देश की राज्य व्यवस्था

  • 2016-02-09 03:30:13.0
  • राकेश कुमार आर्य

हमारा दुर्भाग्य है  कि आज इस देश में धर्म की दुर्गति ही सर्वाधिक हो रही है। आज ‘‘धर्मनिरपेक्षता’’ का काल है। इसे धर्मविहीन अर्थात् अधर्म काल कहा जा सकता है। जो धर्म की स्थापना की बात करेगा और अत्याचारियों के विनाश के लिए ‘‘पोटा’’ जैसे कानूनों के निर्माण की बात करेगा उस परित्राणाय साधुनाम विनाशाय् च दुष्कृताम् के उद्घोषक कृष्ण को उसके ही मानने वाले यहाँ छोडं़ेगे नहीं। इसीलिए यहाँ योगी आदित्यनाथ पर हमला हो रहा है। मानों यह दुष्टों की, अत्याचारियों की, आंतकियों की खुली धमकी है कि धर्म की बात मत करो। जो हम चाहते हैं और कहते या करते हैं, वही चाहो, वही कहो, और वही करो। सारी शासन व्यवस्था मौन है, शान्त है। अपने राजधर्म के प्रति उदासीन है। सारे देश में मानव लाशों के सौदागर खुले घूम रहे हैं। अराजकता की भयावह स्थिति है। जनसाधारण के साथ आतंकी क्या कर दें, कुछ कहा नहीं जा सकता है। देश के किसान तक की मेंड  (मर्यादा) सुरक्षित नहीं है। मेंडों संबंधित विवाद न्यायालयों में बढ़ते जा रहे हैं। संबंधित राजस्व विभाग के लेखपाल व कानूनगो जैसे कर्मचारी इन विवादों को पैसे के लालच में और बढ़ावा दे रहे हैं।

इससे बड़े अधिकारी तहसीलदार उपजिलाधिकारी एवम जिलाधिकारी तक भी विवादों का बढिय़ा निदान नहीं दे पा रहे हैं। ‘‘मेंड तोडऩे’’ वाले लोग ही किसान के लिए सबसे बड़े आतंकी बन गये हैं। किसानों की आत्महत्या के कारणों में अभी निर्धनता और ऋण की अदायगी न करना माने जाते रहे हैं। किन्तु राजधर्म से हीन कर्मियों और अधिकारियों की राजधर्म कत्र्तव्य के प्रति उदासीनता भी इसका एक प्रमुख कारण है। जिसे सामान्यत: उपेक्षित किया जा रहा है। मर्यादा की यह सीमा देश के सभी क्षेत्रों से दूर हो रही है। जीवन मूल्य और जीवन दोनों ही असुरक्षित हैं। आतंकियों के विभिन्न स्वरूप देश के सामाजिक परिवेश में उभर रहे हैं। ‘बम ब्लास्ट’ करने वाले आतंकी हम देख रहे हैं। किन्तु सामाजिक व्यवस्था की ‘‘ओजोन परत’’ को तोडक़र इसमें छिद्र करने वाले सामाजिक आतंकी हमें नहीं दीख रहे। दुर्भाग्य से इस ओर हमारी सरकारों का ध्यान भी नहीं है।
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आप थोड़ा सा विचार करें कि जब कोई अपराधी पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया जाता है तो उसे छुड़ाने और उसके विरूद्घ प्राथमिकी दर्ज न कराने के लिए कितने फोन संबंधित थाना में आते हैं। इन लोगों के बीच कत्र्तव्य निर्वाह में पुलिस को कितना तनाव झेलना पड़ता है, यह विचारणीय बात है। ये लोग भी मानो कहते हैं कि राजधर्म मत निभाओ इसी में तुम्हारा कल्याण है। इसी प्रकार जब किसी बड़े बकायादार को कलैक्टर के राजस्व कर्मी या अधिकारी ‘अन्दर’ करते हैं तो उनके साथ भी यही होता है। मानो उनसे भी कहा जाता है कि राजधर्म से आँखे मूँद लो। छोटी मछलियों को पकड़ो और कत्र्तव्य की पूर्ति कर लो।

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह अपने मुख्यमंत्रित्व काल में एक बार राजधर्म निभाते हुए नजर आए थे। उन्होनें जी.टी.रोड. में हुए गड्ढों को गाजियाबाद से अलीगढ़ तक कई स्थानों पर अपनी गाड़ी से उतर कर नापा था। लोगों को आशा बंधी थी कि कुछ अच्छा होने वाला है। किन्तु यह आशा उस समय निराशा में परिवर्तित हो गयी थी जब मालूम हुआ कि ‘‘कल्याण’’ सिंह अपना राजधर्म इसलिए निभा रहे थे कि संबंधित विभाग के उच्चाधिकारियों ने मान्यवर को ‘शुक्रियाना’ अदा करने में आनाकानी आरम्भ कर दी थी। राजधर्म का निर्वाह भी जिस देश में केवल नाटक बन कर रह जाए, उसका ‘कल्याण’ कैसे होगा। जिस देश के राजा ऐसे हों उसकी प्रजा कैसी होगी? सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।

चाणक्य ने कहा है:- यदि राजा यानि शासक वर्ग सदाचारी और न्यायकारी होंगे तो प्रजा भी सदाचारी और न्यायकारी बन जाती है। यदि शासक वर्ग दुराचारी हो तो प्रजा भी दुराचारी बन जाती है। प्रजा तो अपने शासकों के पीछे चलती है। ‘‘यथा राजा तथा प्रजा’’ का मुहावरा आचार्य चाणक्य ने ही हमें दिया। किंतु आज के धर्मविहीन राजा शासक वर्ग चाणक्य की मान्यताओं को मानने को या स्थापित करने को यहाँ धर्म की राजनीति को अनर्थक मानते हैं। इसलिए ‘धर्मनिरपेक्षता’ की रखवाली के लिए यहाँ चाणक्य की बात करना पाप समझा जाता है। आज हमारी संसद और सारे देश की विधान सभाओं में यह साहस नहीं कि वह योगी आदित्यनाथ पर हुए आतंकी हमले की निंदा कर सके और इस कायरतापूर्ण कृत्य में संलिप्त लोगों की गिरफ्तारी करा सकें।

मनु महाराज ने कितना सुन्दर कहा है:-

यत्र धर्मो हि अन्र्ध्मेण सत्यं यत्र अनृतेन च।।

हन्यते प्रेक्षमाणानां हतास्तत्र सभासद:।।

अर्थात् ‘‘जिस सभा में अधर्म से धर्म यानि अन्याय से न्याय और असत्य से सत्य सब सभासदों के देखते हुए मारा जाता है, उस सभा में सब मुर्दों के समान हैं।’’ हम विचार करें कि हम कौन सी व्यवस्था में जी रहे हैं। राजनीतिक इच्छा शक्तिविहीन राज्य व्यवस्था हमारे लिए बोझ बन गयी है। महर्षि दयानन्द का कथन है कि
मनुष्य को चाहिए कि वह सभा में जाकर सत्य ही बोले। जो कोई सभा में अन्याय होते  देखकर चुप रहे या सत्य और न्याय के विरूद्घ न बोले वह महापापी होता है।’’ गूँगी बहरी बनी देश की राज्य सभाएँ हमारे दुर्भाग्यपूर्ण भविष्य की ओर इशारा कर रही हैं। आतंकवाद के विरूद्घ ये हथियार फैंके बैठी हैं। जिन सुरक्षाबलों के पास हथियार हैं भी उन्हें पंगु बना रही हैं कि हथियार मत चलाना नहीं तो अनर्थ हो जायेगा। क्योंकि मानवाधिकारों का हनन हो जाएगा।

यह अनर्थ और हनन इन्हें किसी साधु सज्जन की (देश की मुख्यधारा में आस्था और विश्वास बनाये रखकर चलने वाले व्यक्ति की) हत्या में दिखायी नहीं पड़ता किंतु जो व्यक्ति इस व्यवस्था को बड़ी निर्ममता से तोड़ रहा है, ये उसके प्राणों के रक्षक बने बैठे हैं। इसलिए समाज में सर्वत्र अशान्ति का माहौल है। यह तो इस देश की आध्यात्मिक विचारधारा और यहाँ के बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय की स्वाभाविक उदारता है कि वह सद्भाव के साथ जीने में विश्वास करता है, और शान्ति से रहना चाहता है। जिससे देश की राज्यव्यवस्था चलती दीख रही है। अन्यथा तो राजनीतिज्ञों का जैसा आचरण है वह तो देश को गृहयुद्घ की भट्टी में धकेलने के लिए पर्याप्त हैं।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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