धर्म और मजहब (सम्प्रदाय) में अंतर

  • 2015-09-08 15:40:28.0
  • विकास राणा

1.धर्म का आधार ईश्वर और मजहब का आधार

मनुष्य है,धर्म उस ज्ञान का नाम है जिसे मनुष्यों और प्राणिमात्र के कल्याण  के लिए परमात्मा ने आदि स्रष्टि में प्रदान किया, मजहब वह है जिसे मनुष्यों ने समय समय पर अपनी आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए स्वीकार किया और पुन: स्वार्थ सिद्धि के लिए उसका विस्तार किया।

2.धर्म ईश्वर प्रदत्त है इसलिए एक है इसमें हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई, यहूदी, पारसी किसी के लिए भी भेद भाव नहीं, इसके विपरित मत मतान्तर अनेक मनुष्यों के बनाये होने के कारण अनेक हैं और अपने अनुयायियों के पक्षपात से भरे पडे हैं। इसलिए मुहम्मद अली ने सन् 1924 में कहा था कि बुरे से बुरा मुसलमान गांधी जी से अच्छा है क्योंकि वह पैगम्बर पर ईमान लाया है, गांधी जी ईमान नहीं लाये इसलिए स्वर्ग का दरवाजा उनके लिए बन्द है।

3.धर्म सबका साझा है क्योंकि ईश्वर की देंन है।

मजहब अपना अपना है सबका समान नहीं।

4.धर्म सदा से है नित्य है इसलिए उसका नाश नहीं, मत मतान्तर नवीन हैं, मनुष्यों द्वारा बनाये हुए हैं, इसलिए उनका नाश अवश्यभावी है।

5.धर्म बुद्धि, तर्क और विज्ञान का उपासक है, धर्म से कोई इन्कार नहीं कर सकता। मजहब या मत बुद्धि, तर्क और विज्ञान का विरोधी है, इसका मानना न मानना इच्छा पर आधारित है, आवश्यक नहीं।

6.धर्म कर्मानुसार फल की प्राप्ति मानता है। मजहब या सम्प्रदाय सिफारिश और शफाइत पर अवलम्बित है। मजहब में जब तक हजरत मुहम्मद ईसा मसीह या कोई अवतार माना जाने वाला सिफारिश न करे, स्वर्ग का द्वार बन्द रहेगा और सिफारिश होने पर पापी से पापी भी स्वर्ग में प्रवेश पायेगा।

7.धर्म ईश्वर से मनुष्यों का सीधा सम्बन्ध बताता है, वह आत्मा और परमात्मा के मध्य मे किसी पीर, पैगम्बर, गुरु, ऋषि, मुनि, अवतार आदि की आवश्यकता नहीं समझता। मजहब या सम्प्रदाय ईश्वर और मनुष्यों के बीच में अपने अपने एजन्टों को ला खडा करता है।

8.धर्म प्राणिमात्र के सुख के लिए है और मत मतान्तर या सम्प्रदाय केवल अपने अनुयायियों के सुख की जिम्मेदारी लेता है क्योंकि

मजहब के मानने वाले मोमीन और शेष सब काफिर हैं ऐसा उनका द्रष्टिकोण है। धर्म का आधार केवल ईमान है। मजहब पर ईमान लाओ और सब प्रकार की मौज उडाओ। फिर कोई रोकने वाला नहीं। मुहम्मद और ईसा मसीह पर विश्वास करो, बस बेडा पार है।

9.धर्म मनुष्य के पूर्ण जीवन का पुरोगम बताता है, और वर्णाश्रम प्रणाली द्वारा उसको उन्नत बनाता है परन्तु मजहब में ऐसा कोई पुरोगम नहीं वह केवल मनुष्यों को पशु जीवन बिताना सिखाता है।

10.धर्म में स्रष्टि के नियम के विरुद्ध कुछ नहीं। मजहब स्रष्टि नियमों से विरुद्ध भरे पडे हैं जैसे-एक स्त्री पुरुष से सारी स्रष्टि का बनना मानना, मुर्दों का जीवित हो जाना, ईसा का कुवांरी मरियम के पेट से पैदा हो जाना, हनुमान का सूर्य को मुंह में डाल लेना, पत्थर पर मूसा के डण्डा मारने से सात चश्मों का बह निकलना आदि।

11. धर्म स्त्री पुरुष को समान अधिकार देता है। मजहब स्त्रियों को नरक का द्वार, शैतान की रस्सियां, पापयोनि, दीन, हीन, नीच निर्जीव बता कर के उनके अधिकारों का संहार करता है।

12.धर्म में सत्य, सरलता, संतोष, स्नेह, सदाचार और चरित्र आवश्यक हैं, मजहब इन गुणों की उपेक्षा कर वाह्य चिन्हों को महत्व देता है यथा तिलक लगाना, स्लेब लगाना, दाढी केस रखना आदि। अत: धर्म और मजहब को एक समझना भारी भूल है और यह धर्म विरोध का बडा कारण है।

विकास राणा ( 91 )

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