देश की आत्मा की आवाज

  • 2016-02-20 03:30:19.0
  • राकेश कुमार आर्य

हमारा तिरंगा हमारे देश भारत के गौरव और स्वाभिमान का प्रतीक है। बहुत बड़े संघर्ष के पश्चात इसे हमने अपनी राष्ट्रीय पहचान के रूप में अपनाया था। तनिक कल्पना करें जब इस देश में 563 रियासतें थीं और उन सबके अपने-अपने अलग-अलग झण्डे थे, तब उन सब झण्डों के ऊपर ब्रिटिश ‘यूनियन जैक’ इस देश की राजधानी दिल्ली के लालकिले पर फहराया करता था। हमारे विभिन्न झंडों को देखकर अंग्रेज हमारे विषय में कह दिया करते थे कि इस देश में कभी भी राष्ट्रीय एकता नही रही। हमारे स्वतंत्रता सैनानियों ने इस स्थिति को परिवर्तित करने के लिए संघर्ष का बीड़ा उठाया। सदियों के संघर्ष के पश्चात हमारे नेताओं ने आजादी प्राप्त की तो अपना तिरंगा एक राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार किया गया। 22 जुलाई 1947 को हमारा यह राष्ट्रीय ध्वज स्वीकर किया गया था। हमने एक राष्ट्रीय ध्वज स्वीकार करके विश्व को यह संदेश दिया कि हम सब एक थे, एक हैं और एक रहेंगे। स्वतंत्रता संघर्ष के काल में इस सबका लक्ष्य एक था-देश को स्वतंत्र कराना, स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात हमारा लक्ष्य एक है-देश की आजादी को सुरक्षित रखना और भविष्य में भी एक ही लक्ष्य होगा-देश की स्वतंत्रता की सुरक्षा करते रहना। अपने इसी संकल्प की पूत्र्ति के लिए देश का जन-जन समर्पित हो उठा और देश ने स्वतंत्र होते ही एक पल का भी प्रमाद किये बिना अपना यात्रापथ निर्धारित कर उस पर बढऩा आरंभ कर दिया।

अपने झण्डे के प्रति लोगों में कितना श्रद्घाभाव रहा है और यह श्रद्घाभाव कैसे हमारी देशभक्ति का महानायक बन गया था, इसके अनेकों उदाहरण हमारे इतिहास के पृष्ठों को आज गौरवान्वित कर रहे हैं, उन्हें खोलकर यदि देखा जाए तो जेएनयू में राष्ट्रद्रोही नारे लगाने वालों को अपने किये पर अपने आप ही पश्चात्ताप होने लगेगा। बात 1923 की जून की है। कांगे्रस का सत्याग्रह चल रहा था। नागपुर के लिए एक विशेष कार्यक्रम में उपस्थित होकर इस सत्याग्रह को सफल बनाने हेतु जाने वालों का क्रम बढ़ता ही जा रहा था। माखनलाल चतुर्वेदी भी इस सत्याग्रह में सम्मिलित होने हेतु 17 जून को वहां पहुंच गये थे। वहां से उन्होंने अपने भाई को एक पत्र लिखा। जिसमें उन्होंने लिखा था कि-‘‘आज नागपुर में भयंकर सख्ती है,
National Flag of India
जिन्होंने जुर्माने नही दिये, देहातों में उनके घर की चीजें नीलाम की जा रही हैं। उन्हें यंत्रणायें दी जा रही हैं। गाय-बैल, खटिया-पलंग जो मिलता है नीलाम किया जा रहा है। सत्याग्रही स्वयंसेवक रेलों में टिकट नही पाते। 50-50, 60-60 मील की पैदल यात्रा करके स्वयं सेवक आ रहे हैं। मार्ग में वे रोके जा रहे हैं और उन्हें तकलीफ दी जा रही है। तार जाने नही दिये जाते। चिट्ठियां खोली जाती हैं। सफेद टोपी और झंडे वाले पकड़े जाते हैं। नगर में खूब उत्साह है, पकड़ लिये जितने उससे अभी दस गुने बलिदान होने आगे बढ़ते हैं। रात को सभा हुई। मैं सभापति था। जवाहरलाल जी, टंडन जी और मैं तीनों बोले। उपस्थिति 15 हजार थी।

सभापति (मैंने) ने व्याख्यान में घरों में झंडा लगाने को कहा। आज नागपुर में झंडे ही झंडे दिख रहे हैं।’’

यह था हमारे झंडे का चमत्कार, जो हर देशवासी के भीतर छिपी देशभक्ति की आग को बड़ी शांति के साथ प्रकट करता था। हमारे लोगों को अंग्रेजों ने हथियार रखने की मनाही कर दी थी, किसी को यदि हथियार मिलता भी था तो वह लाइसेंस से मिलता था। साधारण भारतीय जन हथियार नही रख सकता था। कारण कि अंग्रेजों को डर रहता था कि यदि इन्हें हथियार रखने दिये तो ये भारतीय हमें ही मारेंगे। इसलिए उन्होंने भारतीयों के नि:शस्त्रीकरण का महा अभियान चला दिया। पर भारतीय भी भारतीय ही थे। उनकी देशभक्ति को अंग्रेज अपने नि:शस्त्रीकरण अभियान के माध्यम से पराजित नही कर पाया था। नि:शस्त्र लोग भी निस्सहाय नही थे, निरूत्साही नही थे, और निराश नही थे। उनके भीतर उत्साह और देशभक्ति का लावा धधक रहा था और वही उत्साह और देशभक्ति उन्हें अंग्रेजों के विरूद्घ मरने-मारने के भाव से भर देती थी। इस उत्साह को और भी अधिक बलशाली करता था हमारा झण्डा।

आज देश के विरूद्घ या देश के संविधान के विरूद्घ अपमान जनक शब्दों का प्रयोग करने या देश की एकता और अखण्डता को तार-तार करने के उद्देश्य से कार्य करने का अभिप्राय होता है-अपने सारे देश के प्रतीक तिरंगे का और उसके तले आकर अपने देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले स्वतंत्रता सैनानियों की भावना का अपमान करना।

मानव संसाधन विकासमंत्री स्मृति ईरानी ने देश के 46 केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के साथ बैठक लेकर यह प्रशंसनीय निर्णय लिया है कि अब विश्वविद्यालय परिसरों में प्रमुखता और सम्मान के साथ नित्य झण्डारोहण किया जाएगा। श्रीमती इरानी ने विश्वविद्यालयों में दोहरी पाली में कक्षाएं आयोजित करने और अंग्रेजी के अतिरिक्त भारतीय भाषाओं में भी पढ़ाने की व्यवस्था करने का निर्णय लिया है।

वास्तव में तो देश के प्रतीकों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का भाव प्राथमिक विद्यालयों से ही उत्पन्न करने के प्रयास करने की आवश्यकता है। हमारे बालकों के मन में प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर ही राष्ट्रीय झंडे के प्रति सम्मान भाव उत्पन्न करने के लिए उन्हें हिंदी में यह शपथ नित्य ही अवश्य दिलायी जानी चाहिए कि-‘‘मैं... राष्ट्रीय ध्वज के प्रति तथा जिस सम्प्र्रभुता संपन्न जनतांत्रिक गणतंत्र का यह ध्वज है, उसके प्रति निष्ठा की शपथ लेता हूं।’’

यदि प्राथमिक स्तर पर हमारे बच्चों के मन में ये भाव उत्पन्न हो जाएंगे तो यह भाव उनका एक संस्कार बनकर जीवन भर उनका मार्गदर्शन करता रहेगा। इस देश में लोग अपनी साम्प्रदायिक कट्टर मान्यताओं को बच्चों के मन में एक संस्कार के रूप में भरते रहे हैं, और हम देखते हैं कि बचपन में ये बच्चे किसी एक विचारधारा के प्रति समर्पित होकर जीवन भर उसी के प्रति समर्पित रहते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि हम देश में एक संप्रदाय विशेष को उसकी कट्टर साम्प्रदायिक मान्यताओं को बच्चों के मन में उतारने की छूट तो देते हैं पर अपने राष्ट्रीय संस्कारों को अपने बच्चों के मन में उतारने से कोताही करते हैं।

अब देश की सरकार को नौसिखिया राहुल गांधी जैसे नेताओं के बयानों से तनिक भी विचलित न होकर केवल देशहित में निर्णय लेते जाना होगा। राष्ट्रीय भावों के प्रति समर्पित होने के हर ऐसे उपाय को काम में लाना होगा जिससे हमारी साम्प्रदायिक समभाव की नीति प्रबल हो और राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के प्रति हर बच्चा संकल्पबद्घ हो। हमें और ‘कन्हैया’ नही चाहिए। हमें यह कहना ही होगा कि
चंदन है इस देश की माटी....बच्चा बच्चा राम है।’

हमारा ‘राम’ जब हमारे बच्चों के चरित्र में उतरकर बोलेगा तो इस देश की माटी के कणकण से देशभक्ति का लावा उबल पड़ेगा उस लावा से निकलने वाले तत्वों में सबसे मूल्यवान होगा भारत का मानवतावाद। यह मानवतावाद इस देश की मिट्टी पर लगे खून के उन धब्बों को सर्वप्रथम धोने का कार्य करेगा, जिन्हें हमने पिछले 68 वर्षों में साम्प्रदायिकता के आधार पर लोगों का रक्त बहा बहाकर लगाया है। शिक्षा में इस  प्रकार के सुधारों को कोई यदि ‘शिक्षा का भगवाकरण’ कहे तो कहे-पर सरकार अपने निर्णय पर अडिग रहे-सारे देश की आत्मा आज मोदी से यही चाहती है।