दलाई लामा बौद्ध की शिक्षाओं के और भारत के हितों विरोधी हैं

  • 2016-01-21 06:30:39.0
  • डा. संतोष राय

भारत का सहिष्णु हिन्दू समाज कभी भी अपने आपको बौद्धों से अलग नहीं मानता है लेकिन दलाई लामा ने कभी भी अपने आपको हिन्दुओं का अंग नही कहा, उसके विपरीत  स्वयं भगवान बुद्ध ने त्रिपिटक में कहा है कि उनका ही पूर्व जन्म राम के रूप में हुआ था। अत: श्रीराम को मानने वाले सनातन धर्मी लोग और बुद्ध को मानने वाले बुद्धिस्ट लोग हिन्दू ही कहलायेंगे ।Dalailama

श्रीलंका के बुद्धिस्ट संगठन श्बोडू बाला सेनाश् के बौद्ध भिक्षुओं ने दलाई लामा को विश्व का बौद्ध गुरु मानने से इनकार कर दिया था और उन भिक्षुओं ने यह भी कहा है की पश्चिमी देश ही दलाई लामा को बौद्धों का नेता या गुरु मानते हैं लेकिन अन्य बौद्ध राष्ट्र या भिक्षु नहीं । भारत की चीन और तिब्बत पर नीति रू अब समय आ गया है की भारत सरकार तिब्बतए भारत में रह रहे तिब्बती नागरिकों को लेकर उनके भविष्य को देखते हुएए दलाई लामा एवं चीन की भूमिका पर स्पष्ट नीति बनांये और कांग्रेस द्वारा स्थापित खोखली नीति को उखाड़ फेंके और चीन पर दबाब बनाकर चीन से कहे की तिब्बतियों को आंशिक न्याय देए कश्मीर पर चीन भारत का समर्थन करे या चीन पाकिस्तान से कश्मीर पर दुरी बना ले ।

भारत चीन विरोधी गतिविधियो का अड्डा ना बने क्योंकि दलाई लामा का भी रुख पूर्ण रूप से भारतीय नही रहा है । भारत में ही तिब्बत की  निर्वासित सरकार द्वारा मैक्लोडगंज.धर्मशालाए जिला कांगड़ाए हिमाचल प्रदेश से तिब्बती लोगों के लिए  पासपोर्ट जारी किया जाता है और अब चीन ने भी कश्मीर के लोगों को नत्थी वीसा देना प्रारंभ कर दिया था जिसे लेकर भारत में काफी हो.हल्ला हुआ था।

भारत के हित में यही है की अब दलाई लामा को ज्यादा ढोना उचित नहीं है या दलाई लामा भी अपना रुख स्पष्ट करें ! चीन तिब्बत को छोड़ेगा नहीं और हम कब तक दलाई लामा को समर्थन देते रहेंगे और कश्मीर के हित में भी एक बार चीन से दो टूक बात कर लेनी चाहिए ! भारत को पश्चिमी देशों की अंधी दौड़ में शामिल  होना नही होना चाहिएए बात रही तिब्बत के बौद्धों की तो उस पर चीन को मनाया और समझाया जा सकता है  यदि चीनियों में मानवीय संवेदनाएं है ।