दल, दिल और ठाकुर साहब

  • 2016-02-02 03:30:27.0
  • राकेश कुमार आर्य

दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर निकलता है। भारतीय राजनीति में यह मुहावरा आजादी के बाद से आज तक सच बना रहा है। उत्तर प्रदेश ने ही अब तक के अधिकांश प्रधानमंत्री देश को दिये हैं। कांग्रेस के मनमोहन सिंह और नरसिम्हाराव को छोड़ दें तो पं. नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी उत्तर प्रदेश से ही गये और देश पर शासन किया। इसके अतिरिक्त लालबहादुर शास्त्री, चौधरी चरण सिंह, चंद्रशेखर, वी.पी.सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी और अब मूलरूप से गुजराती प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी उत्तर प्रदेश की देन हैं। इस प्रकार यू.पी. को समझ लेना या यू.पी. का मुख्यमंत्री बन जाना मानो दिल्ली को जीतने की तैयारी करने के लिए पहली परीक्षा पास कर लेना है। यही कारण है कि यू.पी. के कई पूर्व मुख्यमंत्री भारत का प्रधानमंत्री बनने की इच्छा रखते हैं। इनमें प्रमुख हैं-केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथसिंह, सपा सुप्रीमो मुलायमसिंह यादव और बसपा सुप्रीमो बहन मायावती।

2017 का यू.पी. विधानसभा का चुनाव निकट है। उसकी परछाई दिखने लगी हैं, इसलिए नेताओं ने अभी से लंगर-लंगोट कसने आरंभ कर दिये हैं। तैयारियां जोरों पर हैं और सारी राजनैतिक पार्टियां अपनी-अपनी गोटियां बैठाने लगी हैं। ऐसे में सपा से निष्कासित एक कद्दावर नेता अमरसिंह की फिर सपा में जाने की चर्चा जोरों से होने लगी है। पिछले साढ़े तीन वर्ष से अमरसिंह ‘दल’ के दरवाजे पर खड़े-खड़े नेताजी के दिल के दरवाजे को खुलवाने में सफल हो गये हैं। इनके लिए सबसे पेचीदा बाद यही थी कि वह ’दल’ के दरवाजे पर जाते थे तो वहां आजमखां और प्रो. रामगोपाल जैसे उनके धुर राजनैतिक विरोधी सुरक्षा प्रहरी का डंडा हाथ में लिये खड़े मिलते थे और ये दोनों जनाब अमरसिंह को देखते ही डंडा घुमाते हुए कह देते-‘महोदय! दूर हटिये।’ सत्ता का स्वाद चख चुके ठाकुर साहब सत्तासीन सपा को बार-बार इसी आशा से याद करते रहे कि संभवत: इस बार भी कुछ ‘मलाई’ खाने को मिल जाए। पर क्या करें सुरक्षा प्रहरी इतने शक्तिशाली अंदाज से डंडा घुमाते थे कि ठाकुर साहब डंडा को देखते ही भाग खड़े होते थे।

जब उनकी इस हास्यास्पद स्थिति पर कोई कुछ पूछता तो ठाकुर साहब खिसियाकर कह देते कि मैं पार्टी में जाना नही चाहता, ना ही मैं उस काम के लिए वहां गया था, मेरा तो कोई और काम था। पर क्या करें यह जनता भी पढ़-लिखकर बहुत होशियार हो गयी है, यह सब समझती है पर नाटक ऐसा करती है कि जैसे कुछ भी नही जानती। हमारे नेता जनता का मूर्ख बनाने की भूल में रहते हैं। कारण कि जब देश को स्वतंत्रता मिली थी तो यहां पढ़े-लिखे लोगों की संख्या मात्र दस प्रतिशत थी। जबकि आज 21वीं शदी में यह आधे से अधिक हो गयी है। पचास प्रतिशत पढ़े लिखे लोगों की संख्या के बढऩे को नेता भूले रहते हैं। इन्हें यही भ्रांति रहती है कि जैसे यह जनता कुछ नही जानती।

अमरसिंह को दल के दरवाजे पर खड़े-खड़े साढ़े तीन वर्ष से अधिक का समय हो गया है। कहने का अभिप्राय है कि मुख्यमंत्री अखिलेश की पहली पारी पूरी होने वाली है और ठाकुर साहब दल के दरवाजे पर ‘घुड़दौड़’ कर रहे हैं। उन्हें आजम खां और प्रो् रामगोपाल दौड़ा-दौड़ाकर थका चुके हैं। बेचारे थके-हारे अमरसिंह को अब चुनावी वर्ष में जाकर नेताजी (मुलायमसिंह यादव) ने देखा है और कहा है कि अमरसिंह हमारे ‘दिल’ में रहते हैं। अब ठाकुर साहब को थोड़ी तसल्ली मिली है। पर सवाल यह है कि नेताजी को चुनावी वर्ष में ही यह कैसे पता चला कि अमरसिंह उनके दिल में रहते हैं? दिल से हमारा अति निकट का संबंध होता है, पर नेताजी को देखिए कि साढ़े तीन वर्ष उन्हें अपने दिल में झांके हो गये कि इसमें रहने वालों में एक नाम अमरसिंह का भी है। अब इस पर ठाकुर साहब के दिल पर क्या बीती होगी? यह तो वही जानते होंगे। पर उन्हें यह जरूर लगा होगा कि दिल में रखकर भी इतनी देर से देखा है मेरी ओर। सारी मलाई चट कर ली है और अब मेरी परंपरागत वोटों को मुझसे पाने के लिए कह रहे हैं कि आप हमारे दिल में रहते हैं। कैसे अजीब होती है राजनीति? पटक-पटककर अपनों को ही मारती है और फिर उसकी मरहम पट्टी करने का नाटक करती है कि गलती से ऐसा हो गया है। पर इस उपहास की अंतिम परिणति तो और भी दुखदायी तब हो उठती है जब पता चलता है कि मरहम पट्टी करने वाले भी घावों पर नमक लगी पट्टी बांधकर चले गये हैं। ‘दल’ से दूर रखकर दिल में रखने की बात कहकर और जिस उम्मीद से ठाकुर साहब दर पर कटोरा लिये खड़े थे-उस पर ध्यान न देकर नेताजी ने अब उनके दिल के फफोलों पर नमक की पट्टी बांधने का ही काम किया है। पर यह राजनीति है इसमें सब कुछ चलता है। इसलिए ठाकुर साहब मुलायमसिंह की बातों पर ही विश्वास करते हुए अब आगे बढ़ेंगे और बहुत संभव है कि अगला चुनाव वह सपा के भीतर जाकर ही लड़ें।

चुनावी वर्ष में नेताजी ने अमरसिंह के लिए ही ‘दिल’ खोलकर दिखाया हो ऐसी बात नही है उन्होंने 1991 में राममंदिर  के कारसेवकों पर चलवाई गयी गोलियों पर भी अफसोस व्यक्त किया है। इसी के साथ उनके बेटे और प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का अमरसिंह को लेकर यह कहना कि दल से बड़ा दिल होता है और यदि नेताजी मा. अमरसिंह के लिए दिल के दरवाजे खोलने की बात कह रहे हैं तो वह ठीक ही कह रहे हैं-भी विचारणीय है। वह समझ गये हैं कि चुनावी वर्ष में नेताजी यदि कई बिंदुओं पर एक साथ दिल की बात कह रहे हैं तो उसके कई अर्थ हैं, जिन्हें समझकर 2017 की चुनावी परीक्षा की तैयारी की जाए। नेताजी के दिल की बात ने आजमखां और प्रो. रामगोपाल को भी प्रभावित किया है और वह भी अब समझ गये हैं कि चुनावी वर्ष में पार्टी के किले की मरम्मत करने के दृष्टिगत इन ‘दिल की बातों’ का बड़ा महत्व है। इसलिए हम देखेंगे कि सारी चौपाल जब लुट चुकी होगी तब ठाकुर साहब की ताजपोशी करते हुए उन्हें ‘चौपाल का सरपंच’ घोषित किया जाएगा। यह अलग बात है कि उस समय सरपंच के लिए खाने के लिए कुछ नही होगा। पर उसने जितनी देर बाहर रहकर तपस्या की है उसके लिए जो कुछ भी मिलेगा, उसी में संतुष्ट रहना उसकी बाध्यता होगी। हमें आशा करनी चाहिए कि अगले चुनावों में सपा सफल हो, और ठाकुर साहब को खाने पीने को खूब मिले। यदि ऐसा नही हुआ तो अब की बार तो ठाकुर साहब का दल टूटा है पर अगली बार तो दिल ही टूट जाएगा।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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