निजी अनुभवों की सांझ-4

  • 2017-04-28 04:30:42.0
  • राकेश कुमार आर्य

भ्रष्टाचारी भी नहीं और आय भी बहुत
एक जिले के मुख्य न्यायिक मजिस्टे्रट कह रहे थे कि जिलाधिकारी महोदय एक माह में 50 लाख रूपये तो तब कमा लेते हैं जब उन्हें किसी से रिश्वत या भ्रष्टाचार के माध्यम से कोई पैसा लेने या मांगने की आवश्यकता ही न पड़े। ऐसा सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ कि भला ऐसा कैसे संभव है? उन्होंने बताया कि जिले में कई फैक्ट्रियां होती हैं, जो अपना महीना अपने आप पहुंचा देते हैं। कुछ नई औद्योगिक ईकाइयां स्थापित होती हैं, वे अपने कामों के लिए अपनी ओर से महोदय की सेवा में सारी चीजें और महीना भेजने का जुगाड़ फिर कर देती हैं।
नदियों से मिट्टी और बालू रेत को उठाने के ठेके, शराब के ठेके, 'आम्र्स लाइसेंस' आदि बनवाने, जैसे बहुत से धंधे और काम हैं जिनके 'कमीशनबाज' अपना सारा जुगाड़ फिट रखते हैं और महोदय की सेवा में सारा कुछ बड़े चुपचाप ढंग से होता रहता है। विभिन्न विभाग यथा शिक्षा-विभाग, कृषि विभाग, सार्वजनिक निर्माण-विभाग आदि भी अपनी-अपनी ओर से 'जिले के महाराज' की सेवा में मासिक भेंट (नजराना) चढ़ाना कभी नही भूलते। इस प्रकार लाखों रूपये का जुगाड़ एक जिलाधिकारी इस देश में एक माह में अतिरिक्त आय के रूप में कर लेता है।
अब देश में कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं जो बहुत ही पिछड़े हुए हैं और जिनके यहां पर विकास के नाम पर कुछ नहीं हो रहा है तो वहां के जिलाधिकारी और विकास में अग्रणी रहे क्षेत्रों या जिलों के जिलाधिकारियों की आय को आप न्यून से न्यून दस लाख भी प्रतिमाह लगायें तो सारे देश के सारे जिलाधिकारी कितना काला धन लूट रहे हैं? अनुमानित राशि निकलकर जब आंखों के सामने आएगी तो आंखें फटी की फटी रह जाएंगी।
'गलती जिलाधिकारी कर रहे हैं'-हो सकता है आपकी सोच यही निष्कर्ष निकाले। निष्कर्ष से पूर्व जरा और विचारें कि माजरा क्या है-इस लूट का? देखिये! पार्टी फंड के लिए चंदा कहकर हमारे मंत्री जी हमारे जिलाधिकारियों से पैसा वसूल रहे हैं। हर माह मंत्री जी का चढ़ावा वहां पहुंच जाता है। यह वही सामंती व्यवस्था है जिसे हमने कहने को तो बहुत पीछे छोड़ दिया है, किंतु चुपके-चुपके उसी के सहारे हमारा लोकतंत्र चल रहा है।
मंत्री जी अपने अधीनस्थ अधिकारी पर उतने ही कृपालु रहेंगे जितने अनुपात में उसका महीना उनके पास पहुंचता है। अब बताइये आप किसकी शिकायत किससे करेंगे? हर शाख पर नीचे से ऊपर तक उल्लू लटक रहे हैं। सबकी टांगें ऊपर को हैं। एक श्रंखला है नीचे से ऊपर तक जिसके माध्यम से गरीब, असहाय, निर्धन, लाचार और निरीह जनसाधारण का रक्त एक नलिका के माध्यम से लोकतंत्र के ध्वजावाहकों (नेताओं) और व्यवस्थापकों (नौकरशाहों) की नसों में जा चढ़ता है। इनके चेहरे की लाली को देखकर ही समझ लेना चाहिए कि गरीबों, असहायों, निर्धनों, लाचारों और निरीहों के रक्त की सप्लाई का चैनल ठीक काम कर रहा है। इसीलिए तो ये गाते हैं कि-
''मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती।
मेरे देश की धरती.....................................।''
जिनके परिश्रम से धरती सोना उगलती है, हीरे उगलती है और मोती उगलती है, उनके परिश्रम का फल कौन पाता है? ये है मेरा 'भारत महान।' हमारे कर्णधारों और नौकरशाहों ने आय के ऐसे-ऐसे स्रोत खोज निकाले हैं कि जिनके कारण उनकी आय में पर्याप्त वृद्घि हो गयी है और फिर भी भ्रष्टाचारी नहीं कहे जा सकते। इसे कहते हैं-
'आम के आम गुठलियों के दाम'
सब परिस्थितियों को कोसते हैं
मनुष्य परिस्थितियों का पल्लू पकडक़र दोषमुक्त होने का प्रयास किया करता है। किसी की भी त्रुटि, दोष या आचरण बुराई की ओर आप उसका ध्यान आकृष्ट करें, वह आपको कहता हुआ मिलेगा-क्या करूं परिस्थितियां ही कुछ ऐसी बन गयी थीं कि मुझे ऐसा (गलत कार्य) करना पड़ गया।
सामान्य नागरिक से पूछिये कि आप क्यों भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं? तो देश की परिस्थितियों को उत्तरदायी ठहराते हुए वह कहेगा कि क्या करूं देश की परिस्थितियां ही कुछ ऐसी हैं। ऐसा ही सरकारी लोग कहेंगे कि क्या करें 'ऊपर वालों' को खुश रखने के लिए लेना पड़ता है, ये सब परिस्थितियों का तकाजा है, इसलिए बिना लिए काम नहीं चल सकता। 'ऊपर वालों' से पूछें तो वे कहेंगे क्या करें-मंत्री जी के आदेश हैं-इतने समय में इतने लाख का प्रबंध करके देना है, अन्यथा कुछ भी होना संभव है।
मंत्री को मुख्यमंत्री के आदेश की आड़ में आखिर और मुख्यमंत्री को प्रदेश में टिकाऊ सरकार देने और पार्टी के हित में कार्य करने की आड़ में परिस्थितियों को कोसने का बहाना मिल ही जाता है। इस प्रकार सारा तंत्र ही किसी न किसी की आड़ में परिस्थितियों को कोस रहा है कि परिस्थितियां ही ऐसी हैं कि जिनके कारण उन्हें गलत कार्य करने पड़ रहे हैं। उनसे प्रश्न किया जाए कि इन परिस्थितियों का निर्माता कौन है।
(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)
पुस्तक प्राप्ति का स्थान-अमर स्वामी प्रकाशन 1058 विवेकानंद नगर गाजियाबाद मो. 9910336715

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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