देश में ‘पोटा’ की आवश्यकता है

  • 2016-02-19 03:30:04.0
  • राकेश कुमार आर्य

जे.एन.यू. में चल रही देशद्रोही गतिविधियों का क्रम पिछले लंबे समय से चलता रहा है। देश के इस कथित विश्वविद्यालय को देश के पैसे से ही सरकार चलाती रही है, और इसमें पलने वाले ‘पूत’ मां का दामन ही नापाक करने या मां की अस्मत से ही खेलने की घिनौनी गतिविधियों में लगे रहे हैं। देश के लोगों को अब जाकर पता चला है कि हमसे कितनी बड़ी चूक होती रही? अब चूक का भंडाफोड़ होते ही देश में इस बात की मांग की जाने लगी है कि जे.एन.यू. को बंद किया जाए।

अब पता चल रहा है कि जे.एन.यू. की राष्ट्रद्रोही गतिविधियों के पीछे सैय्यद अब्दुल रहमान गिलानी का हाथ रहा है। यह वही गिलानी है जिसको अफजल गुरू के साथ 13 दिसंबर 2001 के संसद पर आक्रमण का दोषी पाया गया था और इसको निचली अदालत अर्थात लोअरकोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई थी, पर बाद में दिल्ली उच्च न्यायालय ने कुछ कानूनी कमियों व पर्याप्त साक्ष्य न होने के कारण गिलानी को बरी कर दिया था। यह डीयू में एक प्राध्यापक रहा है।

अब इसे पुलिस ने पकडक़र अपनी गिरफ्त में ले लिया है तो उसने स्वीकार किया है कि अफजल गुरू की बरसी पर आयोजित किये गये कार्यक्रम में देशद्रोही नारे लगाये गये थे और उसने उन नारे लगाने वालों को रोका नही था।

वैसे गिलानी अफजल गुरू के काफी निकट रहा था अफजल गुरू की भारत और भारतीयता या भारत के संविधान के प्रति कोई आस्था नही थी। वह स्वयं कहा करता था कि भारत के संविधान के प्रति उसकी कोई निष्ठा नही है और यदि भविष्य में उसे पुन: अवसर मिला तो वह फिर ऐसा ही कृत्य करेगा। अफजल के साथ उसका एक अन्य आतंकी साथी शौकत हुसैन गुरू था, जो उसका चचेरा भाई था इसे भी मृत्युदण्ड दिया गया था पर सर्वोच्च न्यायालय ने इस दण्ड को दस वर्ष की सजा में बदल दिया था। इसे संप्रग सरकार ने 2010 में सजा पूर्ण होने से पूर्व ही छोड़ दिया था। अफजल गुरू ने जैश-ए-मुहम्मद व जमात उल दावा के संपर्क में आकर पीओके में चल रहे आतंकी शिविरों में भारत विरोधी प्रशिक्षण लिया था। यहां से वह पूर्णत: भारत विरोधी बनकर निकला था। संसद पर आक्रमण करके उसने भारत की संप्रभुता पर आक्रमण किया था।
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यह बहुत संभव है कि कोई व्यक्ति एक बार किसी बहकावे या उत्तेजना में आकर कोई गलत कार्य कर दे, ऐसी स्थिति के लिए भारत की प्राचीन न्यायप्रणाली में उसे प्रताडि़त करके लताडि़त या कुछ उत्पीडि़त करने का ही प्रावधान था। इसलिए कहा जा सकता है कि अफजल गुरू को भी छोड़ दिया जाना चाहिए था, पर जो व्यक्ति बार-बार यह कहे जा रहा हो कि यदि उसे अवसर मिला तो वह भारत के विरूद्घ पुन: ऐसी ही कार्यवाही करेगा, तो उसे छोडऩा खतरे से खाली नही था। उसने भारत की संप्रभुता पर हमला किया और भारत के कई देशभक्त जवानों की जान ले ली थी। इसलिए उसके साथ जो कुछ हुआ वह ठीक ही था। जे.एन.यू. को चाहिए था कि वह ऐसे लोगों के विषय में अपने छात्रों को वही बताता जो किसी भी देशभक्त विश्वविद्यालय को बताना चाहिए। पर जे.एन.यू. ने अपने छात्रों को ऐसा परिवेश उपलब्ध कराया, जिससे वे अपने ही देश के विरूद्घ नारे लगाने लगे। जे.एन.यू. को ऐसा कोई कार्य नही करना चाहिए था जिसे करके उसके विद्यार्थियों को पछताना पड़े और कन्हैया की भांति यह क हना पड़े कि उसकी भारत के संविधान में आस्था है और कैंपस में भारत विरोधी नारे लगाने में उसका कोई योगदान नही था।

आज सरकार को अफजल को लेकर गंभीर होने की आवश्यकता है। कारण कि अफजल को कश्मीर के अलगाववादियों ने ही नही अपितु नक्सलियों ने भी अपना गुरू मान लिया है। जिन्होंने अपनी एक पत्रिका के मुख पृष्ठ पर अफजल गुरू का फोटो छापा था जिससे पता चलता है कि अफजल नक्सलियों के लिए प्रेरणास्रोत बन गया है। ये अलगाववादी मानसिकता स्पष्ट दर्शा रही है कि देश को तोडऩे की गतिविधियों में संलिप्त लोग कितना आगे बढ़ चुके हैं और हमारी सरकारें इन खतरों को समझकर भी उनकी ओर से आंखें बंद किये बैठी रहीं। वैसे हमारी सरकारों की कार्यशैली ही कुछ इस प्रकार की रही है कि ये संकटों के प्रति तब तक नही जागती है जब तक संकट इनकी चारपाई तक न पहुंच जाए। संसद पर किये गये आतंकी हमले के समय लगा था संकट इनकी चारपाई तक न केवल पहुंच गया है अपितु इनके ऊपर छाती पर ही चढ़ बैठा है। तब हमारे नेता कुछ हरकत में आये जान पड़े थे। पर इन्होंने अपनी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत कराकर ही समझ लिया कि संकट टल गया है। जबकि संकट तो जे.एन.यू. में जाकर तभी से दण्ड पेलने लगा। अब वह हृष्ट पुष्ट होकर बाहर निकल रहा है। पर नेताओं की आंखें नही खुल रही हैं।

अफजल की फांसी पर पाकिस्तान में ही नही कश्मीर में भी कई स्थानों पर प्रदर्शन हुए थे। 2006 में जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री ने अफजल की फांसी से पूर्व धमकी भरे अंदाज में कहा था कि यदि ऐसा होता है तो हिंदू मुस्लिम दंगे हो जाएंगे। उनका कहना था कि यदि अफजल गुरू को फांसी दी गयी तो देश में आग लग जाएगी, साम्प्रदायिक सौहार्द नष्ट हो जाएगा, फांसी की सजा सुनाने वाले जज की भी हत्या हो सकती है। फारूख अब्दुल्लाह की इस धमकी पर तत्कालीन केन्द्र सरकार मौन साध गयी थी।

अफजल को पाकिस्तान से समर्थन मिले या हाफिज सईद या अजहर मसूद या यासीन मलिक उसे अपना हीरो मानें यह बात तो समझ में आ सकती है पर उसको हमारे देश के बुद्घिजीवी या राजनेता अपना समर्थन दें यह बात समझ में नही आती। जे.एन.यू. ने अपने कैंपस में अफजल का गुणगान करने के लिए सभा का आयोजन कराके अपने आप में एक राष्ट्र विरोधी कार्य किया है। सारा देश राष्ट्रविरोधी मदरसों की ओर देखता रहा कि यहां कुछ ऐसा होना संभावित है, जो देश के साम्प्रदायिक सौहार्द को क्षत विक्षत कर सकता है, या देश के भाईचारे को नष्ट भ्रष्ट कर सकता है, इसलिए इन पर नजर रखने की आवश्यकता है। पर पता चला कि सांपों को दूध पिलाने का कार्य तो जे.एन.यू. में हो रहा था। फिर भी लोग इस पर गर्व करने की बातें कर रहे हैं, जो समझ में नही आता कि ऐसा कहने वालों का इसके पीछे तर्क क्या है?

हमारे अपने ही लोग उन प्रदर्शनकारियों के समर्थन में क्यों खड़े हो गये जो भारत की बर्बादी तक जंग जारी रखने के नारे लगाते हैं? इसका अभिप्राय है कि देश के प्रति हमारी कोई निष्ठा ही नही है। सरकार के इस तर्क में बल है कि यदि ऐसा कोई कार्य विदेशों में हो गया होता तो वहां की सरकार इससे भी कठोर कार्यवाही करती। पाकिस्तान में ही देखिए कि वहां एक लडक़े द्वारा भारत का झण्डा अपने मकान पर फहराने के अपराध में उसके साथ क्या किया गया है? हमें विचार करना चाहिए कि यदि पाकिस्तान में केवल भारतीय झण्डा फहराने पर किसी लडक़े को जेल में डाला जा सकता है तो भारत में अफजल गुरू के शिष्यों को वैसा ही कार्य करने पर जेल क्यों न हो सकती है, जैसा उनके गुरू ने किया था? देश को पोटा से भी अधिक कठोर और स्पष्ट कानून की आवश्यकता है।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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