चीन किस-किसको निगलेगा

  • 2016-02-07 07:22:50.0
  • देवेंद्र सिंह आर्य

आज के वैश्विक परिवेश में चीन सोया हुआ दानव है, सुप्त ज्वालामुखी है। विश्व की संस्कृतियों को मिटाकर चीन का लाल ध्वज फ हराना इस देश की विदेश नीति का मुख्य उद्देश्य है। यही माओवाद है। 1949 में सत्ता में आते ही माओ ने चीन में अपनी इसी साम्राज्यवादी नीति का प्रचलन किया। इसका पहला शिकार बना मानव संस्कृति का प्राचीनतम केन्द्र तिब्बत। प्राचीनकाल में हुई जल प्रलय के पश्चात जब पुन: मानव सभ्यता एवं संस्कृति का विकास हुआ तो उसका सर्वप्रथम साक्षी बनने का गौरव त्रिविष्टप अर्थात् तिब्बत को प्राप्त है। जिस राष्ट्र ने जल प्रलय के विकराल गाल में समाई हुई मानवता को पुन: आँखें खोलने, विकास की किलकारी मारने और उन्नति के उच्चतम शिखर को छूने के लिए अपने आप को सर्वप्रथम प्रस्तुत किया, आज उसकी उस भलाई का मूल्य चीन उसे गुलाम बनाकर चुका रहा है और पूरी मानवता आश्चर्यजनक चुप्पी साध् कर अपनी कृतघ्नता प्रदर्शित कर रही है, जो कि मानव की प्रकृति में न होकर भी समा गयी है।
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इतिहास के प्रति बरती गई असावधानी या प्रमाद मानव को दयनीय स्थिति में ले जाते हैं। चीन ने तिब्बत को हड़पा तो माओवाद का जन्म हुआ। माओवाद के रूप में जन्मा यह दानव द्वितीय विश्वयुद्घ की नाजायज सन्तान थी। जिस समय मानवता राष्ट्रों की महत्वाकांक्षाओं और स्वार्थों की आग से हुए भयंकर विनाश के घावों को सहला रही थी और नागासाकी और हिरोशिमा मानव के पराभव के इतिहास की ताजा साक्षी दे रहे थे, ऐन उसी वक्त तिब्बत को माओवाद की भट्टी में तड़पते देखकर भी विश्व समुदाय की ओर से कोई विशेष कार्यवाही नहीं होना बड़े ही आश्चर्य की बात है। यदि इस परिप्रेक्ष्य में हम संयुक्त राष्ट्र की कार्यशैली की समीक्षा करें तो इस विश्व संगठन ने हमें विश्व समस्याओं के प्रति कोई ठोस कार्यवाही न करके प्रारम्भ से ही निराश किया है।

विश्व समुदाय और विश्व संगठन, सयुक्त राष्ट्र के निराशाजनक प्रदर्शन की परिणति यह हुई कि चीन की साम्राज्यवादी भूख दिनों-दिन बढ़ती चली गई। तिब्बत की संस्कृति को मिटाने के लिए दस से पंद्रह लाख लोगों को चीन के द्वारा अब तक समाप्त किया जा चुका है। शोषण, दमन दलन और उत्पीडऩ की कहानी तिब्बत आज उस समय भी देख और झेल रहा है जब संयुक्त राष्ट्र ने प्रत्येक राष्ट्र की सम्प्रभुत्ता की रक्षा और सम्मान करने को अपना प्रथम उत्तरादायित्व माना है।

मानव की स्वतंत्रता क्या होती है? मानवीय गरिमा और मानवीय स्वतन्त्रता की रक्षा करने की डींगें मारने वाला यह विश्व समुदाय आज यह स्पष्ट नहीं कर पा रहा है और ना ही ये कि किसी राष्ट्र और देश की संप्रभुत्ता किसे कहते हैं? तिब्बत के लोग और उनका राष्ट्र आज भी यह नहीं जानते। यू.एन.ओ. उसके वासियों के अधिकारों की रक्षा नहीं कर पा रहा है, तो उसका पतन बहुत ही निकट है। लोकतांत्रिक समाज में साम्राज्यवाद की ऐसी घृणित नीतियाँ हमारी विकृत मानसिकता की प्रदर्शिका और पोषिका हैं। जिनसे जितना शीघ्र हो सके हमें बचना चाहिए।

तिब्बत को हड़पकर चीन निगल चुका है। नेपाल को उसने अपने जबड़ों में ले लिया है। नेपाल की राजशाही को समाप्त करने के बहाने माओवादियों ने विश्व के एकमात्र हिन्दू राष्ट्र में जिस प्रकार अपनी खूनी उपस्थिति की अनुभूति कराई है वह निश्चय ही मानवता को सचेत करने के लिए पर्याप्त है। जहाँ तक भारत का प्रश्न है तो तिब्बत भारत और चीन के मध्य ‘‘बफ र स्टेट’’ का कार्य करता आया है।

तिब्बत के मध्य में रहते हुए चीन हमसे बहुत दूर था किन्तु तिब्बत को निगलने के बाद यह दानव हमारे बहुत निकट आ गया। आज भारत की सीमा से चीन की बहुत बड़ी सीमा मिलती हैं। चीन की लगभग पाँच लाख सेना भारत की सीमा के पास है। जो माओवादी आन्दोलन को भारत में फेेलाने के लिए माओवादियों को उचित संरक्षण प्रदान करती है। ल्हासा और काठमाँडू के पश्चात चीन की गिद्घ दृष्टि अब दिल्ली पर है। 1962 में हुए चीन भारत युद्घ के समय हमारे कम्युनिस्टों ने जिस प्रकार चीन की सेनाओं का स्वागत किया था उससे आप अनुमान लगा सकते हैं कि चीन की चुनौती से भारत की हिन्दू जनता के लिए कितना संकट है। भारत में जयचन्द परम्परा बड़ी कुख्यात है, जो कि दुर्भाग्य से अभी भी जीवित है। इसलिए चीन ने नेपाल के पश्चात अपने खूनी पंजों को भारत पर कसना आरम्भ कर दिया है।

भारत की वैदिक संस्कृति के विषय में यह सर्वमान्य सत्य है कि यह संसार की सर्वाधिक वैज्ञानिक और परिमार्जित संस्कृति है,

और यह भी कि विश्व की प्राचीनतम संस्कृति भी यही है। इस सत्य के साथ एक कुख्यात तथ्य यह भी है कि इस संस्कृति को मिटाने के लिए भारत पर आज ईसाइयत और इस्लाम तो भारत में धर्मान्तरण का खेल खेलकर तथा आतंकवाद को बढ़ावा देकर अपने मिशन को सफ ल बनाने में लगे हुए हैं तो चीन इस देश के इतिहास, संस्कृति, धर्म और गौरव को ही मिटा देना चाहता है। इसलिए उसने माओवाद को भारत में प्रसारित करने का बीड़ा उठाया है।

आसाम की ओर अरूणांचाल प्रदेश में एक लाख वर्ग किमी से अधिक भारतीय भू भाग को चीन हड़प चुका है। इसी प्रकार कश्मीर में भी उसके द्वारा भारतीय भू भाग पर कब्जा करके पाकिस्तान के लिए बनाए गए संपर्क मार्ग का प्रयोग आतंकवाद को पाकिस्तान से वाया चीन और नेपाल के भारत में पहुँचाने की सारी तैयारियाँ की जा चुकी हैं। जब हम गुजरात, राजस्थान, पंजाब और कश्मीर की लम्बी भारत पाक सीमा पर अरबों रुपयों की कंटीली तारें लगाकर आतंकवाद से लडऩे की तैयारी कर रहे थे तब भारत के कश्मीर को चीरकर चीन द्वारा भारत के विरूद्घ ये घातक रणनीति बनायी जा रही थी। भारत की सरकार यह सब जानती है किन्तु जानकर भी अनजान बनी हुई है। भारत का यही दुर्भाग्य है कि इतिहास का यदि हम अनुशीलन करें तो ज्ञात होता है कि समय को पहचानने की या उसके प्रति उदासीनता प्रदर्शित करने की हमारी दुर्बलता हमें उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है। हमने संकट को तभी पहचाना है जब वह सर्वनाश बनकर हम पर छा गया।

चीन की यह आँधी उत्तर प्रदेश, बिहार और पूर्वोत्तर भारत के जरिए भारत में प्रवेश कर चुकी है। प्रवेशोपरान्त बड़े ही विकराल रूप में भयंकर विनाश भी मचा रही है। किन्तु चीन समर्थक जयचन्दों की कृपा और विदेशी-महिला के सरंक्षण में चल रही देशी पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सं.प्र.ग. सरकार संकट के प्रति पूर्णत: उदासीन थी। राष्ट्र के ये नेता और रक्षक कब चेतेंगे कुछ पता नहीं। संकट की इस घड़ी में चुनौती का मुँह तोड़ उत्तर देने के लिए हमें राष्ट्रवासियों को ही जगाने का कार्य करना है।

इस देश में सोयी हुई राष्ट्रवाद की भावना को बलवती और प्रखर करना है। राष्ट्र की चुनौतियों को जनता को समझाकर राष्ट्र जागरण का कार्य करना है।

यह देश, राष्ट्र और समाज सुधारक ऋषियों का देश है। हमें स्मरण रखना चाहिए कि राजनीतिज्ञों पर विश्वास करके जब-जब हमने आलस्य और प्रमाद का प्रदर्शन किया है, तब-तब हमें निराशा ही हाथ लगी है। किन्तु जब-जब हमने ऋषि दयानन्द, विवेकानन्द, श्रद्घानन्द, योगी अरविन्द जैसी महान विभूतियों के हाथ में अपना नेतृत्व दिया है तब-तब हमारा कल्याण हुआ है।

पंचसितारा होटलों और रेस्तरांओं में ‘‘संयोगिता’’ के साथ रास रचाने वाले ‘पृथ्वीराज चौहान’ की ओर आज हमने देखने का प्रयास किया तो घोर अनर्थ हो जाएगा। आज केवल क्रान्ति की बयार बहाने के लिए इस देश की पावन संस्कृति की रक्षार्थ स्वयं को मिटाने के लिए उद्यत कुछ तप: पूतों की हमें आवश्यकता है।

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देवेंद्र सिंह आर्य ( 262 )

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