देश जागरण को धर्म और देशमरण को पाप मानने वाले वीर सावरकर

  • 2015-10-21 01:48:39.0
  • राकेश कुमार आर्य

veer_savarkar_1‘‘दिव्य मातृ सेवा व्रत की ईश्वरीय दीक्षा में सहभागी होने से मधुरतर हुए मधुमय मित्रता के रेशमी धागे से जिनके हृदय बंधे हुए हैं ऐसे मित्रो! तुम्हें मेरा यह अंतिम प्रणाम। कली की सुगंध को धीरे से जागृत करने वाले प्रात:काल के ओस जल जैसे तरोताजा और वैसा ही मृदुल विदाई का प्रणाम स्वीकार करो।

विधाता द्वारा सौंपे हुए कार्य करने के लिए हम दूर जा रहे हैं। वह कार्य करते हुए कभी हम सुलगते पाषाण से बांधे या बंद किये जाएंगे या कीर्ति की उछलती लहर पर हिचकोले खाएंगे। क्षण में दिखें, तो क्षण में छिपें। कभी शिखर पर तो कभी तल में गड़ें। उस उत्कृष्ट सेनानायक ने अपने को कहीं भी कार्य पर नियुक्त किया हो, पर वही सर्वोत्तम करेंगे। मानो उस स्थान पर वैसा काम करना ही अपना जीवन कार्य है।

किसी प्रतिभापूर्ण पौरस्त्य कवि ने कहा नाटक में भरतवाक्य के समय मृत या जीवित सारे पात्र इतिहास के विस्तृत रंग मंच पर संतुष्ट हुए समग्र मनुष्य जाति के प्रेक्षकों के कृतज्ञ यशोगर्जन से और तालियों से घाटी पर्वत गूंजते समय हम सब फिर इकट्ठा होंगे।

मुझदीन की अस्थियां कहीं भी गिरी रहें, जिसका आक्रोश करने वाला प्रवाह चारों ओर की भयानकता का बेसुरा राग गाता हो, ऐसे अण्डमान के किसी उदास पोखर में वे फेंकी हुई हों या जिसमें तारा सुंदरी मध्य रात्रि में नृत्य करती है, ऐसी श्रीगंगा की स्फटिक शिला पर बहते पावन प्रवाह ने उनको अपने हृदय के पास जतन से संजो रखा हो, जब विजय की तुरही की विश्वकप ध्वनि उच्च स्वर से गर्जना कर उठेगी कि श्रीरामचंद्र ने उनके प्रिय लोगों के मस्तक पर कभी भी म्लान होने वाले फूलों का सुवर्ण यश किरीट रखा है। आज तक धूम मचाए हुए उस भूत को जहां से वह पहली बार बाहर आया। उस समुद्र तक फिर से पीटते हुए ले जाकर डुबो दिया है और देखो, वह अपनी माता हिंद देवी संपूर्ण मनुष्य जाति को रास्ता दिखाते दीप स्तंभ की तरह ऐश्वर्य के साथ खड़ी है, तब उस कार्य में आत्म हवन करने वाले तलवार धारियों और मालाधारियो उठो। जिस युद्घ में तुम लड़ें और मर गये वह युद्घ अब जीत लिया जाएगा, तब मेरी अस्थियां पुन: चौतन्य से सुलगकर प्रदीप्त होंगी।

सन 1910 में लंदन में अपनी गिरफ्तारी के पश्चात स्वातंत्रय वीर सावरकर द्वारा अपने मित्रों को भेजा गया संदेश है यह। आत्महवन करने वाला सचमुच कोई स्वातंत्रय वीर ही हो सकता है, और जिसकी अस्थियां पुन: चैतन्य से सुलगकर प्रदीप्त हो उठें, वह भी स्वातंत्रय वीर ही हो सकता है। अब हम अपने उसी क्रांतिवीर स्वातंत्रय वीर सावरकर जी के विषय में कुछ चर्चा करेंगे जिनके क्रांतिकारी कार्यों और स्वतंत्रता प्रेमी भावना ने इस देश को स्वतंत्र कराने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था।

उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि-‘‘जब अत्याचार और अन्याय के पराकाष्ठा पर पहुंच जाने से परिणामस्वरूप मानव मन प्रतिशोध की भावनाओं के प्रचण्ड आवेग से अनियंत्रित होकर भडक़ उठता है, उन स्थितियों में राष्ट्रहित के लिए अक्षम्य ठहराई जाने वाली हत्याएं तथा अत्याचार होना क्षम्य व अनिवार्य हो जाता है। इसलिए 1857 के भारतीय स्वातंत्रय समर में चार पांच स्थानों में ही हुए हत्याकांडों की क्रूरता पर आश्चर्य व्यक्त करने की आवश्यकता नही। अंग्रेजों ने तो अपने अत्याचारों के कोल्हू में संपूर्ण भारत को पेरकर उसके अस्थिपंजर मात्र छोड़े थे। जब दमन, उत्पीडऩ और अत्याचार पराकाष्ठा पर पहुंच गये तो भारतीय जनशक्ति ने भी इस अत्याचार और अन्याय के मुख पर कसकर थप्पड़ मारा। इस प्रसंग में हिसाब चुका करने के लिए जो हत्याकांड हुए थे वे असीम तो नही थे।’’

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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