देश मोदी के साथ है

  • 2016-02-18 03:30:10.0
  • राकेश कुमार आर्य

जे.एन.यू. के पश्चात अलगाव की बयार को सुभाष चंद्र बोस की भूमि बंगाल में अनुभव किया गया है। जिसे देखकर हर देशवासी की चिंताएं बढ़ी हैं। ये घटनाएं कुछ बोल रही हैं। पर हम उनको समझने में चूक कर रहे हैं। जिस पड़ोसी देश चीन की इस समय भारत की मोदी सरकार ने बोलती बंद कर दी है, और पाकिस्तान को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर जिस सरकार की सफल विदेशनीति के कारण इस समय मुंह दिखाना कठिन हो रहा है। वे दोनों पड़ोसी शत्रु देश भारत के विकास पथ पर आरूढ़ रथ को भला कैसे सहन कर सकते हैं? इन दोनों देशों की ही बात नही है-अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देश भी नही चाहते कि भारत शांतिपूर्वक विकास करें और आगे बढ़े। इसलिए भारत में अलगाववाद की जहां-जहां बातें हो रही हैं, उनके पीछे के षडय़ंत्र को इस समय समझने की आवश्यकता है।

पीएम मोदी के विषय में जहां यह सत्य है कि उनकी भाषा के शब्दबाण विपक्ष के लिए अपेक्षा से अधिक कठोर रहे हैं, वही यह भी सत्य है कि वह आज दिन तक सभी को साथ लेकर चलने के अपने दिये गये वचन का निर्वाह करने में ईमानदारी से प्रयास करते दिख रहे हैं। उनकी दृष्टि में देश का विकास ही एक एजेंडा के रूप में झलकता है। पर विपक्ष उन्हें ‘हिटलर’ जैसे शब्दों से संबोधित कर उनके धैर्य की परीक्षा लेना चाहता है, जिससे देश का राजनीतिक परिदृश्य इस समय बहुत ही निकृष्टतम स्वरूप धारण कर गया है।
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इस समय देश को विकास की ही आवश्यकता है। देश के भीतर लगने वाली साम्प्रदायिकता की आग को या जातिवादी दृष्टिकोण को या क्षेत्रीय प्रांतीय मुद्दों पर उभरने वाले प्रांतवाद को या क्षेत्रवाद को हमें देश से विदा ही करना पड़ेगा। मोदी इसी दिशा में कार्य कर रहे हैं। उनकी दिशा और मानसिक दशा को समझने समझाने की इस समय आवश्यकता है।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश के सृजनशील लोगों से पहले देश के प्रधानमंत्री की दिशा और मानसिक दशा को विध्वंसकारी शक्तियों ने पहचाना है। इसलिए ये शक्तियां बड़ी सावधानी से अपने कार्यों में लग गयी हैं कन्हैया या उसके साथी इन विध्वंसकारी शक्तियों के मोहरे हो सकते हैं। इसलिए इन मोहरों के पीछे के षडय़ंत्रकारी मस्तिष्क को समझने की आवश्यकता है।

इस समय तक देश में हर आतंकवादी मुस्लिम मिलता था, जिससे यह कहा जा रहा था कि देश में आतंकवाद केवल मुसलमान फैला रहे हैं, जो शक्तियां इस कथन को झुठलाना चाहती हैं उन्हें किसी ‘कन्हैया’ की ही आवश्यकता थी। दुर्भाग्य से ‘कन्हैया’ को उस विश्वविद्यालय में पढने का अवसर मिला जहां आज के ‘कन्हैया’ को भारत के ‘कन्हैया’ कृष्ण को मारने की पूरी तैयारी की जाती है। यदि ऐसा ना होता तो यह ‘कन्हैया’ भी किसी अन्य विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए यही कहता कि-‘परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्’ अर्थात साधुओं का,  सृजनशील लोगों का कल्याण करना और दुष्टों का अर्थात विध्वंसकारी लोगों का विनाश करना मेरा जीवनोद्देश्य है। जो लोग भारतीयता से प्रेम करते हैं उनको ही एक विचारधारा विशेष के लोग इस जेएनयू में आतंकी बता रहे हैं और उन्हें ही समाप्त करना अर्थात देश के टुकड़े-टुकड़े करके विभिन्न देशों की स्थापना करना उनका एक लक्ष्य है। इसलिए आज के ‘कन्हैया’ को बताया जा रहा है कि ये जो साधु-सज्जन-शांतिप्रेमी लोग हैं ना-ये ही इस देश से समाप्त करने हैं। इसके लिए विदेशों से पैसा आ रहा है और देश के शत्रु देश के तोडऩे की हर संभव कोशिश कर रहे हैं।

हम सभी देशवासियों को शांतमना होकर सोचने की आवश्यकता है कि जिस वैदिक धर्म को यह देश ‘हिन्दुत्व’ के नाम से अपनी मूल विचारधारा मानता है और जिसको अपनाकर यह संपूर्ण विश्व में शांति की स्थापना करने के लिए कृतसंकल्प है उसकी प्राचीनता के समक्ष तथा उसके उच्च मानवीय आदर्शों के समक्ष विश्व के सभी देशों और विचारधाराओं के विचारकों की बोलती बंद हो जाती है। वह अपनी विचारधाराओं को इस भारतीय विचारधारा के समक्ष बहुत ही तुच्छ और छोटी मानने के लिए बाध्य हो जाते हैं। ज्यों-ज्यों विज्ञान अपना विकास कर रहा है, त्यों-त्यों लोगों को पता चल रहा है कि विज्ञान की समर्थक भी यदि कोई विचारधारा है तो वह भी हिंदुत्व ही है। वेद का सारा ज्ञान विज्ञान के अटल सिद्घांतों पर ही आधारित है। जैसे-जैसे भारत के विषय में बाहरी देशों के लोगों को वास्तविकता का पता चल रहा है वैसे-वैसे ही भारतीय धर्म के प्रति विदेशों में आस्था बढ़ती जा रही है। पता चल रहा है कि भौतिक विज्ञान के नशे में चूर अमेरिका का हर तीसरा व्यक्ति भारतीय धर्म के प्रति आकर्षित हो रहा है। वह समझ गया है कि विकास का नाम केवल भौतिक विज्ञान में उन्नति कर लेना नही है इसके लिए भारतीय अध्यात्मवाद को भी अपनाना अनिवार्य है। इसलिए वे लोग भारत की ओर झुक रहे हैं। उनके झुकाव को उनके धार्मिक जगत के मुखिया कतई पसंद नही कर पा रहे हैं। यही कारण है कि ये लोग अपनी पोल खुलने से पहले भारत को बर्बाद करा देना चाहते हैं। जिसके लिए उन्हें किसी मंच की भारत में आवश्यकता है। दुर्भाग्य से जेएनयू ने अपने आपको इन विदेशी कुचक्रधारियों के लिए एक मंच के रूप में प्रस्तुत कर दिया है, और ‘कन्हैया’ ने इन विदेशी कुचक्रधारियों का एक ‘मुख’ बनना स्वीकार कर लिया है।

अब से पहले भारत की सरकारों ने प्रगतिशीलता और आधुनिकता के नाम पर विदेशियों को अपनी भारतभूमि पर खुलकर खेलने दिया था। जिससे इन विदेशियों को भारत में खुलकर अपना जाल फैलाने में कोई कठिनाई पेश नही आयी जो भारत को तार-तार कर देना चाहते थे। अब जैसे-जैसे देश की सरकार अपने देश के धर्म और संस्कृति की रक्षार्थ कुछ कदम उठाने लगी है या भारत की मानवतावादी शांतिप्रेमी विचारधारा पर काम करते हुए उसे विश्वजनीन बनाने के लिए कार्य करने की दिशा में आगे बढऩे लगी है तो उनके पेट में दर्द होने लगा है। यह पेट-दर्द होना स्वाभाविक है। इसे समझा जा सकता है।

हमारा अपने सभी देशवासियों से विनम्र अनुरोध है कि वे शांति और धैर्य से काम लें। एक बीमार देश की बीमारी दूर करने के लिए कुछ कठिनाईयां पेश आने लगी हैं, यदि हमने रोगी की छटपटाहट पर ध्यान देकर अपना धैर्य खो दिया तो रोगी की मृत्यु हो सकती है और तब हमारी चिकित्सकीय योग्यता पर भी प्रश्नचिह्न लग जाएगा। विदेशी विध्वंसकारी शक्तियां यही चाहती हैं कि रोगी मर जाए और चिकित्सक को मनोरोगी सिद्घ कर दिया जाए। हम यदि अब न संभले तो फिर कभी न संभल पाएंगे। मोदी एक चिकित्सक बन शांत रहकर उपचार करें-देश उनके साथ है।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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