पत्थरबाजो! भारत छोड़ो,' भाग-6

  • 2017-06-05 08:30:25.0
  • राकेश कुमार आर्य

'सोचने की बात यह है कि उनके कारनामे कितने घृणास्पद रहे होंगे, जबकि कंपनी के निदेशकों तक ने स्वीकार किया है कि भारत में व्यापार करके जो बड़ी से बड़ी संपत्ति पैदा की गयी उनमें उतना ही बड़ा अन्याय और जुल्म भरा हुआ है, जितना बड़ा जुल्म संसार के इतिहास में कहीं सुनने और पढऩे को नहीं मिलेगा। भारतीय माल के खरीदने का भाव अंग्रेज व्यापारी स्वयं तय करते थे और माल बेचने का भाव भी इन्हीं अंग्रेजों के हाथों में था। भारतीय लोग उनको माल बेचने और उन्हीं से खरीदने को विवश थे, चूंकि जो हिंदुस्थानी अपना माल बेचने और खरीदने से मना करता था उसे जेल की सजा मिलती थी। अंग्रेजों की यह खुली नीति थी कि भारतीयों के साथ दगाबाजी से काम लिया जाए, और उनको आपस में लड़ा-लड़ाकर लाभ उठाया जाए। यही उन्होंने किया भी, उन्हें आपस में लड़ाया गया और एक-एक की मदद करके उनसे अनुचित तथा नाजायज लाभ उठाया गया।''

अंग्रेज मुगलों से अधिक निर्दयी रहे?
इस प्रकार के विवरणों से स्पष्ट है कि अंग्रेज लोग हिंदुस्तानी लोगों के प्रति मुगलों से अधिक निर्दयी थे। मुगलों को कई इतिहासकारों ने जनसाधारण के प्रति अत्यंत दयालु और उदार होने का भ्रम उत्पन्न किया है। अब प्रश्न यह आता है कि यदि मुगल जनसाधारण के प्रति अत्यंत दयालु और उदार थे, तो अंग्रेजों को भारत में बसाने और उन्हें व्यापार की एक से एक बढक़र एवं सुविधा उपलब्ध कराने वाले भी तो मुगल ही थे। हम पूर्व में अकबर और जहांगीर के विषय में बता चुके हैं कि दोनों मुगल बादशाहों के काल में किस प्रकार अंग्रेजों को भारत में व्यापार करने की सुविधाएं मिल गयीं थी?

इनके पश्चात 1628 ई. में हिंदुस्थान का बादशाह शाहजहां बना, तो उसने अपने शासन के 12वें वर्ष में अंग्रेजों को कलकत्ता में व्यापार करने की अनुमति प्रदान कर दी। बादशाह शाहजहां ने यहां से पुर्तगालियों को उनके दुराचरण के कारण भगा दिया था, इसलिए कलकत्ता को अंग्रेजों ने अपने लिए प्राप्त कर लिया।

अंग्रेजों को अपने माल पर चुंगी देनी पड़ती थी उसे भी शाहजहां ने समाप्त कर दिया। इसका कारण यह भी बताया गया है कि बादशाह की बेटी जहांनारा इन दिनों आग में जल गयी थी। जिसका दरबार के वैद्य और चिकित्सकों ने भरपूर उपचार किया, परंतु वह स्वस्थ न हो पा रही थी, तब कंपनी ने अपने डॉक्टर गैबरील बागटन को जहांनारा के उपचार हेतु भेजा। डा. बागटन के उपचार से जहांनारा शीघ्र ही स्वस्थ हो गयी। तब बादशाह ने डा. बागटन से पूछा कि तुम्हें इस सेवा के बदले में क्या दिया जाए?

डा. बागटन बादशाह के प्रस्ताव की मानो प्रतीक्षा ही कर रहा था। उसका देशभक्त हृदय बादशाह के प्रश्न पर झूम उठा। तब उसने बादशाह से करबद्घ प्रार्थना करते हुए कहा-''जहांपनाह, कंपनी को अपने माल पर जो चुंगी देनी पड़ती है, उसे माफ कर दिया जाए।''
बादशाह ने बिना आगे-पीछे सोचे अपनी ओर से राजाज्ञा जारी करा दी कि ईस्ट इंडिया कंपनी के माल पर चुंगी समाप्त कर दी गयी है, भविष्य में इनसे कोई चुंगी ना ली जाए।

अंग्रेजों को व्यापारिक बुद्घि चातुर्य
इसे कहते हैं व्यपारिक बुद्घि चातुर्य। एक व्यक्ति ने अपना शुल्क बड़ी भारी राशि के रूप में प्राप्त कर लिया और बादशाह को पता भी न चला। इससे पूर्व शाहजहां के पिता जहांगीर को सर टॉमस रो ने 'हुक्का' देकर उससे व्यापारिक सुविधाएं प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की थी।

इसके पश्चात औरंगजेब को भी इन लोगों ने बड़े सस्ते में खरीदने का प्रयास किया। औरंगजेब को जब शिवाजी ने दक्षिण में दुखी करना आरंभ किया तो शिवाजी के विरूद्घ बादशाह का साथ देकर अंगे्रजों ने औरंगजेब की सहानुभूति प्राप्त कर ली थी। यद्यपि उस समय अंग्रेज बादशाह की किसी प्रकार की सहायता करने की स्थिति में नहीं थे, परंतु उनके पास व्यापारिक बुद्घि चातुर्य था। उसी चातुर्य से ये लोग बादशाह का मूर्ख बनाकर अपने लिए लाभ प्राप्त कर गये। इस लाभ को प्राप्त करके अंग्रेजों ने भारतीय लोगों को उत्पीडि़त करना आरंभ कर दिया।
फिलिप एण्डरसन का कहना है कि-''उनके (अंग्रेजों के) आचरणों को देखकर हिंदू और मुसलमान दोनों ही जातियां उनको गाय का मांस खाने वाले तथा कुत्तों से भी पतित मानते थे। उनकी दृष्टि में अंग्रेज लोग धोखेबाज थे।''

बादशाह औरंगजेब को जब अंग्रेजों की उत्पीडऩात्मक कार्यवाहियों का पता चला तो वह अत्यंत आक्रोश में आया, और उसने अंग्रेजों की व्यापारिक कोठियों को तुरंत बंद करने का आदेश दिया। जिससे अंग्रेजों ने भारतीय होकर बादशाह से क्षमा याचना कर ली। बादशाह ने उनकी जब्त कोठियां उन्हें लौटा दीं। फलस्वरूप अंग्रेजों को 1699 ई. में नई कोठियां बनाने का अधिकार और मिल गया। जिससे अंग्रेज लोग अकबर से चली परंपरा का लाभ लेते-लेते औरंगजेब से भी लाभ कमा गये, और अपनी स्थिति को व्यापारिक दृष्टिकोण से सुदृढ़ बनाने में सफल हो गये। (समाप्त)

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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