ना 'जयचंद' बचे और ना 'गौरी'

  • 2017-07-08 05:30:56.0
  • राकेश कुमार आर्य

ना जयचंद बचे और ना गौरी

बात 10 मई 1907 की है। देश उस दिन अपने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम अर्थात 1857 की क्रांति की 50वीं वर्षगांठ मना रहा था। सारा देश उस दिन ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने का संकल्प ले रहा था। दिल्ली भी उस संकल्प से अछूती रहने वाली नहीं थी। उस समय दिल्ली देश की राजधानी नहीं थी, इसलिए उसे अपने पुराने वैभव को लौटा लाने की टीस सर्वाधिक व्याकुल कर रही थी। दिल्ली में जो कार्यक्रम हुआ था-उसको संबोधित करने वाले प्रमुख वक्ता थे दिल्ली के लोकप्रिय नेता सैय्यद हैदर रजा। वह मंच पर आये और 'वंदेमातरम्' के जयघोष के साथ बोलने लगे-
''प्यारे हम वतनो! आज हम उस तारीखी मौके की सालगिरह मना रहे हैं जब इसी दिल्ली में आजादी का एक सूरज उगा था।....पिछले पचास बरसों से जालिम अंगरेजी हुकूमत की काली घटाओं ने उसे ढंकने की भरपूर कोशिश की है, लेकिन बेइंसाफी और धोखापरस्ती के बादलों से हिंदुस्तान की रूह की रोशनी को अब बहुत दिनों तक ढंककर रखा नहीं जा सकता। हिन्दुस्तान जाग उठा है। उसकी खुद्दारी (आत्म स्वाभिमान) का सूरज मगरिब से उठने वाली जुल्मो सितम की घटाओं की छाती चीरकर फिर से चमकेगा,.....पहले से भी अधिक तेज रोशनी के साथ। आपको यह जानकर खुशी होगी कि आज ही लंदन में हमारे नौजवान साथी विनायक दामोदर सावरकर 'इंडिया हाउस' में उस जंग-ए-आजादी की गोल्डन जुगली मना रहे हैं, और यहां हम उसकी सालगिरह मनाकर उस रोशनी का खैर मकदम (अभिनंदन) कर रहे हैं।... याद है आपको ....पचास साल पहले इसी दिल्ली की जमीन पर हिंदुस्तान के हजारों लाखों वतन परस्तों ने इस जंग की शुरूआत अपने खून से बिस्मिल्लाह (श्रीगणेश) लिखकर की थी...मालूम है आपको लालकिले के सामने दिल्ली के चांदनी चौक में आजादी के कितने दीवानों को फांसी पर लटकाया गया था....? बदकिस्मती से हमारे ही मुल्क के कुछ अंग्रेजपरस्त गद्दारों ने जंग-ए-आजादी के सिपाहियों के खिलाफ गैरमुल्की फिरंगी हुकूमत का साथ देकर आजादी के इस सुनहरी मौके को कई साल पीछे धकेल दिया।''
उस दिन इस देश का संस्कार हैदर रजा की वाणी से ओज के रूप में बरस रहा था, जो हर देशभक्त के गले उतरता जा रहा था..सबको लग रहा था कि मजहबपरस्ती कभी भी देशभक्ति के आड़े नहीं आ सकती। देशभक्ति के सामने मजहबपरस्ती बहुत छोटी चीज है। देशभक्ति का ज्वर यदि एक बार चढ़ जाता है तो 'हैदर' और 'सावरकर' एक हो जाते हैं और शत्रु को एक विदेश में उसी की धरती पर खड़ा होकर ललकारता है तो दूसरा अपने देश की धरती से खड़ा होकर ललकारता है-पर इस ललकार से दोनों स्पष्ट कर देते हैं कि उनके लिए राष्ट्र सर्वप्रथम है।....और यही इस देश का मौलिक संस्कार है।
चीन और पाकिस्तान आज देश को घेर रहे हैं, युद्घ की चर्चाएं चारों ओर हैं। देश केप्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विदेशों के दौरे कर करके अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने का प्रशंसनीय कार्य कर रहे हैं। ऐसे में देश के भीतर जहां 'आजम खां' जैसे लोग देश विरोधी बयान दे रहे हैं वहीं बड़ी संख्या में बहुत से 'हैदर रजा' भी निकलकर सामने आ रहे हैं-जिनका मानना है कि'मजहब परिवर्तन से पूर्वज नहीं बदले जा सकते।' इसलिए वे लोग स्वयं को 'महाराणा' की संतान मानते हैं, उनका मानस पुत्र अपने आपको मानते हैं और बाबर को वह विदेशी आक्रांता मानते हैं। उन्हें बाबर या अकबर की आलोचना करने या उनके अमानवीय कार्यों की निंदा करने में कोई संकोच नहीं होता। वे चाहते हैं कि इस देश के समाज का निर्माण वैदिक संस्कृति के समरसतावादी दृष्टिकोण को अपनाकर किया जाए। ऐसे लोग आज भी सावरकर की आवाज में आवाज मिलाकर बोलते हैं और हिन्दुस्तान की उन्नति को अपनी उन्नति मानते हैं। बदले में हिन्दुस्तान भी उनके मजहब का सम्मान करके यह बताता है कि वास्तविक पंथनिरपेक्षता किसे कहते हैं? ऐसे लोगों की देशभक्ति के ऐसे जज्बे का हम भी 'खैर मकदम' करते हैं।
चीन और पाकिस्तान भूल में हैं कि यदि हम भारत पर हमला करेंगे तो भारत के भीतर का मुसलमान भारत को ही बर्बाद कराने में उनका सहयोग करेगा। उन्हें नहीं पता कि यदि पाकिस्तान के 'इस्लामिक बम' का प्रयोग भारत के विरूद्घ किया गया तो वह जितना हिंदुओं को मारेगा उतना ही मुसलमानों को भी मारेगा। भारत का मुस्लिम समाज भी यह जानता है, इसलिए ऐसी किसी भी पाशविक कार्यवाही का भारत के हिन्दू-मुस्लिम, सिख और ईसाई सभी लोग अपनी पूरी एकता व शक्ति के साथ विरोध करेंगे-जिससे मानवता का विनाश हो या इस देश की एकता और अखण्डता को खतरा उत्पन्न हो। मुट्ठी भर लोगों के देश विरोधी आचरण को किसी वर्ग या समुदाय की सामूहिक स्वीकृति नहीं कहा जा सकता। आजम खां जैसे लोगों को अपना प्रवक्ता बनने से रोकने वाले हजारों लाखों सुर मुस्लिम जगत में है-उनका भी अभिनंदन होना चाहिए।
देश के सामने जैसी परिस्थितियां हैं-उनके दृष्टिगत हमें अपनी एकता का प्रदर्शन करना ही होगा। सोशल मीडिया पर कुछ अगंभीर लोग सामाजिक परिवेश को बिगाडऩे के कार्यों में लगे रहते हैं-उन्हें भी अपनी भाषाई गंभीरता और शालीनता का परिचय देना होगा, तथ्यों को शालीनता के साथ भी परेासा जा सकता है यह आवश्यक नहीं है कि उन्हें परोसने में आप भााषा की मर्यादा को ही खो दें। ऐसे अगंभीर लोग ध्यान दें कि तुम्हें घेरने के लिए व्यूह रचना की जा रही है और तुम परस्पर ही व्यंग्य बाण चलाने में लगे हो। व्यूह रचना को तोडऩे की दिशा में सोचें। तुम्हारे सारे क्रांतिकारी भावों और विचारों के तेल को क्रांति की बाती के माध्यम से जलाकर उनका ऐसा सुरमा बनाने का समय आ गया है जो जिसकी भी आंख में पड़े तो उसे दूर का दिखाने लगे। समुद्र मंथन करो, दूर का देखो, तुम्हारे हाथों में पेट्रोल नहीं पानी होना चाहिए। शत्रु तुम्हें तोडऩा चाहता है और उसका लाभ उठाना चाहता है। इसलिए हर देशवासी शत्रु के लिए पेट्रोल की बोतल और स्वदेशी मित्रों के लिए पानी की बाल्टी लेकर खड़ा हो जाए। इस युद्घ में शत्रु का सफाया करना लक्ष्य बनाओ-ना 'जयचंद' बचे ओर ना ही 'गौरी'। साधना पूर्ण होनी चाहिए।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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