दलित आरक्षण की पात्रता पर विचार-भाग-2

  • 2016-06-17 03:30:26.0
  • राकेश कुमार आर्य

aarakshan

गतांक से आगे.....

राष्ट्रभक्ति भी नीलाम हो रही है

यहां तक कि आईएसआई अर्थात पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था और सीआईए अर्थात अमेरिका गुप्तचर संस्था के एजेंट तक उचित सुविधा शुल्क के बल पर देश की गोपनीय से गोपनीय सूचना यहां से ले जाकर उन्हें दे सकते हैं। कुल मिलाकर सारा ‘माल बिकाऊ’ है। राष्ट्रभक्ति भी जहां बिकाऊ हो वहां भला बचा ही क्या है? इसे आप राष्ट्रहत्या नही कहेंगे तो और क्या कहेंगे?

मैं इसे कानून की ढील मानता हूं। आज कानून की यह ढीली रस्सी हर नागरिक के पांवों में बाधा पहुंचा रही है, जो निश्चय ही किसी क्रांति की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट कर रही है। क्रांति होगी और ऐसी क्रांति होगी कि-जिसमें पाप और राष्ट्रघात से भरी यह सारी व्यवस्था धू-धू करके जल उठेगी। राष्ट्र को मूर्ख बनाकर जिन्होंने अभी तक मौज उड़ाई है उन्हें फिर कोई ‘रामप्रसाद बिस्मिल’ ललकारेगा और कहेगा-

हमारे प्रबल उद्योग से उद्घार होगा देश का।
तब नाश होगा सर्वदा दुख शोक के लवलेश का।।


हर काल में राष्ट्र को बलिदान की आवश्यकता रही है। आज भी है और कल भी रहेगी। झूठे सच्चे बलिदानों की अपनी गाथा लिखवाकर जिन लोगों ने राष्ट्र से बलिदान की परंपरा को पूर्ण विराम लगा देने का भ्रम समाज में फैलाया है वे ‘राष्ट्रघाती’ हंै। इतिहास इन्हें क्षमा नही करेगा। आज अपने भारत को ‘नपुंसक धर्मनिरपेक्षियों’ की आवश्यकता नही, अपितु उन्हीं राष्ट्रप्रेमी दीवानों की आवश्यकता है जो राष्ट्र की बलिवेदी पर अपना सर्वस्व होम करने के लिए तत्पर हों और कह उठें कि-
‘‘
खाके वतन का मुझको हर जर्रा देवता है।’’

राजा कौन : ? स्वामी विद्यानंद जी विदेह लिखते हैं-

‘‘राजे वे नही हैं जो मानव समाज के लिए व्यसन, विलास और व्याभिचार के कुचिन्ह छोड़ जाते हैं। अपितु राजे वे हैं जो मानव पीढिय़ों के लिए एक स्वच्छ, स्वस्थ और सुंदर जीवन रेखायें रेखांकित कर जाते हैं, जिन पर चलने से लोगों के जीवन यश रूप हो जाते हैं,
सुरभित और प्रमुदित रहते हैं।’’

वही राजा सच्चा राजा है जो शासक वर्ग को सुप्रेरणा देकर शासन को स्वच्छ और सक्षम बनाने का सरल प्रयास करता है। स्वच्छ शासन ही सक्षम होता है। अस्वच्छ शासन नितांत अक्षम होता है। प्रयत्न जनशोधन का नही अपितु शासक और शासन के शोधन का होना चाहिए। वह जन ही महाराजा है जो अपने मस्तिष्क रूप द्यौ से मानवता को सुविचारों की सुवृष्टि से सदा सर्वदा सींचता रहता है। राजा के शोधन के लिए ही स्वामी दयानंद जी महाराज के द्वारा राजस्थान में रहकर राजप्रवास किया गया था। यह कार्य उस ऋषि की दूरदर्शिता का परिचायक था। सचमुच में राजा वह नही है जो अपना और अपने प्रियजनों का हित संवद्र्घन करे, अपितु राजा वही है -जो सबका संवर्धन करता हुआ अपना संवर्धन करे।

जियो और जीने दो’ जैसा आदर्श वाक्य तो क्षुद्राधम असुरों का होता है। सच्चे राजा का आदर्श वाक्य तो-वर्धस्व वर्धय च’ होता है। अर्थात बढ़ो और बढ़ाओ, स्वयं उन्नत होओ और दूसरों को उन्नत करो। यह है भारतीय संस्कृति में राजा का आदर्श। यही है वह आदर्श राजव्यवस्था जिसने भारत को सदियों तक नही अपितु युग-युगों तक सुव्यवस्थित, सुसभ्य और सुसंस्कृत बनाकर सर्वतोन्मुखी उन्नति के सोपानों को चूमने के लिए प्रेरित किया था।

आज क्या हो रहा है? भारत में कानून की ढिलाई का शासन है। विधि का शासन जिसे कहा जाता है वह मात्र छलावा है। जनता भूलभुलैया की अंधियारी गली में राजनीतिज्ञों के द्वारा धकेल दी गयी है। ये लोग छलावों और भुलावों के सौदागर बन चुके हैं। इनके सामने इनके विधि के शासन में ही इन्हीं के द्वारा कानून की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।

आधुनिक चाणक्य

आज चाणक्य उसी को मान लिया जाता है जो अपने विरोधी राजनीतिक दल पर बेहयाई और ढीठता से कीचड़ उछालने का व्यापार करे और जो अपने राजनैतिक विरोधी को पटखनी देने में हर प्रकार के हथकंडे अपना सके और उसे पराजित कर सके।

पाठकवृन्द! यह चाणक्य जिसकी नीति और अर्थशास्त्र आज की शासन व्यवस्था को सही दिशा देने में अब भी समर्थ है, जिसने नंद वंश के राजाओं के पापाचार से लडऩे के लिए आग और पानी का खेल खेला, और उसे समूल नष्ट किया, जिसकी गुप्तचर व्यवस्था इतनी सुदृढ़ थी कि चंद्रगुप्त मौर्य का ससुर सेल्यूकस भी भारत की सीमाओं में जब घुसा तो उसके पीछे भी गुप्तचरों ने अपनी गुप्तचरी की और उसकी पल-पल की सूचना चाणक्य को दी।




आज सडक़ छाप नेता और पार्टी कार्यकर्ताओं के परिजन और संबंधी भी शासन द्वारा अपनी चौकसी को अपना अपमान समझते हैं। साथ ही अब तो राष्ट्रपति भवन तक में उग्रवादी छिपे होने का आरोप लगा है। सारी व्यवस्था चौपट हो गयी है। फिर भी अपने आपको ‘चाणक्य’ कहलाना गर्व की बात समझी जा रही है। यह चाणक्य का अनादर है। इन महामहिमों का अधिकांश समय अपने राजनैतिक विरोधियों को पटखनी देने, सरकार को असुंष्टों से बचाकर चलाये रखने में व्यतीत होता है। जनकल्याण के लिए इनके पास समय नही है। राजनैतिक विरोध लोकतंत्र की रीढ़ है।

सरकार की नीतियों की आलोचना विपक्ष का एक हथियार और विशेषाधिकार है। यह सभी बातें जनकल्याणार्थ आवश्यक भी हैं। राजनैतिक विरोधियों को पटखनी देना, हत्या कराना, चरित्र हनन की राजनीति करना, कीचड़ उछालना व अनर्गल आरोप लगाने का दौर जो भारत में चल रहा है यह सीधे-सीधे लोकतंत्र की हत्या है।

हत्यारों के राज में जनकल्याण की अपेक्षा करना मृगमरीचिका ही होगी। जिनकी भावनाएं बिक चुकी हैं उनसे आदर्शों की अपेक्षा करना मूर्खता है।

जमीरों का सौदा किये तो एक युग बीत गया।
अब इस शहर में कोई सौदागर नही रहता।।

  • अब राजनीति का कोई आदर्श नही रहा।

  • कोई विचारधारा नही रही।

  • कोई लक्ष्य नही रहा।

  • कोई गरिमापूर्ण स्तर नही रहा।

  • जिसके मन में जो आये वह आरोप लगा डालता है। राष्ट्र की चिंता किसको है? राष्ट्र की आत्मा तड़प रही है, उसकी ओर किसी का ध्यान नही है। ‘चाणक्य नीति’ किसी को छल कपट से, धोखे से पटखनी दे देने का नाम नही है। यदि उसे इस प्रकार समझा जा रहा है तो आज के चाणक्य उस महान चाणक्य को समझने में पूर्णत: असफल रहे हैं-यह मानना पड़ेगा। सही संदर्भों में चाणक्य को ना तो समझा गया है और ना ही उसका अनुकरण किया गया है। चाणक्य ने राष्ट्रवाद की भावना को जन्म दिया था।


क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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