चाय बागान हुए ‘चाय वाले’ के

  • 2016-05-20 03:30:00.0
  • राकेश कुमार आर्य

BJP win in Assam

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम आ गये हैं। आसाम जैसे महत्वपूर्ण प्रदेश में पहली बार भाजपा ने अपनी सरकार बनाकर इतिहास बनाया है। जबकि पश्चिमी बंगाल में ममता बनर्जी ने निरंतर दूसरी बार सत्ता की चाबी अपने पास रखी है और बड़ी बात ये है कि 1984 के बाद पहली बार किसी एक दल के मुख्यमंत्री को निरंतर दोबारा मुख्यमंत्री बनाकर सुदूर दक्षिण के तमिलनाडु प्रांत की जनता ने भी जयललिता को सत्ता सौंप दी है। जबकि वहां के बारे में अनुमान था कि जयललिता सत्ता गंवा सकती है। पांचों प्रांतों के चुनाव परिणामों ने सबसे अधिक कांग्रेस को कष्ट दिया है-जिसे अपने दो प्रांतों आसाम और केरल में सत्ता से हाथ धोना पड़ा है, और उसे पांडिचेरी जैसे छोटे से राज्य में ही सरकार बनाने का अवसर मिल सका। अब देश के केवल छह प्रांत ऐसे हैं जिनमें कांग्रेस की सरकारें हैं। पीएम मोदी का कांग्रेस मुक्त भारत लगभग बन चुका है। राष्ट्रीय राजनीति में आसाम, पश्चिमी बंगाल, केरल और तमिलनाडु का ही अधिक महत्व है, जहां की जनता ने अपना स्पष्ट जनादेश देकर सत्ता अपनी अपनी पसंद के राजनीतिक दलों को सौंप दी है।

इन चुनाव परिणामों के ये बाहरी संकेत हैं जो बता रहे हैं कि चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अनुसार हुए हैं और इन परिणामों से पता चलता है कि देश में लोकतंत्र की गहरी जड़ें हैं। यहां जनता ही सर्वोपरि है और वही यह निश्चित करती है कि उसका ‘राजा’ कौन होगा? हमारे लोकतंत्र का यह सराहनीय उज्ज्वल पक्ष है।

अब इन पांचों राज्यों के चुनाव परिणामों की तस्वीर के दूसरे पक्ष पर भी विचार किया जाना अपेक्षित है, जो कि स्पष्ट करेगा कि इन चुनाव परिणामों से लोकतंत्र की जीत हुई है या हार हुई है? हमारे देश में लोग अपने आलेखों में और अपनी समीक्षाओं में उन बाहरी बातों की चर्चा करते हैं, जो दिखायी देती हैं, घटनाक्रम के मर्म पर कोई चर्चा करना हम उचित नही मानते। जबकि ऐसा नही होना चाहिए।

पहले आते हैं आसाम पर। आसाम की जनता ने अपने चाय बागान ‘चाय वाले’ के नाम कर दिये हैं। उसने स्पष्ट कर दिया है कि वह कांग्रेस के ‘कन्हैया’ के साथ नही है। वह देश की एकता और अखण्डता के साथ है और उसी के लिए कार्य करना चाहती है। देश में राष्ट्रवाद की बहस को आसाम की जनता ने बड़ी गंभीरता से समझा है और उसके समर्थन में अपना मत देकर राहुल गांधी की ‘कन्हैयावादी’ सोच को धत्ता बता दिया है। वास्तव में ही आसाम की जनता इस कार्य के लिए बधाई की पात्र है।

हमें चुनाव परिणामों की समीक्षा किसी एक राजनीतिक दल के प्रति पूर्वाग्रही होकर या एक के प्रति उदार होकर करने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए। पर जब बात देशद्रोह और देशभक्ति या राष्ट्रवादिता की चलती है, और  कोई व्यक्ति राष्ट्रवादिता के पक्ष में हाथ उठाता है तो उसे ‘भगवावादी’ मान लिया जाता है, और किसी एक पार्टी के साथ जोड़ दिया जाता है। यह प्रवृत्ति भी अनुचित है।




देश में लोकतांत्रिक प्रणाली को सफल करने में इस बात को ध्यान रखना चाहिए कि देश की एकता और अखण्डता को क्षत-विक्षत करने में लगी शक्तियां जिस प्रकार देश में अपनी विचारधारा फैलाती जा रही हैं उनकी वह सोच गलत है। लोकतंत्र के नाम पर देशघाती सोच को प्रोत्साहित करने की छूट नही दी जानी चाहिए। आसाम में हिंदू समाज के साथ जैसा अन्याय और अत्याचार हो रहा था उसे किसी ने भी उठाया ही नही। उस अत्याचार को केवल इसलिए सहन किया गया, या किया जाता रहा कि वह हिंदू पर किया जा रहा अत्याचार था और भारतीयता से प्रेम करने वाले लोगों पर किया जा रहा अत्याचार था। आज वहां की जनता ने निर्णय लिया है कि वह ऐसे लोकतंत्र की पक्षधर नही है, जो वोट बैंक की राजनीति करते हुए किसी एक संप्रदाय की उपेक्षा करे और किसी एक संप्रदाय को प्रोत्साहित करे।

पश्चिमी बंगाल की कुल 294 सीटों में से बड़ी संख्या में बंगलादेशी घुसपैठियों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया है और वहां के चुनाव परिणाम को प्रभावित कर दिया है। ये वही लोग हैं जो भारत के साथ किसी प्रकार की आत्मीयता नही रखते। इन्हें अपने लिए तात्कालिक आधार पर लाभ चाहिए और इनसे वोट लेने वाले राजनीतिक दल विशेषत: टीएमसी को भी तात्कालिक आधार पर अपने लिए लाभ चाहिए, उसके लिए भी राष्ट्रहित द्वितीय प्राथमिकता पर खिसक जाता है। यदि लोकतंत्र राष्ट्रप्रेम उत्पन्न करने में असफल रह जाए और नेता को राष्ट्रहित से पहले स्वहित पर ध्यान देने वाला बना दे तो समझना चाहिए कि देश रूपी शरीर के उस अंग में कैंसर बन रहा है। इधर हम हैं कि कैंसर को जानकर भी रोगी के दीर्घजीवी होने की अपेक्षा कर रहे हैं। लोकतंत्र को देश में तभी परिपक्व और न्यायप्रिय कहा जाएगा जब इस देश की माटी से और इस की संस्कृति से प्रेम करने वाले लोगों को मताधिकार से वंचित किया जाए और यदि वे घुसपैठिया शत्रु के रूप में देश में रह रहे हैं तो उन्हें तुरंत उनके देश में धकेलने की व्यवस्था की जाए। यदि चोर उचक्के और घुसपैठिये हमारे देश के किसी प्रांत में बड़ी संख्या में घुसकर अपनी विचारधारा की जीत के लिए अपने मत का प्रयोग कर सत्ता अपने मनपसंद लोगों को देने की स्थिति में आ जाएंगे तो कल इसी रास्ते से ही वे देश का विभाजन भी करा लेंगे। ऐसे लेागों के मत से जो लोग आज मुख्यमंत्री की कुर्सी पाने के लिए सब कुछ करने को तैयार हैं उनको जब एक नये देश का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनने का अवसर अपने निकट आता दिखायी देगा तो वह उस समय उछलकर ‘जिन्ना’ बन जाएंगे। हमारे कुछ तोते तब भी यही कहेंगे कि यह तो लोकतंत्र की जीत है-यदि जनमत ही एक अलग देश चाहता है तो हम क्या कर सकते हैं? हमें जनभावनाओं का सम्मान करना चाहिए और लोकतंत्र के नाम पर इस निर्णय को मान लेना चाहिए। तब कोई यह नही कहेगा कि देश का विभाजन लोकतंत्र की हार है। क्योंकि यह समय रहते देशद्रोहियों और देशभक्तों के मध्य न तो अंतर कर पाया और ना ही देशद्रोहियों के विरूद्घ कोई कार्यवाही कर पाया।

देश में लोकतंत्र के नाम पर विखण्डन की प्रक्रिया को बलवती करने वाली शक्तियों ने लोकतंत्र के नाम पर क्षेत्रीय दलों को स्थापित करने की राष्ट्रविरोधी प्रक्रिया को अपनाया है यह भी गलत है। क्षेत्रीय दल लोगों की सोच को क्षेत्रीय बनाते हैं और उन्हें राष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाने से रेाकते हैं। ये लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करते हैं, जिनका अंतिम परिणाम राष्ट्र को दुर्बल करता है। यदि पश्चिमी बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, कम्युनिस्ट और कांग्रेस को लोगों ने पसंद किया है तो समझा जा सकता है कि उन्होंने इन पार्टियों को इसलिए पसंद किया है कि ये अवैध घुसपैठियों की समस्या का कोई समाधान नही चाहते। केरल और तमिलनाडु की जनता के निर्णय को भी हमें इसी परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए। तमिलनाडु में अम्मा ने अपने मतदाताओं को मोबाइल देने का चुनावी वादा करके लोकतंत्र को खरीद लिया है। हमारी विचारधारायें विकृत हो रही हैं और वे राष्ट्रवाद की विचारधारा को प्रदूषित कर रही हैं। उनका उपचार करने की आवश्यकता है। हम किसी को सत्ता मिलने का विरोध नही करते पर यह अवश्य बताते हैं कि देश में लोकतंत्र दिशाविहीन अवश्य है, उसे बौद्घिक मार्गदर्शन की आवश्यकता है। अभी तो हम भी पांचों प्रदेशों में बनने वाली नयी सरकारों को शुभकामनाएं देते हैं और उनसे अपेक्षा करते हैं कि उनके रहते देश में राष्ट्रवादी परिवेश बनने में सहायता मिलेगी।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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