देश का वास्तविक गद्दार कौन? भाग-3 (ख)

  • 2016-03-30 05:29:22.0
  • राकेश कुमार आर्य

हमारे अभी तक के लेखन से यह स्पष्ट हो गया है कि  सावरकरजी के गांधीजी से मौलिक, नीतिगत और सैद्घांतिक मतभेद थे। एक प्रकार से दोनों ही उत्तरी-दक्षिणी धु्रव थे। जिनका मिलन कभी संभव नही था। यही कारण रहा कि जब कांग्रेस ने स्वतंत्रता मिलने पर देश की सत्ता संभाली तो उसने स्वातंत्र्य वीर सावरकर जैसे अनेकों देशभक्तों को इतिहास से मिटाने का देशघाती कार्य किया। गांधीजी स्वयं अपने विरोधियों को कभी भी पसंद नही करते थे, दूसरे शब्दों में वह अपने विरोधियों के प्रति असहिष्णु रहते थे। गांधीजी जैसे महान नेता से ऐसी अपेक्षा नही की जा सकती और न ही यह उन जैसे व्यक्तित्व के लिए उचित कहा जा सकता है कि वह अपने विरोधियों के प्रति असहिष्णु हो जाएं या उन्हें घृणा की दृष्टि से देखने लगें।

बस कांग्रेस ने भी गांधीजी की और चाहे सारी बातें भुला दी हों, पर अपने विरोधियों के प्रति गांधीजी की असहिष्णुता की नीति को ज्यों का त्यों अपनाये रखा। इसे स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया और परंपरा के अनुकूल नही कहा जा सकता। लोकतंत्र में यह आवश्यक नही है कि सब लोग आपसे सहमत हों, लोकतंत्र विचारों की स्वतंत्रता प्रदान करता है, और हर व्यक्ति को अपने ढंग से सोचने का अवसर देता है। लोकतंत्र की यह भी विशेषता है कि बहुत से विचारों में से जो उत्तम हो और जिससे राष्ट्रहित और जनहित पूर्ण होता हो उसे अंत में सब अपना लें। किसी भी व्यक्ति को केवल अपने विचार को उत्तम मानने और उसे सब पर आरोपित करने की लोकतंत्र छूट नही देता, क्योंकि जहां लोकतंत्र ऐसी सोच को प्रोत्साहित करने लगता है वहीं लोकतंत्र अधिनायकवादी हो जाता है। यह दुख के साथ कहना पड़ता है कि गांधीजी और नेहरूजी दोनों इसी  अधिनायकवादी सोच  के व्यक्ति थे। उन्होंने जो सोच लिया या जो निर्णय ले लिया उसे वह ब्रह्म वाक्य के रूप में स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील हो उठते थे। यही कारण रहा कि इन दोनों महापुरूषों ने ऐसे किसी भी व्यक्ति को पसंद नही किया जो इनके साथ सहमति नही रखता था। सावरकरजी ऐसे व्यक्तित्व थे जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन करते थे और जनहित व राष्ट्रहित में सदा उचित निर्णय लेते थे। कई लोग उन्हें अधिनायकवादी कह सकते हैं परंतु उनके द्वारा कहे गये अनेकों वचन या उनके द्वारा लिये गये अनेकों निर्णय ऐसे रहे जो उस समय तो चाहे उनके विरोधियों को उचित न लगे हों परंतु बाद में उनके विरोधियों ने भी उनके वचनों या निर्णयों को उचित माना।

स्वतंत्रता के पश्चात चीन के हाथों भारत की पराजय कराके नेहरूजी ने देश को बहुत बड़ी क्षति पहुंचाने का कार्य केवल गांधीजी की अहिंसा की नीति के कारण ही किया था। गांधीजी की अहिंसा की नीति को सावरकर अतिवादी अहिंसा कहकर राष्ट्रहितों के लिए अनुचित करार देते रहे, वह नही चाहते थे कि राष्ट्र की सुरक्षा के संदर्भ में भी गांधीजी की अतिवादी अहिंसा को राष्ट्र की सैन्यनीति के रूप में अपनाया जाए। परंतु नेहरू जी ने गांधीजी की अहिंसावादी नीति को राष्ट्रीय सैन्यनीति के रूप में अपनाने की भयंकर भूल की। इसका परिणाम आया कि देश स्वतंत्रता के पंद्रह वर्ष पश्चात ही 1962 में चीन के हाथों करारी पराजय झेलने के लिए अभिशप्त हो गया। उस समय लोगों ने देख लिया था कि सावरकरजी की स्पष्ट नीतियां राष्ट्रहित के दृष्टिगत कितनी उचित थीं? नेहरू जी का यह भी देश के साथ एक प्रकार का विश्वासघात ही था, जब सारे देश की आवाज बनकर वीर सावरकरजी सरकार को सावधान कर रहे थे पर जवाहरलाल नेहरू सहजीवन और सहअस्तित्व जैसी मोहक व आत्मघाती कल्पना के शिकार बन गये। सावरकर जी का कहना था कि सहजीवन दो प्रकार का होता है। एक तो वह जो सबल, समानशक्ति संपन्न देशों में हुआ करता है, और दूसरा जो व्याघ्र और बकरी का होता है। हमारे भाग यह दूसरी किस्म का सहजीवन ही क्यों आया? इस पर जरा विचार करो। बस इसका एक ही कारण है-जो चीन फार्मोसा को मुक्त न करा सका, और न माकोव जैसा छोटा सा द्वीप पुर्तगाल से ले सका वह भारत का सहस्रों मील क्षेत्र हड़प जाता है इस घटना का एक ही अर्थ है-‘‘हमारी शक्ति की उसे धाक नही, भय नही। हम किसी भी स्थिति में युद्घ नही करेंगे गोलियों का जवाब विरोध पत्रों द्वारा देंगे, ऐसी जिनकी घोषणा हो, उससे भय कौन और क्यों करेगा।’’

इस प्रकार सिद्घ होता है कि सावरकर जी कांग्रेस की विश्वासघाती नीतियों के विरोधी थे वह किसी भी मूल्य पर देश के विरूद्घ होने वाले किसी भी कार्य को सहन करने वाले नही थे। उनका विरोध किसी व्यक्ति विशेष या किसी पार्टी विशेष से कभी नही रहा, और ना ही उन्होंने अपने व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों को राष्ट्रीय हितों के कभी आड़े आने दिया।

गांधीजी की अहिंसा को न तो मुस्लिम लीगियों ने अपनाया और ना ही अंग्रेजों ने या किसी पड़ोसी देश ने अपनाया, यह स्थिति भी गांधीजी, गांधीवाद और गांधीजी की नीतियों की पोल खोलने वाली है। जिससे यह पता चलता है कि गांधीजी को उनके तथाकथित अपने लोग भी पसंद नही करते थे। लीगियों ने पाकिस्तान लेकर ही दम लिया, जो उनके पदचिन्हों पर चलने वाले भारत में बचे उन्होंने 1947 से लेकर आज तक देश में साम्प्रदायिक दंगों का और आतंकवाद का ऐसा रास्ता पकड़ रखा है कि देश की सरकारों को इनसे निपटने के लिए बहुत बड़ा मूल्य चुकाना पड़ रहा है। ‘‘हिंसा निरंतर जारी है, कश्मीर की तैयारी है’’-ऐसी स्थिति में कैसे कह दें कि गांधीवाद इस देश के लिए एक सफल नीति सिद्घ हो चुका है। 1962 के बाद से जब देश ने कांग्रेस को जूते मारने आरंभ किये तो इसने भी देशहित में हिंसा को आवश्यक मानते हुए सावरकरवाद को स्वीकार कर लिया और गांधीवाद को विदा कर दिया। छद्मी नीतियों की जब पोल खुलती है तो विश्वासघाती लोग भी अपनी नीतियों में परिवर्तन कर लेते हैं।

सावरकर ने सिद्घ कर दिया कि उनकी सोच गांधी नेहरू की अपेक्षा कहीं अधिक व्यावहारिक और देशहित में उचित थी। हसरत मोहानी ने गांधीजी की अहिंसा पर व्यंग्य करते हुए ठीक ही लिखा था-

जिसे कहते हैं अहिंसा वह उसूले खुदकुशी था।
अमल इस पै, कोई कहता, न अवाम करते।
उन्होंने यह भी कहा-

गांधी की तरह बैठकर क्यों कातेंगे चरखा।
लेनिन की तरह देंगे न दुनिया को हिला हम।।

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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