देखते हैं अब कृष्ण कौन बनेगा ?

  • 2015-12-24 03:30:40.0
  • राकेश कुमार आर्य

तीन वर्ष पहले हुए निर्भया कांड के एक जघन्य अपराधी को अपराधी मानकर और जानकर भी छोड़ दिया गया है। इसे ‘जुवेनाइल जस्टिस’ का नाम दिया गया है। यह अलग बात है कि देश की जनता को, स्वयं निर्भया की आत्मा को और उसके माता-पिता को या परिजनों को इसमें जो कुछ भी हुआ है, उसमें कहीं भी ‘जस्टिस’ होता दिखायी नही दिया है। लोगों ने ‘निर्भया प्रकरण’ में जघन्य अपराधी को छोड़ दिये जाने को ‘मर्डर ऑफ जस्टिस’ माना है, और पहली बार न्यायालय को भी लगा है कि व्यवस्था में कहीं भारी छिद्र हैं। देश की जनता की प्रतिक्रिया को और न्यायालय से की गयी विनम्र अपेक्षा को किसी भी दृष्टिकोण से उपेक्षित नही किया जा सकता।

nirbhaya kaand निर्भया कांड

यही कारण रहा कि अपनी न्यायोचित भूिमका से हजारों कोस दूर खड़ी राजनीति को भी लगा है कि कहीं ना कहीं उससे भी भारी चूक हो गयी है और यदि चूक को सुधारा नही गया तो देश की जनता उसे क्षमा नही करेगी। अत: संसद को बंधक बनाये खड़ी कांग्रेस ने भी मंगलवार को संसद के ‘बंधन पाश’ कुछ शिथिल किये और उसे कुछ काम निर्भया की आत्मा की शांति के लिए करने दिया। यह अलग बात है कि इस समय कांग्रेस संसद और लोकतंत्र की आत्मा की पूर्णत: अनदेखी कर रही है और उसकी छवि पूर्णत: एक ‘बचकानी पार्टी’ के रूप में बनती जा रही है। अब वहां से ‘नेहरूवाद’ समाप्त होकर केवल ‘दिग्विजयवाद’ जीवित है, जो उसे समाप्त करके ही सुख की नींद लेगा।

यह केवल भारत में ही संभव है कि यहां इस बात पर भी राजनीति का विद्रूपित चेहरा हमें दिखायी दे रहा है कि ‘जुवेनाइल जस्टिस’ के लिए आवश्यक सुधार अब से पहले नही किये गये। भाजपा कहती है कि अब से पूर्व कांग्रेस का शासन था, उसे इस ओर कुछ ठोस कार्य करना चाहिए था और कांग्रेस कहती है कि ‘चलिए, हम तो बेइमान थे, पर भाजपा वालो! तुम तो ईमानदार थे, डेढ़ वर्ष से तुम क्या करते रहे?’ एक अच्छी पहल के लिए भी यहां आरोप प्रत्यारोप लगते हैं, सीताराम येचुरी जैसे लोग संसद में मंगलवार को अंतिम क्षणों तक भी बाल अपराध रोकने के लिए लाये गये बिल का विरोध करते हैं और व्यवस्था में चली आ रही कमियों को ज्यों का त्यों बनाये रखने की वकालत करते हैं। सचमुच इन राजनीतिज्ञों की बुद्घि पर तरस आता है। राष्ट्रहित इनके चिंतन से वैसे ही विलुप्त हो चुका है, जिस प्रकार ‘डायनासोर’ नामक प्राणि की प्रजाति इस भूमंडल से कभी विलुप्त हो गयी थी। संसद में धन लेकर प्रश्न पूछने के लिए ख्याति प्राप्त कर गये हमारे माननीय जनप्रतिनिधि जनप्रतिनिधि से कब धनप्रतिनिधि हो गये? यह किसी ने विचार ही नही किया। इन धन प्रतिनिधियों ने एक बेटी की अस्मिता को लेकर भी संसद और सडक़ दोनों पर राजनीति की है, देश का कानून तो इन्हें क्षमा कर सकता है पर भारत की आत्मा और भगवान का कानून इन्हें क्षमा नही करेगा। क्योंकि सबसे बड़े अपराधी ही भारत के राजनीतिज्ञ हैं, जिन्होंने लोकतंत्र का अपहरण कर उसका शीलभंग किया है। इन्हीं शीलभंग करने वालों की छत्रछाया के तले पले-बढ़े दुष्टों ने निर्भया का शील भंग किया था। इसीलिए चाणक्य ने कहा था कि‘यथा राजा तथा प्रजा’। यह कहावत हर काल में चरितार्थ होती रही है, आज भी हो रही है और आगे भी होती रहेगी। सत्ता के भूखे भेडिय़ों ने सत्ता के लिए जितने घोर अपराध किये हैं उनमें सबसे बड़ा अपराध यह है कि इन्होंने राष्ट्रहितचिंतक मनीषियों और बुद्घिजीवियों को राजनीति की ओर देखने तक से भी निषिद्घ कर दिया है। बुद्घिजीवियों के विरूद्घ ‘बुद्घूजीवियों’ ने अपनी मुठमर्दी से अपने मुठमर्द न्यायालय में एक एकपक्षीय स्थगनादेश ले रखा है, इसलिए राजनीति के जंगल में लोकतंत्र की फसल सूखती जा रही है, क्योंकि वहां अब खेत का रक्षक बुद्घिजीवी नामक प्राणी नही मिलता, वहां तो अश्लील हरकतें करते नंगे लोग मिलते हैं। उनके बीच दुर्भाग्य से यदि कोई बुद्घिजीवी पहुंच भी जाये तो उसे अपनी आंखों पर हाथ रखकर समय व्यतीत करने के लिए अभिशप्त होना पड़ गया है।

देश में किशोर अपराध बढऩे का कारण भी यही है कि यहां राजनीतिज्ञ से लेकर मानवाधिकारवादियों और राजनीतिज्ञों से लेकर समाज के तथाकथित गणमान्य लोगों तक सभी अपराधी के साथ खड़े दिखायी देते हैं। उसकी रक्षा करने के लिए उसके साथ अनेकों हाथ होते हैं। जेलों में कथित मानवाधिकारवादी जाते हैं, वहां की स्थिति पर अपनी ऐसी रिपोर्ट देते हैं कि जैसे हमारी पुलिस केवल  पाशविकता के लिए प्रसिद्घ है और न्यायालय उस रिपोर्ट पर इतनी तीव्रता से संज्ञान लेते हैं कि जैसे वे भी पाशविक लोगों के प्रति विशेष दया रखते हैं। ये पाशविक लोग (जेलों में बंद अपराधी) बाहर कैसा कृत्य करके गये हैं, और उनके दुष्टाचरण से कितने परिवार या कितने लोग आतंक में जीते रहे हैं या जी रहे हैं उनके अधिकारों के प्रति किसी का ध्यान नही जाता। अधिकार मानवों के होते हैं, दानवों के लिए नही। दानवों के लिए केवल दण्ड होता है। इसीलिए मनु महाराज ने कहा है कि ‘दण्ड: शास्ति’ अर्थात दण्ड ही शासन करता है। यदि दण्ड (डंडा) शिथिल पड़ गया अर्थात राजा के न्याय का आभामंडल क्षीण हो गया, तो अनर्थ हो जाएगा। आज के ‘राजा’ के न्याय का आभामंडल ही तो क्षीण हो गया है, इसीलिए यहां बहनों की अस्मिता लूटने वाले जघन्य अपराधियों को भी कानून छोड़ रहा है। सारी व्यवस्था के लिए यह एक गंभीर प्रश्नचिन्ह है। ‘नपुंसकों की जमात’ से आज निर्भया की आत्मा का प्रश्न है कि अब से तीन वर्ष पूर्व तुम सबने मेरे अपराधियों को जिस कठोर सजा को दिलाने का संकल्प लिया था आज तुम्हारा वह संकल्प कहां गया? सारा देश और देश का हर राजनेता आज वैसे ही सिर नीचा किये बैठा है जैसे द्रोपदी चीरहरण के समय द्रोपदी के प्रश्नों की बौछार के समक्ष भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य जैसे महाविद्वान भी सिर नीचा किये बैठे थे। उस एक द्रोपदी के साथ जो कुछ हुआ था उसका परिणाम हमने देखा और उसके परिणामों को भोगा भी। पर आज तो हर दिन ‘द्रोपदी चीरहरण’ हो रहा है इसका परिणाम क्या होगा? राजनीति की ‘नपुंसक जमात’ से यह देश की बेटियों का प्रश्न है?

जो लोग मोदी को काम नही करने दे रहे हैं वे समकालीन इतिहास के सबसे बड़े खलनायक हैं, देश के लिए दुखदायक हैं। इनकी ‘काली करतूतों’ को देश का इतिहास कभी माफ नही कर पाएगा। प्रश्न यह नही है कि पिछले 68 वर्षों में हमने क्या किया है? प्रश्न यह है कि महाभारत युद्घ के पश्चात के बीते सवा पांच हजार वर्षों के इतिहास और इतिहास की उथल-पुथल से हमने क्या शिक्षा ली है? यदि आज भी यहां ‘द्रोपदी’ सुरक्षित नही है और यदि आज भी ‘दु:शासन’ को संरक्षण देने वाले ‘दुर्योधन’ जीवित हैं तो कहना पड़ेगा कि हमने इतिहास को अतीत का दीपक बनाकर उसके प्रकाश में अपने वर्तमान को देखने का और संवारने का काम नही किया है और उसे हमने कूड़ेदान की वस्तु ही बना दिया है, तब तो निष्कर्ष यही निकलेगा कि भारत फिर एक ‘महाभारत’ की ओर बढ़ रहा है। केजरीवाल ने तीन वर्ष पूर्व निर्भया के अपराधी को कठोर से कठोर सजा दिलाने का संकल्प लिया था पर आज वही केजरीवाल निर्भया के अपराधी को पुनर्वास के नाम पर पुरस्कार दे रहे हैं। राहुल गांधी जैसे भी हो मोदी को फेल करने पर तुले हैं। यदि इसी ‘उलूक धर्म’ में भारतीय राजनीति फंसी रही तो राजनीति को ‘दुर्योधन’ अपनी चेरी बनाएगा ही। देखते हैं अब ‘कृष्ण’ कौन बनता है?

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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