पर हमला बोल दिया और वहां के लोगों को एक झटके में ही मुसलमान बना डाला था। इस हमला से भयाक्रान्त कुछ धनी-मानी पारसी (ईरान के मूल समाज के लोग) नावों से भारत की ओर भाग आये। उस समय गुजरात पर जाधव राणा नामक हिन्दू शासक का राज्य था। पारसी लोगों ने राणा राजा को अपनी व्यथा कथा सुनायी और अपने पुनर्वास की बात कही।

जाधव राणा पारसी लोगों को अपने पास रखने के लिए तैयार हो गया, पर उसने पारसी लोगों के सरदार से कहा कि ‘‘हम आपको रख तो लेंगे, पर ये बताओ कि आप बदले में हमारे देश को क्या देंगे?’’

इस पर पारसी लोगों के सरदार ने कहा कि राजन: एक मटका और उसके लिए कुछ दूध की व्यवस्था करायें। राजा ने तुरन्त ऐसी व्यवस्था करा दी। दूध से भरा मटका राजदरबार में रखा था। सभी लोगों की जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी कि अन्तत: पारसी लोगों का सरदार इस दूध के मटके से राजा के प्रश्न का क्या उत्तर देगा? इसी जिज्ञासा और कौतूहल के परिवेश में पारसी सरदार उठा और उसने दूध के मटके में अपनी पोटली में बंधी हुई शक्कर डाल दी। तब उसने राजा से कहा कि राजन! जिस प्रकार ये शक्कर इस दूध में घुल मिलकर एकरस हो गयी है, इसने सारे दूध में मिठास उत्पन्न कर दी है, उसी प्रकार हम आपके देश के समाज में घुल मिल जायेंगे, हम उसमें अपनी मिठास की शक्कर घोल देंगे। हम आपके समाज की प्रगति में सहायक बनेंगे, अवरोध नही।

सैकड़ों वर्ष पूर्व पारसी लोगों ने भारत को जो आश्वासन दिया था उसे वो लोग आज तक यथावत निभा रहे हैं। भारत के वृहत हिन्दू समाज ने भी पारसी समाज को अपने साथ इस प्रकार मिला लिया है कि जैसे ये उसके अपने समाज का ही एक अंग है। हिन्दू समाज ने अपनी वास्तविक पन्थनिरपेक्षता का उदाहरण प्रस्तुत किया तो पारसी समाज ने अपनी वास्तविक भारत भक्ति का परिचय दिया है। परिणाम हमारे सामने है कि हम दोनों वर्गों के लोगों के सामूहिक प्रयास से एक मिठास भरे सामाजिक परिवेश में रह रहे हैं।

पारसी लोगों ने सिद्ध कर दिया कि जैसे एक कन्या श्वसुरालय में जाने पर अपने पितृपक्ष की परम्पराओं को त्यागकर अपने पति के परिवार की परम्पराओं का निर्वाह करने लगती है और पति के परिवार के देवताओं को अपना देवता और कुल गुरू को अपना गुरू स्वीकार करती है, तथा परिवार में शक्कर बनकर घुल मिल जाती है उसी प्रकार पारसी लोगों ने कर दिखाया। जो कन्या अपने पति के परिवार के साथ जाकर घुलती मिलती नहीं वह उस परिवार के लिए नींबू बन जाती है, और उसके दूध को (परिवेश) फ ाड़ देती है। घर-घर में परिवारों में जो आज सास बहू के झगड़े दिखायी देते हैं, उनके पीछे कारण ये ही है कि कहीं कन्याऐं नींबू बन रही हैं, तो कहीं सास उसे बलात नींबू बना रही है। जो लोग राष्ट्रीय समाज में अपनी अलग मान्यताऐं, अपनी अलग परम्पराऐं और अपनी अलग पहचान बनाकर चलते हैं वह समाज और वह देश टूट जाता है। इसलिए देश में जातिवाद और सम्प्रदायवाद एक प्रकार का अभिशाप माने जाते हैं।

समाज के चिन्तनशील लोग इन्हें समूल नष्ट करने के लिए प्रयास करते रहते हैं। समाज के न्यायशील लोग सभी के साथ समानता का समाज के न्यायशील लोग सभी के साथ समानता का समाज के न्यायशील लोग सभी के साथ समानता का व्यवहार करते हैं। इस न्यायशील आचरण को ही पन्थ निपेक्षता व्यवहार करते हैं। इस न्यायशील आचरण को ही पन्थ निपेक्षता कहा जाता है। मुंशी प्रेमचन्द ने कहा है कि न्यायशील व्यक्ति वही है जो दूध का दूध और पानी का पानी कर दे। पारसी समाज भारत की उन्नति को अपना आत्मिक, आध्यात्मिक, राजनीतिक, आर्थिक विकास करने का पक्षपातशून्य परिवेश उपलब्ध कराये। जो लोग ये मानते हैं कि शक्कर जब दूध में मिल जाती है तो उसका अस्तित्व समाप्त हो गया और हम अपना अस्तित्व दांव पर नहीं लगा सकते, वह लोग भूल जाते हैं कि दूध में शक्कर मिलकर मिटी नहीं, अपितु उसके व्यक्तित्व का और भी विकास हो गया, उसमें विशालता आ गयी। जो व्यक्ति समाज में घुल मिलकर चलते हैं और निरन्तर अपने सत्कार्यों की मिठास छोड़-छोड़ कर समाज के परिवेश को रस भरा बनाने का प्रयास करते रहते हैं उनके व्यक्तित्व का निरन्तर विकास होता रहता है, और लोगों को वह व्यक्ति ‘महान’ दीखने लगता है। इसलिए ऐसे लोगों के प्रति समाज आदर भाव प्रकट करने लगता है। उसकी सर्वत्र पूजा होने लगती है-

‘‘बस, पक्षपात से न्यायशील डरते हैं।

आत्मा का भी विरोध नहीं करते हैं।।’

मानो मैथिलीशरण गुप्त कह रहे हैं कि न्यायशील बन जाओ अर्थात दूध और शक्कर बन जाओ। जैसे दूध अपने आप में मिली हुई शक्कर को इसलिए सम्मान देता है कि उसके मिलने से उसकी अपनी मिठास बढ़ी है और शक्कर दूध को इसलिए सम्मान देती है कि उसके दूध में मिलने से उसके अपने व्यक्तित्व में विशालता आयी है। उसी प्रकार एक दूसरे के गुणों का सम्मान करते हुए अपनी न्यायशीलता का परिचय दो। आत्मा का विरोध मत करो, अर्थात नींबू मत बनो, कहीं पर भी विखण्डन की बात मत कहो और मत करो।

एक-एक व्यक्ति से राष्ट्र बनता है, इसलिए एक-एक व्यक्ति की ऐसी सोच के मिठास भरे हुए सामाजिक परिवेश का निर्माण होता है। शक्कर और दूध की तरह एकरस बने राष्ट्रों के समाज ही उन्नति करते हैं, और नया इतिहास लिखते हैं।

देश की वर्तमान राजनीति का यह दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष है कि यहां लोग नींबू बनने का प्रयास कर रहे हैं। असहिष्णुता की नई बहस को जन्म देकर अपने नींबूपन को नेताओं ने और भी हवा दी है। जबकि सच ये है कि 1947 से लेकर अब तक भारतवर्ष में पंथनिरपेक्षता केवल इसलिए जीवित रही कि यह देश हिंदू राष्टï्र है। हिंदू राष्टï्र में ही ‘सबका विकास और सबका साथ’ सम्भव है। देश के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में ईमानदारी से देख लिया जाए कि क्या वहां भी इस नारे का सम्मान किया गया है? असहिष्णुता के नाम पर नींबू बने राजनीतिज्ञों को अपने प्रश्नों का उत्तर अपने आप मिल जाएगा।