आवश्यकता भारत जोड़ो आंदोलन

  • 2017-08-13 17:00:21.0
  • राकेश कुमार आर्य

आवश्यकता भारत जोड़ो आंदोलन

अभी-अभी भारत ने 1942 में छेड़े गये-'अंग्रेजो! भारत छोड़ो' आंदोलन की 75वीं वर्षगांठ मनाई है। वैसे हमारा मानना है कि यदि 1857 की क्रांति के इतिहास का और उस समय घटे घटनाचक्र का सूक्ष्मता से अवलोकन किया जाए तो पता चलता है कि भारतवासियों ने 1942 से 85 वर्ष पूर्व अंग्रेजों के विरूद्घ 'भारत छोड़ो आंदोलन' का बिगुल फूंक दिया था। भारतवासियों ने 1857 में जिस आंदोलन का सूत्रपात किया वह पूर्णत: सशस्त्र क्रांति के आधार पर किया गया था-और उसका लक्ष्य वही था जो गांधी जी ने 1942 में 'करो या मरो' का नारा देकर भारतवासियों के सामने प्रस्तुत किया था। यद्यपि 1857 में भारतवासियों ने जिस 'करो या मरो' का लक्ष्य लेकर सशस्त्र क्रांति का शुभारंभ किया था, वह अंग्रेजों के लिए कहीं अधिक खतरनाक सिद्घ हुआ। यह एक निश्चयात्मक मत है कि भारतवासियों द्वारा 1857 में लिये गये 'अंग्रेजो! भारत छोड़ो' के संकल्प के कारण ही अंग्रेजों को 1947 में भारत छोडऩा पड़ा। इस प्रकार 1947 में जब अंग्रेज यहां से गया तो उस दिन 1857 में भारतवासियों के उस राष्ट्रीय संकल्प की जीत हुई-जिसे उन्होंने 'अंग्रेजो! भारत छोड़ो' के रूप में लिया था। भारतवासियों का संकल्प था कि स्वाधीनता प्राप्ति तक अंग्रेजों को मारते भी रहेंगे और स्वयं मरते रहेंगे, उनके 'करो या मरो' का यही अर्थ था। 1942 में जब गांधीजी ने 'करो या मरो' का उद्घोष किया तो उस उद्घोष के अर्थ कुछ भिन्न थे। गांधीजी ने स्वयं अपने इस उद्घोष का अर्थ स्पष्ट करते हुए कहा था कि वह अंग्रेजों को मारने और स्वयं मरने की बात नहीं कर रहे थे।
आज जब देश स्वतंत्र है और अपनी स्वतंत्रता की 70वीं वर्षगांठ मना रहा है तो इस अवसर पर हमारे लिए एक नयी चुनौती खड़ी है, यह चुनौती भारत जोडऩे की चुनौती है। संप्रदायवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद, प्रांतवाद और न जाने कौन-कौन से वाद देश में विषैले नाग की भांति फन फैलाये खड़े हैं। इन सारे वादों की जड़ में हमारे राजनीतिक पूर्वाग्रह और मजहबी मान्यताएं सबसे अधिक घातक रूप में उपस्थित हैं। राजनीति इन वादों के मकडज़ाल में असहाय बनी खड़ी है। कुछ लोगों का मत है कि इन सारी समस्याओं की जड़ केवल राजनीति है, तो कुछ का कहना है कि केवल मजहबी मान्यताएं हमें विकृति के इस गर्त में धकेल चुकी हैं। हमारा मानना है ये दोनों ही इसके लिए उत्तरदायी हैं। राजनीति को मजहबी मान्यताओं के सामने आत्मसमर्पण नहीं करना चाहिए था और मजहबी मान्यताओं को राजनीति की उंगली पकडक़र उसे विनष्ट करने का घातक प्रयास नहीं करना चाहिए था।
आज देश के बुद्घिजीवियों, समाजसेवियों, लेखकों, पत्रकारों और रचनात्मक कार्यों में लगे सभी नागरिकों का यह पावन कत्र्तव्य है कि जिस देश की आजादी को लाने के लिए यह देश 1857 में 'अंग्रेजो! भारत छोड़ो' आंदोलन का संकल्प लेकर उसे 1947 में पूर्ण कर सकता है-तो इस देश की जिजीविषा पर हमें आज भी विश्वास करना चाहिए, और यह मानना चाहिए कि इसकी अंतश्चेतना में आज भी एकता और भाईचारे का दरिया बहता है, जिसकी निर्मल-विमल धारा को बाहर लाकर प्रवाहित करने की आवश्यकता है। हमारे राजनीतिक पूर्वाग्रह और मजहबी मान्यताएं हमारे राष्ट्र निर्माण के राष्ट्रीय संकल्प को पूर्ण करने में कहीं आड़े नहीं आने चाहिएं। हमें यह मानना चाहिए कि राजनीतिक पूर्वाग्रह और मजहबी मान्यताएं भारत में प्राचीनकाल से रही हैं। जिन्हें झेलकर भी भारत ने अपनी राष्ट्रीय एकता को बनाये रखा है। भारत में अनेकों संप्रदाय प्राचीनकाल से रहे हैं, पर उन्होंने इस देश की एकता के लिए काम करते हुए अपना विकास किया, और राजनीति में उनके विकास को कभी विनाश में परिवर्तित करने का कार्य नहीं किया। भारत की इसी भावना को भारत का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और भारत की वास्तविक पंथनिरपेक्षता कहा जा सकता है। भारत की एकता और महानता का सूत्र इसी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और वास्तविक धर्मनिरपेक्षता की भावना में अंतर्निहित है। हमें इस भाव और भावना को आज के संदर्भ और परिप्रेक्ष्य में समझने और लागू करने की आवश्यकता है। भारत की आजादी का संघर्ष इसी भावना से प्रेरित होकर लड़ा गया था।
अलग-अलग मत, पंथ, संप्रदाय आदि के रहते हुए भी भारत के राजनीतिज्ञों ने अलग देश की मांग नहीं की। भारत की संस्कृति ने एकात्म मानववाद का राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक सूत्र अंगीकार किया और बहुत से अंतर्विरोधों और विसंगतियों को झेलते हुए भी उसने एक देश, एक भाषा और एक वेश को अपनाया। भारत के एकात्म मानववाद ने विश्व को एक नाया राजनैतिक दर्शन दिया और उसे यह बताया कि भारत के सारे अंतर्विरोध और सारे गतिरोध किसी 'एक' में जाकर समाविष्ट हो जाते हैं और न केवल समाविष्ट हो जाते हैं अपितु वहां जाकर अपना अस्तित्व ही समाप्त कर लेते हैं। भारत की महानता का राज ही इसमें है कियहां अनेकता एकता में समाविष्ट होकर अपना अस्तित्व मिटाती रही है। स्वतंत्रता के उपरांत हमारे देशवासियों ने अपनी अनेकता को अपनी पहचान बनाकर एकता विद्रूपित करने का राष्ट्रघाती कार्य किया। राजनीति ने लोगों के इस कार्य को अपनी सहमति दी, परिणामस्वरूप अनेकताओं के भूत आज एकता को भयभीत कर रहे हैं और लोगों की विभिन्न पहचानेें एकता में समाविष्ट न होकर उसका अस्तित्व मिटाने पर लगी हैं। देश की स्वतंत्रता की 70वीं वर्षगांठ के अवसर पर आज हमें यही संकल्प लेना होगा कि हम अपनी अनेकताओं को अपनी एकता में समाविष्ट करते-करते उन्हें अस्तित्वविहीन करने का वंदनीय कार्य करेंगे। भारत के लोग जितनी शीघ्रता से इस रहस्य को समझ लेंगे और इसे अपना राष्ट्रीय संकल्प बनाकर इसके अनुरूप भारत निर्माण के लिए उठ खड़े होंगे उतनी ही शीघ्रता से भारत विश्वगुरू बनने की दिशा में आगे बढ़ चलेगा।

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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