धंधेबाजों को 30-30 करोड़ के सरकारी पुरस्कार, लेकिन क्यों?

  • 2015-10-28 05:30:06.0
  • डॉ. पुरुषोत्तम मीणा

भारत में प्रतिवर्ष हजारों किसान आत्महत्या करने को विवश हैं, लेकिन उनकी सुधि लेने की किसी सरकार या नीति आयोग के पास फुर्सत नहीं है। कृषि को लाभकारी बनाने के लिये सरकार के पास धनभाव है। सीबीआई का कहना है कि-जनजाति के जाति-प्रमाण-पत्र के आधार पर जितने लोग सरकारी नौकरी कर रहे हैं, उनमें से 30 फीसदी गैर-आदिवासी अर्थात आर्य हैं, जो फर्जी जनजाति प्रमाण-पत्र के आधार पर अवैध रूप से सरकारी नौकरी कर रहे हैं। कमोबेश यही हाल अनुसूचित जाति कोटे का है। लेकिन सरकार के पास इस फर्जीवाड़े की जांच करवाने के लिये धनाभाव है।


इसके विपरीत संघ समर्थक मनुवादी कथित ढोंगी बाबा रामदेव के योगसनों का प्रचार करके के लिये सरकार के पास धन की कोई कमी नहीं है। भ्रष्ट व्यापारियों को बचाने के लिये केन्द्र सरकार ने फैसला किया है कि एक करोड़ तक के कस्टम और एक्साइज कर की चोरी करने वाले धंधेबाजों की गिरफ्तारी नहीं होगी। अर्थात् उच्चश्रेणी के भ्रष्ट-धंधेबाजों को बचाने के लिये धन ही नहीं, कानून को भी ताक पर रख दिया गया है।


अब धंधेबाजों को 30 करोड़ का पुरस्कार : योजना आयोग का नाम बदलकर, जिसे नीति आयोग बनाया गया है, अब उस नीति आयोग ने निर्णय लिया है कि इनोवेशन (गूगल की मदद से आप इनोवेशन को हिन्दी में इन शब्दों में समझ सकते हैं-नवोत्पाद, नूतनव्यवहार, नवपरिवर्तन, नवाचार, नवोन्मेष, नई बात, नवीन प्रक्रिया, नवीन मार्ग, नवरचना, नवप्रवर्तन, नवरीति, नवीनता)
 को बढ़ावा देने वाले उद्यमियों (अर्थात् Entrepreneurs को जिन्हें आम भाषा में उद्यमी, ठेकेदार, व्यापारी या धंधेबाज कहा जा सकता है।) को 30 करोड़ तक का पुरस्कार दिया जायेगा। ऐसे पुरस्कार एक नहीं अनेकानेक उद्ययमियों अर्थात् धंधेबाजों को दिये जायेंगे। दें भी क्यों नहीं, जब लेने और देने वाले दोनों ही उ़द्यमी अर्थात् धंधेबाज हैं। 30 करोड़ के पुरस्कार आखिर क्यों? इसलिये ताकि ऐसे इनोवेशन को बढावा देने से जॉब ग्रोथ को बढ़ाने के लिए उद्यमियों अर्थात् धंधेबाजों के अनुकूल पारिस्थितिकी तंत्र बनाने में मदद मिल सके।


यहां स्पष्ट कर देना जरूरी है कि 26 अक्टूबर, 2015 को जयपुर से प्रकाशित मनुवाद समर्थक दैनिक समाचार—पत्र 'राजस्थान पत्रिका' के मुखपृष्ट पर प्रकाशित खकर में कहा गया है कि ''नीति आयोग के एक पैनल ने सरकार को सुझाव दिया है कि नए आइडिया पेश करने वाले उद्यमियों को 30 करोड़ रूपए का नकद पुरस्कार दिया जाए और इसके लिए मुनाफे का 1 फीसदी अलग रखा जाए। शिक्षाविद तरूण खन्ना के नेतृत्व वाले इस पैनल का गठन नीति आयोग ने किया था। पैनल का काम इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए सुझाव देना और जॉब ग्रोथ को बढ़ाने के लिए उद्यमी के अनुकूल पारिस्थितिकी तंत्र बनाने में मदद करना है।''


जबकि इसके विपरीत लोक-कल्याणकारी संवैधानिक प्रावधानों को कड़ाई से लागू करने। कृषि को लाभकारी बनाकर-कृषक की स्थिति सुधारने। स्त्रियों, बालकों, अल्पसंख्यकों, पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों की जान-माल की सुरक्षा करने। वंचित वर्गों का शतप्रतिशत प्रशासकीय प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने। सूखे, बाढ, आपदा, महामारी आदि से निपटने। एक समान शिक्षा एवं चिकित्सा प्रणाली लागू करने। प्रशासकीय भ्रष्टाचार से निपटने। मंहगी दवा बेचने वालों से कड़ाई से निपटने। कालाधन एवं खाद्यवस्तु जमाखोरों से निपटने। साधू के वेश में धर्म के नाम पर-ढोंग, अंधश्रृद्धा और अन्धविश्वास को बढावा देने/बेचने वालों से निपटने। जैसी अन्तहीन मानवहन्ता विपदाओं से निपटने के लिये केन्द्र सरकार या नीति आयोग कोई इनोवशन क्यों नहीं करना चाहता? क्या गेरुए वस्त्रधारी कथित साधु-संतों, ढोंगी बाबाओं की सुरक्षा एवं संरक्षण के साथ दलित, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों की सरेआम हत्या होने देना और शोषक व्यापारियों अर्थात् धंधेबाजों का हित-लाभ ही वर्तमान सरकार तथा इस सरकार के नवगठित नीति आयोग का एक मात्र लक्ष्य है? अभी तक की गतिविधियों और सरकारी निर्णयों से तो ऐसा ही लगता है!


याद रहे कि केन्द्र और राज्यों में सत्ताशीन भाजपा सरकारें उपरोक्त सब मनमानी केवल इसी कारण नहीं कर रही हैं कि मनुवादी एवं फासिस्ट विचारधारा के पोषक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राजनीतिक विंग—भाजपा को पांच साल के लिये सत्ता मिल चुकी है, बल्कि ऐसा इस कारण से भी संभव हो रहा है, क्योंकि लोकसभा में अजा एवं अजजा का प्रतिनिधित्व करने के लिये सुरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों से निर्वाचित सांसद तथा अजा एवं अजजा का प्रशासनिक प्रतिनिधित्व करने को जाति-प्रमाण-पत्र की बैशाखी के आधार पर चयनित नौकरशाहों को अपने-अपने वर्गों के हितों की तनिक भी चिन्ता नहीं है। अजा एवं अजजा के इन वर्गद्रोही प्रतिनिधियों के मौन या भयाक्रांत या पदलोलुप समर्थन के कारण सरकार की मनमानी बेरोक-टोक बढती ही जा रही हैं!


अत: विचारणीय विषय है कि—



  • 1. यदि हम आरक्षित अनार्य वर्ग के आम लोग अपने ही जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक प्रतिनिधियों को अपनी पीड़ा तथा दर्द को नहीं समझा सकते तो फिर सरकार को कैसे समझा पायेंगे?

  • 2. दूसरी बात जब अपने ही अर्थात् अनार्य ही अनार्य की पीड़ा को नहीं सुनेंगे तो शोषक आर्य, क्यों अनार्यों की व्यथा सुनने लगे?

  • 3. हक रक्षक दल सामाजिक संगठन का सवाल—क्या ऐसे ज्वलन्त विषय और सवाल प्रत्येक अनार्य को गहन—गम्भीर चिन्तन करने और तत्काल उचित निर्णय लेकर, एकजुट होने को प्रेरित नहीं करते?