देश जागरण को धर्म और देशमरण को पाप मानने वाले वीर सावरकर-भाग-2

  • 2015-10-22 00:42:59.0
  • राकेश कुमार आर्य

savarkar1इसी पुस्तक के पृष्ठ 254 पर उन्होंने लिखा ‘अन्याय का समूल उन्मूलन कर सत्य धर्म की स्थापनार्थ, क्रांति, रक्तपात तथा प्रतिशोध प्रकृति प्रदत्त साधन ही हैं। अन्याय के फलस्वरूप होने वाला उत्पीडऩ तथा उद्दण्डता ही तो इन साधनों के उपयोग के लिए निमंत्रण देती है। न्याय के सिंहासन द्वारा अपराधी को मृत्युदण्ड दिया जाता है, उसे कोई दोषी नही ठहराता। इसके विपरीत जिस अन्यायी के कत्र्ता के रूप में किसी को प्राणदण्ड दिया जाता है। वह अन्यायी  ही उस पाप का दोषी समझा जाता है। इसलिए ब्रूट्स की तलवार पावन है, तो शिवाजी का व्याघ्र नख परम वंदनीय।’’

सावरकर अपने समकालीन लोगों में ऐसे प्रथम व्यक्ति थे जो केवल क्रांति में विश्वास रखते थे और कांग्रेस की किसी भी प्रकार की अहिंसा वादी आत्मघाती नीति के परम आलोचक थे। वह उन क्रांतिकारियों से सहमत थे जो स्वतंत्रता को भारत और भारतीयों का मौलिक अधिकार मानते थे। उसके लिए वह याचना के स्थान पर ‘रण’ के समर्थक थे। वह अंग्रेजों के सामने हाथ फैलाकर अपनी स्वतंत्रता को भीख में मांगना अपराध मानते थे। साथ ही यह भी मानते थे कि जो अंग्रेज भारत में बलात अपनी सत्ता स्थापित करने में सफल रहे और जिस सत्ता को उन्होंने बड़े-बड़े अत्याचारों से सींचा है, उस सत्ता को वह बातों ही बातों में थाली में सजाकर हमें देने वाले नही हैं। उनकी अत्याचारों से सीचीं गयी सत्ता को केवल बलिदानों से ही उखाड़ा जा सकता है। अत्याचारों का प्रतिशोध ही अत्याचारों के पैर उखाड़ता है, यदि अत्याचार के सामने अहिंसावादी याचना की गयी तो उससे अत्याचार का और भी अधिक मनोबल बढ़ जाता है। इसलिए सावरकर प्रारंभ से ही क्रूर विदेशी सत्ता को देश से यथाशीघ्र उखाड़ फेंकने के पक्षधर थे। उनका कहना था-‘‘हिंदुस्थान को विश्वबंधुत्व और अहिंसा की सुरा ने इतना अधिक मदमत्त बना दिया था कि पाप, अपराध और आक्रमण का प्रतिकार करने की हमारी शक्ति ही नष्टप्राय होने लगी थी। ऐसी अवस्था में अन्याय के विरूद्घ देश के चित्त में तीव्र तिरस्कार उत्पन्न कर उसके प्रतिकार की अदम्य शक्ति का प्रस्फुरण करने के निमित्त हमें इस आवश्यकता की अनुभूति हुई कि जिसके साथ हमें दो-दो हाथ करने हैं उससे प्रत्येक दृष्टि में श्रेष्ठता उत्पन्न की जाए।’’ (संदर्भ हिंदुत्व पृष्ठ 32)

वीर सावरकर ने क्रांति को ईश्वर का वरणीय तेज स्वरूप ही मान लिया था। जैसे ईश्वर का वरणीय तेज स्वरूप दुष्टों का संहारक होता है और हर व्यक्ति का साहस ईश्वर के वरणीय तेज स्वरूप का सामना करने का नही होता है उसी प्रकार गायत्री के उपासक इस महान देश को जगाने के लिए सावरकर जी ने गायत्री और क्रांति को एक दूसरे का पूरक ही बना दिया था। उन्होंने देश के लोगों में क्रांति का संचार करते हुए ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ पृष्ठ 326 पर लिखा :-

‘‘अन्यायों और अत्याचारों का उन्मूलन करने वाली क्रांति तो वस्तुत: वरेण्य है, किंतु एक प्रकार के अन्याय और अत्याचार का उन्मूलन करने वाली क्रांति यदि उसी प्रकार अत्याचारों और अन्यायों का बीज बो देती है तो वह क्रांति भी तत्काल ही पापमयी और अपावन बन जाती है। उसी पाप के गर्भ में पलने वाले असंख्य विष बीजों से ऐसे पादप फूट पड़ते हैं कि वे ही उस क्रांति को निष्प्राण बना देेते हैं।’’

सावरकर ने शस्त्रबल के विषय में इस देश को बताया कि जब तक शास्त्रधर्म का पालन इस देश में होता रहा तब तक किसी भी विदेशी आक्रांता का साहस इस देश की सीमाओं का अतिक्रमण करने का नही हुआ, इसलिए स्वतंत्रता के हरण पर विचार किया जाना अपेक्षित है कि यह कितने कारणों से हरण की गयी थी? यदि ऐसा विचार किया जाएगा तो शस्त्र बल के प्रति कहीं शिथिलता का हमारा भाव भी एक उत्तरदायी कारक के रूप में दिखायी देगा। जिसका निवारण किया जाना समय की आवश्यकता है। उन्होंने ‘भारतीय इतिहास के छ: स्वर्णिम’ पृष्ठ भाग-1 पृष्ठ 63 पर लिखा था-‘‘सम्राट अशोक जब तक क्षात्रधर्म पूजक वैदिक धर्म का अनुयायी था, तब तक अर्थात ईसा पूर्व 252 वर्ष तक भारत की सेना शस्त्र सज्ज और अजेय बनी रही। परंतु अशोक द्वारा बौद्घधर्म स्वीकार कर लेने पर यह संपूर्ण सुरक्षितता अकस्मात ही धराशायी हो गयी।’’

स्वयं भगवान बुद्घ ने जिस प्रकार से अपने सारे साम्राज्य का परित्याग कर भिक्षुत्व स्वीकार किया उसी प्रकार यदि बौद्घ धर्म स्वीकार करते ही सम्राट अशोक ने भी साम्राज्य का परित्याग कर दिया होता तो भारतीय राष्ट्र पर इतने बड़े संकट का पहाड़ कभी न टूटता। सम्राट अशोक की बौद्घधर्म निष्ठा की परीक्षा भी हो जाती। परंतु मृत्यु पर्यन्त अशोक भारतीय साम्राज्य के सम्राट पद का परित्याग नही कर सका। इसके विपरीत उसने उस साम्राज्य को ही धर्म प्रचार के एक बड़े मठ के रूप में परिवर्तित कर दिया।

धर्म विजय शस्त्र विजय से श्रेष्ठ है-‘अक्रोधेव जयेत क्रोध-अहिंसा परमोधर्म:-मा हिंस्यात सर्वभूतानि’ आदि बौद्घधर्म के उपदेशों को प्रचारित किया जाने लगा। बौद्घ भिक्षुओं के झुण्ड के झुण्ड यह प्रचार करते घूमने लगे-शस्त्र बल महापाप है सैनिकों में भी बौद्घधर्म का प्रचार होने लगा। इससे सीमावर्ती क्षेत्रों में भी क्षात्रवृत्ति तथा शस्त्रबल का पतन होने लगा।

सावरकर जी ने भारत के पतन की कहानी का प्रारंभ या मूल खोज लिया और लोगों को उस मूल के परिणाम भी बताये, संपूर्ण साम्राज्य छिन्न भिन्न हो गया। केन्द्रीय सत्ता शिथिल हो गयी तो छोटे-छोटे राज्य स्थापित होने लगे। बहुत सारे गौरवपूर्ण तथ्य यद्यपि हमारा साथ देते रहे परंतु इस एक दुर्गुण ने कि अहिंसा ही परमधर्म है-हमारा भारी अहित कर दिया।

सावरकर जी की भारतीयों को जगाने की अपनी अदभुत शैली थी। उन्होंने अपनी बात कही तो उसका इतिहासगत प्रमाण भी दिया, जिससे कि हम किसी भ्रांति में न रहें। अथवा हमें तथ्य का साथ के साथ ज्ञान जो जाए।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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