देश चाहता है मजबूत विपक्ष

  • 2016-03-17 03:30:31.0
  • राकेश कुमार आर्य

एक बार प्रधानमंत्रियों के एक विशेष सम्मेलन में भाग लेने के लिए लालबहादुर शास्त्री को लंदन जाना था। शास्त्री जी देश के प्रधानमंत्री थे उन दिनों। पर फिर भी उनकी सादगी ज्यों की त्यों बनी हुई थी। देश के प्रधानमंत्री होकर भी उस ‘लाल’ बहादुर के पास केवल दो ही कोट थे। उनमें से भी एक फट गया था । लंदन में ठंड अधिक होती है। इसलिए शास्त्री के सचिव ने उनसे आग्रह किया कि वह एक कोट और सिलवा लें। इस पर शास्त्री जी ने अपने सचिव से असहमति व्यक्त कर दी। इसके उपरांत भी सचिव महोदय प्रधानमंत्री के कोट का नया कपड़ा ले आये, और दर्जी को भी बुला लिया था। शास्त्री जी ने उस दर्जी से कहा कि अभी तो आप मेरे फटे हुए कोट को ही पलट दें। यदि पलटने पर अच्छा नही लगा तो देखा जाएगा।

शास्त्री जी के आग्रह को मानते हुए दर्जी ने पुराने वाले कोट को पलट दिया। कोट को देखकर शास्त्री जी बोले-अरे यह तो बिल्कुल नया सा लग रहा है। इस कोट की मरम्मत तक का जब हमें पता नही लग रहा है तो सम्मेलन में भाग लेने वालों को क्या पता चलेगा?

सादगी की मूर्ति शास्त्रीजी अपने पुराने कोट को पहनकर ही लंदन में आयोजित प्रधानमंत्री सम्मेलन में सम्मिलित हुए।

आज के हमारे नेताओं को इस घटना से बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है।

शास्त्री जी जैसे लोगों की प्रमुख चिंता देश के निर्धन और दलित -शोषित समाज के लोग होते थे। वह महलों में रहकर भी गरीब की झोंपड़ी की चिंता करते थे। आर्यसमाज के प्रमुख नेता रामगोपाल शाल वाले उन दिनों सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष थे। उनके पास प्रधानमंत्री आवास से फोन गया कि प्रधानमंत्री आपसे मिलने के इच्छुक हैं। शालवाले जी उनके पास पहुंच गये। शालवाले कहते हैं कि प्रधानमंत्री आवास के आंगन में एक चारपाई पर बैठे प्रधानमंत्री धूप सेंक रहे थे। अपने देश के प्रधानमंत्री को इतनी  सादगी से चारपाई पर बैठे देखकर शालवाले जी को आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता हुई थी।

आज की कांग्रेस का यह दुर्भाग्य रहा है कि इसने लाल बहादुर शास्त्री की इस सादगीपूर्ण जीवनशैली से कुछ भी ग्रहण नही किया और देश को लूटते-लूटते इसने देश की देह का सारा मांस नोंच लिया है, केवल कंकाल ही छोड़ा है। देश के पूर्व गृहमंत्री पी.चिदंबरम के बेटे कार्तिक ने पिता के ऊंचे पद का भरपूर दुरूपयोग किया और देश को जितना लूटा जा सकता था उतना लूटा।

यूपीए की अध्यक्षा सोनिया गांधी और कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी को माल्या का देश छोडक़र भाग जाना चुभ रहा है और इसके लिए वह प्रधानमंत्री मोदी को दोषी मान रहे हैं, पर उन्हें अपने चिदंबरम के खिलाये हुए गुलों की कोई चिंता नही हैं। हमारा माल्या के बचाव से कोई संबंध नही है, ना ही भाजपा सरकार पर राहुल गांधी के आक्रमण को अकारण सिद्घ करना हमारा उद्देश्य है, पर हम यह अवश्य कहना चाहेंगे कि अपने लोगों का बचाव और दूसरों पर कीचड़ उछालने की नेताओं की इस प्रवृत्ति के कारण ही देश की वर्तमान दुर्दशा हुई है। यदि चोर को चोर कहने और चोरी को पाप मानने की प्रवृत्ति हमारे नेता अपना लेते तो देश से गरीबी कब की दूर हो गयी होती। देश के नायकों ने पुराने कोट पलटवाकर पहनने छोड़ दिये उसका परिणाम यह आया कि देश में अरबों के घोटाले होने आरंभ हो गये । जिनमें कांग्रेस के नेता पहले स्थान पर रहे। एक छोटे से छोटे कांग्रेसी से भी आप चर्चा करने लगें तो उन्हें यह घमण्ड रहता है कि हमने देश को आजाद कराया। हम भी मान लेते हैं कि आपने देश को आजाद कराया, पर यह तो बता दो कि उस आजाद कराने के बदले में कीमत कितनी ले ली और कितनी और लोगे? और क्या देश को आजादी पुराने लुटेरों से इसीलिए दिलाई थी कि अब हमें लूटने का अवसर दीजिए आप हटिये और हमें गद्दी पर बैठने दीजिए।

गुरूनानक एक दिन एक बड़ी रियासत में पहुंचे, उसका राजा बड़ा अत्याचारी और भ्रष्टाचारी था। उसने अपनी प्रजा का धन लूट-लूटकर भर लिया था। वह ‘कुबेर’ बनने की चाह में यह सब करता जा रहा था। कैसे धन मिले और कहां से किस उपाय से वह प्राप्त किया जा सकता है, इसी उधेड़बुन में उसका दिमाग चौबीस घंटे उलझा रहता था। राजमहल में प्रवेश करने से पहले गुरूनानक ने कुछ कंकड़-पत्थर बीनकर अपनी दोनों मुट्ठियों में भर लिये। राजा उन्हें बड़ी उदारता और विनम्रता से राजमहल में ले गया। नानक आसन पर बैठ ही रहे थे किउनकी मुट्ठी से दो तीन कंकड़ छिटककर फर्श पर गिर पड़े। राजा ने उन कंकड़ों को उठाकर देखा और आश्चर्य से पूछा ‘‘गुरूदेव! ये कंकड़ पत्थर आपने किसलिए एकत्र किये हैं?’’

नानक मुस्कुराकर बोले-‘‘राजन, मरने के बाद इन्हें अपने साथ ले जाऊंगा और ईश्वर को उपहार दूंगा।’’

राजा जोर से हंसा-बोला-‘‘आप जैसा परमज्ञानी भी मरने के बाद कुछ ले जाने की सोचता है। क्या आप यह भूल गये कि परलोक जाने वाली आत्मा कंकड़ पत्थर तो दूर अपने साथ एक कण भी नही ले जा सकती।’’ अब नानक हंसे। बोले-‘‘राजन! यह तरकीब मैं आपसे पूंछने आया हूं। आप अपनी प्रजा को लूटकर जो धन एकत्र कर रहे हैं उसे अवश्य ही अपने साथ ले जाएंगे। यदि ले जाने का उपाय मुझे भी बता दें, तो यह उपहार मैं भी ईश्वर के लिए ले जा सकता हूं।’’ इस पर राजा को अपने किये पर पश्चात्ताप होने लगा और वह नानक के पैरों में गिर पड़ा।

पर आज ना तो वह राजा है और ना ही गुरूदेव नानक हैं। इसलिए आज के ‘राजा’ चोरी तो करते ही हैं सीनाजोरी भी करते हैं। पश्चात्ताप की बात तो छोडिय़े किये पर शर्माते भी नही हैं, बड़ी बेशर्मी से अपने ‘पाप’ की वकालत करते रहते हैं।

कांग्रेस इस समय टूटन की ओर बढ़ रही है। इसका रास्ता आत्मविनाश का है। यह भीतर से खोखली हो चुकी है, क्योंकि राजीव गांधी के काल से ही इस दल के नेताओं की अपने अतीत के इतिहास को पढऩे में रूचि समाप्त हो गयी थी। 1984 के पश्चात की कांग्रेस ‘अतीत के उजालों’ के नाम पर देश को लूटती रही है। 2004 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को इसलिए सत्ता मिल गयी थी कि देश में राजनीतिक विकल्प का अभाव था। 2009 में भी उसे इसी बात का लाभ मिला, पर अब क्या होगा? संकेत ऐसे हैं कि 2019 में भाजपा आये ना आए पर कांग्रेस को सत्ता नही मिलने वाली। जिस कांग्रेस के ‘पोस्टर ब्वाय’ कन्हैया जैसे राष्ट्रद्रोही बनेंगे उसकी विरासत को गलत हाथों में जाते देखकर इस पार्टी का आम कार्यकर्ता भी दुखी है और देश का हर नागरिक भी दुखी है। यह दुख भीतर ही भीतर कांग्रेस में लंबे समय से सुलग रहा है जिससे इस संगठन में एकप्रबल बिखराव की संभावना बनती जा रही है। हम आने वाले दिनों में कुछ ‘नेहरू गांधी’ परिवार के भक्तों के मध्य और कुछ विद्रोहियों के मध्य बढ़ती टकराव की स्थिति को देखेंगे। हमारा मानना है कि देश के किसी भी सत्तारूढ़ दल के लिए एक मजबूत विपक्ष का होना आवश्यक है। राहुल गांधी विरोधी और हठीला विपक्ष देने मेें चाहे सफल रहे हों पर वह एक मजबूत विपक्ष देने में सफल नही रहे हैं जबकि देश एक मजबूत विपक्ष चाहता है, उसके लिए कांग्रेस के पास क्या है? यह अभी तक स्पष्ट नही कर सकी है। उसका संभावित बिखराव और अंतर्मन्थन निश्चय ही कुछ गुल खिलाएगा, जिसकी अभी हमें प्रतीक्षा करनी होगी।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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