देश जागरण को धर्म और देशमरण को पाप मानने वाले वीर सावरकर-भाग-3

  • 2015-10-23 02:30:09.0
  • राकेश कुमार आर्य

वैसे भी लोगों को प्रमाण सहित बताने या समझाने से उनकी समझ में शीघ्रता से बात आ जाती है। उन्होंने छोटी से छोटी बातों को अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया, जिससे भारतवासी जागें और विदेशी क्रूर सत्ता का सामना करने के लिए सामूहिक राष्ट्रीय प्रयास करें। इसी संदर्भ में उन्होंने भारतीय समाज में आयी अस्पृश्यता की भावना को लेकर भी देशवासियों को स्पष्ट शब्दों में कहा-

‘‘अस्पृश्यता हमारे देश और समाज के लिए मस्तक पर एक कलंक है। अपने ही हिंदू समाज के धर्म के, राष्ट्र के करोड़ों हिंदू बंधु इससे अभिशप्त हैं। हम अपने ही रक्त के बंधुओं को अस्पृश्य मानते हैं और उन्हें उतना भी अपने निकट नही आने देते, जितना किसी अब्दुल रशीद औरंगजेब अथवा पूर्वी बंगाल में कत्लेआम करने वाले विधर्मी धर्मोन्मत्त व्यक्ति को । उन विधर्मियों का हम जिस प्रकार जिस सीमा तक आगे बढक़र सम्मान करते हैं, अपने इन अस्पृश्य कहे जाने वाले बंधुओं को अपने घर में पास तक भी नही फटकने देते हैं।

अस्पृश्यता जब तक हम बनाये हुए हैं तब तक हमारे राष्ट्र में स्पृश्य अस्पृश्य इन दो भेदों को उभारकर जाति के अनुसार प्रतिनिधित्व देकर परस्पर कलह की आग सुलगाकर हमारे राष्ट्र की शक्ति को टुकड़े-टुकड़े में विभाजित करने में हमारे शत्रु सफल रहेंगे। (सावरकर विचार धर्मन से)355-Vinyaka-Damodar-Savarkar11

हमारे भीतर अस्पृश्यता के भाव ने हमारी राष्ट्रीय सामाजिक समरसता को भी प्रभावित किया। यह भी सत्य है कि इस्लामिक काल में जब अशिक्षा और अविद्या का बोलबाला  बढ़ा तो देश में अस्पृश्यता का भाव और भी प्रबलता से बढ़ा। जो लोग या तो मुस्लिम हो गये थे या मुस्लिमों की भांति मांस मछली खाने लगे थे उन्हें भी लोगों ने विधर्मी मानकर अस्पृश्य बना दिया। पर कुल मिलाकर ये सारी बातें हमारे लिए घातक सिद्घ हुईं। मुस्लिमों ने उन्हीं लोगों का धर्मांतरण करने में सफलता प्राप्त की जिन्हें हमने किसी भी कारण से अस्पृश्य मान लिया था। सावरकर इस महापाप को मिटा देना चाहते थे। जिससे कि हमारी जातीय एकता और सामाजिक समरसता की भावना अखण्ड रहे। वह इस देश में एक जाति द्वारा दूसरी जाति पर अपनी श्रेष्ठता सिद्घ करने या आरोपित करने के भी विरोधी थे। वस्तुत: क्रांति की सफलता के लिए उस समय सभी लोगों का साथ आवश्यक था। इसलिए सावरकर जी ने लोगों को सावधान किया-‘‘ब्राह्मण मराठों के पुरोहित बनना चाहते हैं, मराठे, चमारों के चमार भंगियों के अर्थात यह जाति अहंकार का पागलपन केवल ब्राह्मण के शरीर में समाया हुआ नही है। ब्राह्मणों से चण्डाल तक सारे के सारे हिंदू समाज की हड्डियों में प्रवेश कर यह उसे चूस रहा है और सारा का सारा हिंदू समाज इस जाति अहंकारगत द्वेष के कारण जाति कलह रूपी यक्ष्मा के आघातों से जीर्णशीर्ण हो गया है।’’

(सावरकर विचार दर्शन पृष्ठ 114)

जिस समय सावरकर देश के बहुसंख्यक समाज में क्रांतिभाव उत्पन्न कर उसका मार्गदर्शन कर रहे थे उस समय पहले तो मुस्लिमों के उत्पीडऩ से और फिर अंग्रेजों के व्यंग्य बाणों से हिंदू में कुछ आत्महीनता का भाव उत्पन्न हो गया था। जिसे निकालने के लिए महर्षि दयानंद ने हिन्दू को उसकी वास्तविकता पहचान ‘आर्य’ दी और उसके भीतर श्रेष्ठता का भाव उत्पन्न करने के लिए यह बोध कराया कि तू विश्व की सर्वश्रेष्ठ जाति है। इसी बात को वीर सावरकर ने अनुभव किया कि इस समय हिंदू में जातीय उत्कृष्टता का बोध कराने की आवश्यकता है। इसलिए उन्होंने भी हिन्दू को जातीय उत्$कृष्टता के भाव से भरने का प्रयास प्रारंभ से ही किया। 22 जून 1937 को रत्नागिरि में अपने स्वागत का उत्तर देते हुए वह कहते हैं-‘‘मैं हिन्दू पुत्र हूं तथा अपने आपको हिंदू कहलाने में मुझे सदैव गर्व रहेगा। मैं जब भी किसी कार्य का निश्चय करूंगा तब उसमें राष्ट्र हित को ही सर्वोपरि महत्व दूंगा।’’

आज वह (हिंदू जाति) उतार पर है, किंतु फिर भी समुद्र ही है। सुप्त होने पर भी ज्वालामुखी है। बेसुधि के चक्कर में उस विराट राष्ट्रपुरूष के द्वारा प्रमाद के कार्य हो रहे हैं, किंतु यह बेसुध स्थिति ऊध्र्व की है, मृत्यु की नही। इस हिंदू राष्ट्र और हिंदू धर्म के उत्कर्ष के लिए हवन (शहीद) होने के लिए आज शताधिक हुतात्माओं के शरीर का बिंदु-बिंदु मचल रहा है। उन हुतात्माओं का तेज और आत्म यज्ञ ही इस हिंदू राष्ट्र के अक्षुण्ण जीवन का साक्षी रहा है। इसके पुनरूत्थान और पुनरूज्जीवन का हामी है।’’ ‘भारतीय इतिहास के छह स्वर्णिम’ पृष्ठ पृ. 61 पर वह भारतवासियों का आवाहन करते हुए लिखते हैं :-‘‘जब सभी वर्णों वाली महाबलशाली सेना विदेशी शत्रुओं का पराभव करने के लिए समरांगण की ओर कूच करती थी तब स्वयं सम्राट को उस चतुरंगिणी सेना को संबोधित करते हुए यह वीरोचित आहवान करना पड़ता था-

‘‘शूरवीरों को रण में वही सदगति मिलती है जो अन्य लोगों को अनेक यज्ञ करने से। धर्मयुद्घ में प्राणार्पण करने वाले वीरों को तत्क्षण स्वर्ग प्राप्त होता है, इस राज्य का उपयोग भी आपको मेरे समान ही करना है फिर देखते क्या हो? शत्रु पर टूट पड़ो और उसका संहार करो।’’ आक्रमण और अन्याय के विरूद्घ ‘‘परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्’’ के लिए जो युद्घ करना पड़ता है, उसे वैदिक धर्म हिंसक मानता ही नही। उसे तो धर्मयुद्घ की संज्ञा दी गयी है।’’

देश जागरण के लिए ऐसे ही शब्दों की आवश्यकता होती है और देशमरण के लिए स्वयं को ‘राजभक्त’ बना लेना चाहिए। सावरकर देश मरण की राह पर चलना पाप और देश जागरण की राह पर चलना धर्म मानते थे।

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

उगता भारत Contributors help bring you the latest news around you.