देश कहां गया-किसी को पता नही

  • 2016-03-23 03:30:36.0
  • राकेश कुमार आर्य

शासन और अनुशासन दोनों में कुछ मौलिक अंतर है। जिस शासन प्रणाली में केवल शासन होता है उसे लोग ‘तानाशाही’ के नाम से जानते हैं। उसमें अनुशासन तो होता है परंतु वह किसी कठोरता का परिचायक होता है, लोग उस अनुशासन को स्वाभाविक रूप से नही मानते, अपितु ‘दण्ड के भय’ से मानते हैं। इसी प्रकार जहां केवल अनुशासन होता है, वहां धर्म का शासन होता है। अनुशासन हमारे भीतरी जगत का विषय है, जो भीतर से विकसित होता है और हमारे बाहरी जगत को संवारता-सुधारता है। इसे लोग दण्ड के भय से न अपनाकर अपने आप, अपने भले के लिए, अपने द्वारा, अपनाते हैं। इसे ही स्वशासन कहा जा सकता है, और इसे ही विश्व का सर्वोत्तम शासन विधान कहा जा सकता है। भारत के अधिकांश लोग आज भी आत्मानुशासित रहकर विधि और समाज की व्यवस्था का पालन करते हैं। वह कानून से भी अधिक ईश्वर के न्याय से डरते हैं, जिसके विषय में वह भली प्रकार जानते हैं कि संसार के किसी न्यायालय से तो किसी बुरे कार्य के परिणाम से बचा सकता है, परंतु ईश्वर के न्यायालय से कदापि नही बचा सकता, इसलिए कार्य ऐसे करो जो ईश्वर की व्यवस्था में बाधक ना हों।

देश

हमारे देश में लोकतंत्र है। इसे भी विश्व की सर्वोत्तम शासन प्रणाली कहा जाता है। पर हमने लोकतंत्र को इतना तार-तार कर दिया है कि भारत में घोषित रूप से चाहे लोकतंत्र हो, परंतु अघोषित रूप से लोकतंत्र न होकर ‘ठोकतंत्र’ है। हमारा यह ‘ठोकतंत्र’ ‘गन’ बल और ‘धन’ बल से हांका जाता है। अभी पिछले दिनों उत्तर प्रदेश की विधानपरिषद की कुछ सीटों का चुनाव हुआ था। इसमें सत्तारूढ़ सपा ने लगभग तीन दर्जन सीटों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। सभी जानते हैं कि उसने इन सीटों को कैसे जीता है? ‘गन’ बल और ‘धन’ बल का खुलकर प्रयोग किया गया और अब मुख्यमंत्री अखिलेश को अपने शेष कार्यकाल के लिए किसी प्रकार की समस्या विधानपरिषद में नही आने वाली। यदि 2017 के विधानसभा चुनावों में प्रदेश से सपा का सफाया भी हो जाता है, तो भी विधानपरिषद में जब तक सपा का बहुमत रहेगा तब तक वह अगली सरकार को भी काम करने में बाधा पहुंचाती रहेगी। इस प्रकार भारत में लोकतंत्र विधानमंडलों पर कब्जा करने और देश के कोष को लूटने का माध्यम बन गया है।

दूसरी ओर इसी धरती पर दुबई भी है, जहां तानाशाही है। यद्यपि लोग तानाशाही को सर्वाधिक निकृष्ट शासन व्यवस्था मानते हैं, और कहते हैं कि इसमें व्यक्ति का सर्वांगीण विकास होना संभव नही है, क्योंकि इसमें व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन किया जाता है, और उसको अपनाने से सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय की प्राप्ति में लोगों को बाधा होती है। यह बात कहीं तक उचित भी है, क्योंकि कोई भी तानाशाह जनसाधारण के अधिकारों का हनन करके ही अपनी सत्ता चलाता है। उसका उद्देश्य होता है कि जनसाधारण के अधिकारों का जितना हनन किया जाए उतना ही उचित होगा। लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले लोग कहते हैं कि तानाशाह के रहते किसी साधारण व्यक्ति को अपने देश में राजनीतिक रूप से बड़ा पद पाने में कठिनाई ही नही होती, अपितु उसके रहते किसी बड़े पद पर पहुंचने की संभावनाएं भी क्षीण हो जाती हैं। ऐसे आलोचकों की ऐसी आलोचना में सत्यांश तो है। पर इसे दुबई ने और दुबई की सरकार ने असत्य सिद्घ कर दिया है।

भारत में जहां लोकतंत्र में लोग अपने ‘गनबल’ से विधानमंडलों में भी बहुमत बना लें और जहां हर राजनीतिक दल किसी चुनाव में अपनी पार्टी का टिकट देते समय टिकटार्थी की योग्यता केवल यह देखने के अभ्यासी हो जाते हों कि यह कितना बाहुबली है, और किस प्रकार सीट जीतकर ला सकता है? वहां एक सभ्य, सुसंस्कृत, धनहीन, और गनहीन व्यक्ति को विधानमंडलों की तो बात छोडिय़े पार्टी के दरवाजे तक भी नही आने दिया जाता, तो जिन लोगों को तानाशाही से घृणा है, वे यह भी बतायें कि इन राजनीतिक दलों का ऐसा आचरण क्या लोकतंत्र के विरूद्घ नही है? बात स्पष्ट है कि ये राजनीतिक दल भी एक आम आदमी को देश के सत्ता सोपानों पर पहुंचने न देने के ‘गुण्डों के टोल’ बनकर रह गये हैं।

दुबई ने तानाशाही की धारणा को ठुकराने का कार्य किया है। यहां पर शत-प्रतिशत रोजगार है, किसी भी व्यक्ति के समक्ष अपने लिए आजीविका की कोई समस्या नही है। इस देश की कानून व्यवस्था विश्व की सर्वाधिक उत्तम कानून व्यवस्था है। विश्व स्तर की स्वास्थ्य सेवाएं यहां पर उपलब्ध हैं। हमारे देश में तो नेता अपने घुटनों का उपचार कराने के लिए भी या तो अमेरिका जाते हैं या अमेरिका से डॉक्टर बुलाते हैं, उन्हें अपने उपचार की तो चिंता है, पर जनसाधारण के उपचार की चिंता नही है। क्योंकि भारत में एक ‘अपराधी राजनीतिज्ञ’ के घुटनों की कीमत भी एक ऐसे अध्यापक के घुटनों से कहीं अधिक कीमती है, जिसने जीवन भर देश निर्माण के लिए बच्चों में संस्कार भरने का उत्कृष्ट कार्य किया हो। दुबई में भ्रष्टाचार कतई नही है। रिश्वतखोरी को एक राष्ट्रीय अपराध वहां माना जाता है। कानून तक हर किसी व्यक्ति की पहुंच है। किसी भी थाने में परिवादी को प्रवेश पाने और अपना परिवाद पंजीकृत कराने की पूर्ण स्वतंत्रता है। जबकि भारत में पीडि़त परिवादी को थानों में प्रवेश भी मिल जाए तो बड़ी बात है। भारत में खाकी वर्दी पीडि़त को अपनी मित्र न दिखकर ‘शत्रु’ दिखायी देती है। भारत में आये दिन बलात्कार होते हैं। ‘निर्भया काण्ड’ हुआ तो लोग सडक़ों पर उतर आये। जिसे देखकर अच्छा लगा था। पर उस समय के समाचार पत्र आपको बता देंगे कि बलात्कारी अपने कार्य में निरंतर पूर्ववत लगे हुए थे। जबकि दुबई के लिए यह तथ्य है कि वहां बलात्कार का अंतिम प्रयास 2007 में हुआ था। उस घटना का आरोपी एक पठान था, जो अगले ही दिन एक चौराहे पर फांसी पर लटका दिया गया था। इसी प्रकार भारत में जहां आये दिन बैंक डकैतियां होती हैं, वहीं दुबई में बैंक डकैती की अंतिम घटना 2005 में हुई थी और वह भी सफल नही हो पायी थी उस घटना में भी जितने आरोपी थे उन्हें गोली मार दी गयी  थी। वहां के शोरूम अधिकतर शीशे की दीवारों के ही बने होते हैं। हमारे यहां की भांति लोहे के शटरों का प्रयोग वहां ना के बराबर है। किसी भी सार्वजनिक कार्यालय में आप पंक्ति नही लगा सकते, अपने आप अपाइंटमेंट पर्ची प्राप्त करो और सोफे पर बैठकर प्रतीक्षा करो। आपका नंबर बोलकर आपको बुला लिया जाएगा। सडक़ दुर्घटना में दुर्घटनाग्रस्त  हुए व्यक्ति को एम्बुलेंस अपने आप उठा ले जाएगी। यदि आवश्यक होगा तो हैलिकॉप्टर एम्बुलेंस भी आ सकती है। हर व्यक्ति देश की सार्वजनिक संपत्ति को अपनी संपत्ति मानता है और इधर हम हैं कि एक ‘कन्हैया’ देश के विरूद्घ नारे लगाता है, और पूरा देश उसको राष्ट्रद्रोही मानता है, इसी बीच कोई आता है कह देता है कि ‘कन्हैया’ तो एक क्रांतिकारी है, अब सारा देश एक मूर्खतापूर्ण बहस को देख रहा है कि ‘कन्हैया’  वह भगतसिंह है या कोई और? देश कहां गया-किसी को पता नही।

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राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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