दलित आरक्षण की पात्रता पर विचार-भाग-1

  • 2016-06-16 05:43:46.0
  • राकेश कुमार आर्य

दलित आरक्षण

इन सभी ने आरक्षण पर दी जाने वाली सुविधाओं और तज्जनित समानता का प्रचार तो बहुत किया है किंतु इस नीति को लागू करने में ईमानदारी से कार्य नही किया। वास्तव में सच यह है कि इनका चिंतन ही उतना पैना नही है। जितना कि आवश्यक है जैसे कि-‘‘प्रतिभाओं को जाति विशेष (सवर्ण) का होने के कारण सेवाओं से रोक देना, या पीछे रखना, अथवा प्रोन्नति देने में उसकी अवहेलना करना राष्ट्र के लिए अत्यंत घातक है। इन सबसे राष्ट्र की उत्पादन और कार्यक्षमता पर  प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

इस सबका निर्धारण और विनिश्चयन नही किया गया। दलित को उठाने के लिए समाज में व्याप्त उन बुराईयों की खोज करनी चाहिए थी जिनके कारण दलित, दलित बना। ये देखना चाहिए था कि आज के समय में दास प्रथा, बंधुआ मजदूरी या रोटी के सूखे टुकड़े देने के रूप में दमन कहां-कहां और किस-किस रूप में विद्यमान हैं? देखना यह भी चाहिए था कि पीडि़त और दुखी लोग ऐसे कितने हैं जिन्हें दो समय की रोटी मिलने तक के लाले हैं। कितने नंगे हैं, कितने अपंग और अपाहिज हैं। इनकी ढूंढ़ करके इनके प्रति व्याप्त घृणा और उपेक्षा के भाव को समाज से हटाने और भगाने का प्रयास होता। जनचेतना को जागृत कर उसे संस्कारित किया जाता। खेद है कि ऐसा हुआ नही। मात्र कानून बना दिया गया। कानून बनाकर उसका सरकारी भोंपुओं और टीवी से प्रचार किया गया।

अमीर-गरीब में भारी अंतर

उधर अमीर की अट्टालिकायें आसमान को छूती रहीं और इधर गरीब की झोंपड़ी का रहा सहा फूस भी उड़ता रहा, बस इस बढ़ती हुई खाई पर अमीर की अट्टालिका अट्टहास करती रही और गरीब की झोंपड़ी मारे शर्म के सर छुपाती रही। ये गरीबी उन्मूलन जैसे कानून बनने की परिणिति थी।

कानून से समाज सभ्य नही बना करता, यदि ऐसा होता तो दलित आज भी होटलों पर समाज के रईसों के घर और समाज की गलियों में पिटता, जूठन उठाता और मैला सिर पर उठाता हुआ दिखलाई नही पड़ता। उसके प्रति इन लोगों के दिल में मानवता, सहृदयता, सहिष्णुता और सदभावना का सागर हिलोरें मारता। उसके उत्थान को ये लोग अपना उत्थान समझते। ऐसी भावना का निर्माण करना कानून से भी अधिक सशक्त और प्रभावी होता। परंतु दुख की बात है कि इस दिशा में कोई भी प्रयास हमारे इन राजनीतिज्ञों द्वारा नही किया गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात स्वतंत्र भारत की सरकारों ने जितने घोटाले अब तक किये हैं उन सबसे बड़ा घोटाला ये है कि ये सारी सरकारें समस्या के मूल के प्रति जनसाधारण का ध्यान हटाये रखकर भोग और विलास में डूबी रही है। समर क्षेत्र में आकर रणघोष होना था, किंतु ये रणघोष दुर्भाग्यवश वातानुकूलित भवनों की चारदीवारी के भीतर ही सिमट कर रह गये। कानून बन गया, कत्र्तव्य की इतिश्री इसी से समझ ली गयी। राष्ट्र को राष्ट्र के भाग्य पर छोड़ दिया गया। बड़े घोटाले के बीच सब घोटालों में व्यस्त और मस्त हो गये। राष्ट्रहित गौण हो गये। इससे बड़ा ‘राजनीतिक भ्रष्टाचार’ कदाचित ही किसी देश में मिले।

जो लोग बोफोर्स घोटाला, चारा घोटाला, स्विस बैंक घोटाला, ताबूत घोटाला, सभी के जीप घोटाले आदि को ही राजनीतिक भ्रष्टाचार मानते हैं वे भारी भूल कर रहे हैं। राजनीतिज्ञों की वह सोच जिसके कारण जननीतियों का शोर तो मचाया गया, किंतु उनको सही रूप में लागू नही किया गया-इस समस्या का मूल (घोटालों की समस्या) कारण है। अत: लोकहित आज भी उपेक्षित है। समाज में समानता और विकास के समान अवसर चोरी होकर किसी वर्ग विशेष के विशेषाधिकार बन चुके हैं। ये लोग आज के समय के जमींदार हैं, सामंत हैं सरदार हैं। लालफीताशाही व नेता वर्ग को इसमें सम्मिलित किया जा सकता है। गरीब को तो इस लाइन में लगने तक का अधिकार भी नही है।

कानून क्रांति की नींव है


मेरी यह दृढ़ धारणा है कि कानून ‘क्रांति की नींव’ है। यह कितनी विचित्र बात है कि कानून का निर्माण वर्तमान व्यवस्था को सुदृढ़ता प्रदान करने और जनोपयोगी बनाये रखकर उसे चिरायुष्प प्रदान करने के लिए किया जाता है। कालांतर में यही कानून उसी व्यवस्था को सड़ा गलाकर धू-धू करके जला डालता है। कानून का शिकंजा जितना सख्त होता है उतना ही शीघ्र वह अपनी जन्मदात्री व्यवस्था की समाप्ति का कारण बनता है।

संसार में जितनी भी जनक्रांतियां हुई हैं उन सबके मूल में कानून की सख्ती और कानून की ढिलाई दोनों ही प्रमुख कारण रहे हैं। कानून की सख्ती तानाशाही शासन के होने का प्रमाण है। जबकि उसकी ढील (अथवा पालन करने-कराने में लापरवाही और प्रमाद का प्रदर्शन) ही शासक के व्यक्तित्व की सुस्ती और राष्ट्रबोध से उसकी विमुखता को प्रकट करती है।




आज भारत में क्या हो रहा है? यह देखन के लिए-

  • चविधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका के आचरण को देखना होगा।

  • चविधायिका में चोर, लफंगे, डकैत, हत्यारे पहुंच जायें तो कानून बन तो सकता है किंतु उसका पालन भी निष्ठा से हो, यह कदापि संभव नही है।

  • चन्यायपालिका कितने ही मामलों में अंग्रेजी सरकार द्वारा बनाये गये कानूनों से बंधी हुई है, उसे गवाह चाहिए और गवाह की जान सुरक्षित नही। इसलिए अंधा कानून न्याय नही कर पाता।


न्याय मंदिर भी संकट में




  • चनेताओं के हस्तक्षेप व बड़े लोगों की पकड़ न्याय के मंदिर में प्रवेश कर गयी है। इसलिए कानून ढीला पड़ गया है। फिर भी माननीय सर्वोच्च न्यायालय कई मामलों में अपनी सर्वोच्चता और निष्पक्षता को सिद्घ करने में सफल रहा है। यह संतोष का विषय ही नही अपितु अंधेरे में प्रकाश की किरण है।

  • चकार्यपालिका ऊपर से (मंत्री से संतरी तक) नीचे तक आकण्ठ भ्रष्टाचार में डूबी हुई है। यहां कानून का पालन नही होता, अपितु कानून के सहारे पेट-पालन किया जाता है। जैसे ‘इनकम टैक्स’ का कानून सारे विभाग के लिए रोजी-रोजी का साधन बना हुआ है। आप जाइये वह स्वयं आपको बता देंगे कि आपको ‘इनकम टैक्स’ कैसे बचाना है?

  • च वन विभाग वाले आपको सुविधा शुल्क मिलते ही बता देंगे कि आप किस प्रकार पेड़ काट सकते हैं? और किसप्रकार कानून से भी बच सकते हैं?

  • च सार्वजनिक निर्माण विभाग वाले कानून की आड़ में पेट पालन हेतु उचित भोजन अर्थात सुविधाशुल्क लेकर आपको स्वयं बता देंगे कि सडक़ों पर अतिक्रमण कैसे किया जा सकता है?


क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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