वैदिक ग्रन्थों में आदिपूज्य विघ्नविनाशक गणपति गणेश

  • 2016-09-03 12:30:16.0
  • अशोक “प्रवृद्ध”

वैदिक ग्रन्थों में आदिपूज्य विघ्नविनाशक गणपति  गणेश

प्राचीन सनातन परम्परा में भारत में सर्वत्र पञ्चदेवों में एक शिव पार्वती के आत्मज देवताओं में सर्वप्रथम पूज्य भगवान गणेश की पूजा. उपासना साधना दृ आराधना बड़ी श्रद्धा एवं भक्ति. भाव से की जाती है ऐसी मान्यता है कि किसी भी धार्मिक अथवा मांगलिक कार्य का प्रारम्भ किसी भी देवताके पूजन एवं उत्सव दृ महोत्सवों का आरम्भ अथवा किसी प्रकार का शुभ कार्य महागणपति का स्मरण एवं उनके पूजन

.अर्चना से करना चाहिए इससे समस्त कार्य निर्विघ्नता पूर्वक सफल होते हैं। हालाँकि भगवान गणेश के स्वतंत्र मंदिर देश में बहुतायत की संख्या में नहीं हैं फिर भी प्राय: समस्त आस्तिक हिन्दू परिवारों में दूकान मेंए व्यवसाय केन्द्र में तथा शिव . शक्ति मंदिरों में श्रीगणेश जी के मंगल. विग्रह प्रतिमा चित्रपट अथवा अन्यान्य कोई प्रतीक चिह्न अवश्य ही विद्यमान रहता है भक्तों की
भावनानुसार गणपति की उपासना अनेक रूपों में होती है मान्यतानुसार मंगलमूर्ति भगवान् श्रीगणेश के नाम.स्मरण ध्यान. जपए आराधना एवं प्रार्थना से मेघा शक्ति का परिष्कार होता है समस्त कामनाओं की पूर्ति होती है और समस्त विघ्नों एवं दुखों का आत्यक्तिक विनाश होकर परम कल्याण भी होता है इनकी प्रसन्नता से निरन्तर आनन्द. मंगल की वृद्धि होती है

गण संख्याने इस धातु से गण शब्द सिद्ध होता है । इसके आगे ईश् व पति शब्द रखने से गणेश और गणपति शब्द सिद्ध होते हैं ।स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम समुल्लास में कहा गया है . ये प्रकृत्यादत्यो जड़ा जीवाश्च गण्यन्ते संख्यान्ते तेषामीश: स्वामीपति पालको वा अर्थात जो प्रकृत्यादि जड़ और सब जीव प्रख्यात पदार्थों का स्वामी व पालन करनेहारा है इससे उस ईश्वर का नाम गणेश व गणपति है ।

गणपते: सकलजगत्स्वामिनोैयं सेवकोगाणपत:।

यह गणपति का नाम है ।

वेदों में अनेक स्थलों पर 33 देवताओं का उल्लेख हैए किन्तु किसी भी वैदिक सूची में गणेशके किसी नाम का उल्लेख नहीं मिलता। फिर भी ऋग्वेद द्वितीय मंडलके तेईसवेंसूत्र के पहले मन्त्र एवं तैतिरीय संहिता 2ध्3ध्14ध्3 के आधार पर कतिपय विद्वान् गणेश का उल्लेख गणेश के रूप में पाते हैं गणानांत्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपश्रवस्तमम् ।

ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत अग्ने शृण्वन्नू तिभि: सीद सादनम् ।।

हे ब्रह्मणस्पते !तुम देवताओं में दिव्य और कवियों में श्रेष्ठ हो। तुम्हारा अन्न सबमें उत्तम है । तुम प्रशंसा किये हुए में सर्वश्रेष्ठ एवं स्तोत्रों के स्वामी हो । तुम हमारी स्तुति से आश्रय देने के लिए यज्ञ स्थान में विराजो । हम तुम्हारा आह्वान करते हैं।

ब्रह्मणस्पति का अर्थ है. ब्रह्मों का पति । सायन के अनुसार ब्रह्म का अर्थ मन्त्र हैए अत: ब्रह्मणस्पति का अर्थ मन्त्रों का स्वामी हुआ। यह उपाधि बृहस्पति को दी जाती है। ब्रह्मणस्पति को गणों का गणपति कहा है। भाष्य में सायन ने इसका अर्थ किया है. देवादिगणनां संबन्धिन्नं गणपति:।

अर्थात. देवादि गणों से सम्बन्ध रखने वाला गणपति ए देवों के गणों के स्वामी ! बृहस्पति ब्रह्मों अर्थात मन्त्रोंके ज्येष्ठ राज से जो देवगणों के गणपति और कवियों ;ऋषियोंए ब्रह्मज्ञानियों द्ध के कवि ;ज्ञातृतम द्ध हैं ए यह प्रार्थना करता है कि हमारी स्तुतियों को सुनकर इस यज्ञ स्थल में विराजिए ।

शुक्ल यजुर्वेद के सोलहवें अध्याय के पच्चीसवें मन्त्र में भी गणपति शब्द आया है।

नमो गणेभ्यो गणपतिभ्यश्च वो नमो नमो व्रातपतिभ्यश्च वो नमो नमो गृत्सेभ्यो गृत्सविभ्यश्च वो नमो नमो विरूपेभ्यो विश्वरूपेभ्यश्च वो नम: ।

देवताओं के अनुचर गणों को नमस्कार ए गणों के अधिपति को नमस्कार ए विशिष्ट जाति समूह को नमस्कार ए समूहों के अधिपति को नमस्कार ए बुद्धिमानों और विषयियों को नमस्कार ए बुद्धिमानों के पालक को नमस्कार ए विविध रूप वालों को नमस्कार और विश्वरूप वाले रूद्र को नमस्कार ।

महीधर अपने भाष्य में लिखते हैं .

देवानुचरा भूत्विशेष गणा: गणानां पालक: गणपत्य: ।

देवों के अनुचर भूत विशेष गण होते हैं ए उनके पलक गणपति कहलाते हैं। यहाँ गणपति शब्द बहुवचन में आया है । देवों के अनुचर के कई नायक हैं । वह उन सब को प्रणाम कर रहा है ।यहाँ रूद्र के गणों को प्रणाम अर्थात नमस्कार कर रहा है । गणपति का तीसरा उल्लेख शुक्ल यजुर्वेद के तेइसवें अध्याय के उन्नीसवें मन्त्र में इस प्रकार है.

गणानांत्वा गणपतिं हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपतिं हवांमहे ।

निधीनां त्वा निधिपतिं हवामहे व सो मम । आजहमानिगर्भधमानिगर्भधमात्वमजासि गर्भधम् ।

शुक्ल यजुर्वेद 23/19

हे गणपते ! तुम सब गणों के स्वामी हो । हम तुम्हें आहूत करते हैं। हे प्रियों के मध्य निवास करने वाले प्रियों के स्वामी ए हम तुम्हें आहूत करते हैं । हे निधियों के मध्य निवास करने वाले निधिपते ! हम तुम्हें आहूत करते हैं । तुम हमें श्रेष्ठ निवास देने वाले हो और रक्षक हो। तुम गर्भ धारक जल को सब प्रकार से आकर्षित करते हो । तुम गर्भ धारण करने वाले को अभिमुख करते हो। तुम समस्त प्रकार के रचयिता होते हुए सब प्रकार से अभिमुक्त होते हो ।

यह मन्त्र अश्वमेघ के प्रसंग में आया है । यजमान की पत्नी राजमहिषी मरे हुए घोड़े की परिक्रमा कर लेट जाती है तथा इस मन्त्र को पढ़ती हुई अश्व को संबोधित करती है । इसीलिए महीधर के शब्दों में अश्वदेवत्यम् है दृ इसका देवता अश्व है ।

वेदों के अर्वाचीन सनातन धर्मावलम्बी अनुवादक पं0 रामस्वरूप शर्मा तथा आचार्य श्रीराम शर्मा एवं स्वामी दयानन्द सरस्वती के अनुवाद से भी इस मन्त्र में गणेश की झलक नहीं मिलती।यद्यपि वैदिक देवताओं में स्पष्टत: गणेश की कहीं गणना नहीं है ए तथापि इस मन्त्र का गणेश पूजा में पाठ होता है ।

प्राचीनतम दस उपनिषदों में सर्वोपरि श्वेताश्वेतर उपनिषद ए जिसमें किरूद्र सम्बन्धी श्लोक भरे पड़े हैं ए में गणेश का नाम कहीं नहीं है । गणपत्युपनिषद के पन्द्रहवें श्लोक में गणपति ए गणेश ए एकदन्त ए वक्रतुंड ए दन्तिए लम्बोदर और शिवपुत्र के नाम से स्तुति है। इस उपनिषद् के 1/6 में गणेश को ब्रह्म का स्वरूप कहा गया है-

नमो व्रातपतये नमो गणपतये नम: प्रथमपतये नमस्तेऽस्तु ।

लम्बोदरायैकदन्ताय विघ्नविनाशिने शिवपुत्राय वरदमूर्तये नमो नम: ।।

एतेरेय ब्राह्मण 1/21 में गणपति को ब्रहस्पति या बृहस्पतिवाचक कहा गया है।

तैतिरीय आरण्यक में यह मन्त्र आया है.

तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नोदन्ति प्रचोदयात ।

इस ग्रन्थ में इस मन्त्र के पाठ करने का महात्म्य अंकित है। इसमें कहा गया है कि इसका पाठ करने वाला पुरुष ब्रह्मत्व प्राप्ति का अधिकारी होता है । उसके लिए किसी प्रकार का कोई विघ्न बाधा उत्पन्न नहीं करता । वह सभी स्थानों पर सुखी होता है। पाँचों प्रकार के पापों से वह मुक्त होता है और प्रात: काल पाठ करने वाले के रात्रि में किये हुए पाप कट जाते हैं । प्रात: सायं दोनों काल में पाठ करने से पापरहित ही नहीं होता ए बल्कि इसका पाठक धर्म ए अर्थ ए काम और मोक्ष को प्राप्त करता है ।

इस मन्त्र में यह प्रार्थना की गई है कि दन्ति दंती हमको प्रेरित करे। दन्ति क अर्थ हुआ दाँतवाला । गणेश जी के एक दंश ए एक रदन जैसे नामों की ओर ध्यान जाता है। इस मन्त्र में वक्रतुंड इसी ओर संकेत करता है । श्रुति में तैंतीस देवों में इन्द्र और बृहस्पति के सिवा अष्ट आठ वसु ए द्वादश बारह आदित्य और एकादश ग्यारह रूद्र हैं।किन्तु किसी भी वैदिक देवसूची में गणेश का किसी भी नाम का अंतर्भाव नहीं मिलता। संभव है रूद्र का आत्मसात अनार्य देवताओं में हो जाने के फलस्वरूप उनके पुत्र के रूप में गणेश की मान्यता हो चली हो उसके पश्चात् आरण्यकों की रचना हुई।

गृहसूत्रों में भी धर्मसूत्रों की तरह ही रूद्र की पत्नियों एवं पुत्रों का उल्लेख स्पष्टतया आया है। गृहसूत्रों में ही पहले पहल रूद्रादि दाताओं की मूर्तियों के प्रतिष्ठापन और पूजन का स्पष्ट उल्लेख मिलता है । बोधायन गृहसूत्र 3/3/10 में विनायक का उल्लेख और पूजा विधि आई है। विद्वानों का विचार है कि विनायक सामान्य रूप से उत्पाती जीव माने जाते थे और मनुष्यों के सामान्य व्यापार में उनके कारण बाधाएँ न पड़े ए इस उद्देश्य से उनको संतुष्ट करने का प्रयत्न किया जाता था। फलस्वरूप जो विधियाँ बतलाई गई हैं ए उनमें जादू. टोने का पुट अधिक है और उनके स्वरुप स्पष्ट ही अथर्ववेदीय हैं। जिनसे स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है कि विनायक जनसाधारण के प्रचलित बिश्वासों के क्षेत्र के जीव थे। ये विधियाँ तम निवारक सूर्य के स्तवन के साथ समाप्त होती थीं। इससे यह भी अनुमान कर सकते हैं कि विनायक को अन्धकार और नदी का जीव माना जाता था। गृहसूत्रों में ही विनायक विघ्नकारी से विघ्नपति हो गये और विघ्नों के नाश के लिए तथा फिर सामान्य रूप से सफलता के लिए इनकी प्रार्थना करने की परिपाटी चल पड़ी। बोधायन गृहसूत्र 3/3/10 में इनकी प्रार्थना अंकित है.

विघ्नविघ्नेश्वरागच्छ विघ्नित्येव नमस्कृत ।

अविघ्नय भवान् सम्यक सदास्माकंभव प्रभो ।।

कृते यदि मया प्राप्तं श्रद्धया वा गणेश्वर ।

उतिष्ठ सगण: साधो याहि भद्रं प्रसीदतम् ।।

बोधायन गृहसूत्र के इस मन्त्र में विनायक उतरकालीन गणेश का आदिरूप है। बोधायन गृहसूत्र 3ध्3ध्9 में गणेश के साथ एक स्त्री देवता का सहचरी भी बतलाया गया है ए जिसका नाम ज्येष्ठा कहा गया है । तथा यह भी रोचक तथ्य है कि विनायक के समान ही ज्येष्ठा को भी हस्तिमुखा कहा गया है। वेदों के आधुनिक विद्वानों का विचार है कि उतरवैदिक कालीन साहित्य में विनायक का इस प्रकार सहसा उल्लेख एवं अपर काल में शिव के साथ उसका घनिष्ठ सम्बन्ध हो जाना भारतीय धार्मिक इतिहास में एक आश्चर्यजनक घटना है । बोधायन गृहसूत्र 3/9 में जहाँ विनायक का उल्लेख अंकित है वहाँ विनायक को साधारणतया रूद्र के लिए प्रयुक्त होने वाली उपाधियाँ ए भूपति ए भूतपति ए भूतानापति एवं भुवनपति की उपाधियाँ दी गई हैं एवं गणेश को भी प्राय: शिव के अनेकानेक गुणों से विभूषित किया गया है । विद्वानों के अनुसार आरम्भ में मूषक रूद्र का वाहन था ए किन्तु उतरवैदिक काल में मूषक अनिवार्य रूप से गणेश का वाहन माना जाने लगा और शिव का नहीं। पुराणों ने भी इसकी पुष्टि की है । अत: यह संभव हो सकता है कि प्रारंभ में ये दोनों देवता एक ही थे ।प्रारम्भ में विनायक रूद्र के ही रूप का नाम था ए परन्तु जैसे. जैसे विनायक रूप का विकास होता गया ए उस प्रारम्भिक तादात्म्य की स्मृति मिटती चली गई और अंत में दोनों स्वतंत्र देवता बन गये और साथ ही गणेश को रूद्र का पुत्र माना जाने लगा। और पिता. पुत्र का सम्बन्ध उपयुक्त माना जाता ही है क्योंकि रूद्र के रूप में ही गणेश का जन्म माना जाता है ।महाभारत में अंकित है कि गणेश और स्कन्द मानव शक्तियों के अधिपति माने जाने लगे थे । बोधायन धर्मसूत्र में ही रूद्र की सहचरी स्त्री देवता के अतिरिक्त दो नए देवताओं. विनायक एवं स्कन्द का विवरण अंकित है। पौराणिक काल में ये दोनों देवगण शिव के पुत्र रूप में प्रसिद्ध हुए । विनायक आगे चलकर विनायक के नाम से विख्यात हुए। बोधायन धर्मसूत्र में इन दोनों देवताओं को विधिवत मान्यता प्रदान की गई और इनके लिए तर्पण का विधान भी किया गया है।

बाद में विनायक वक्रतुण्ड ए एकदन्त ए लम्बोदर और विघ्नविनाशक आदि नामों से प्रसिद्ध हुए। आज वर्तमान में गणेश का देवताओं में अग्रगण्य स्थान है। पञ्चदेवों दृ विष्णु ए शिव ए दुर्गा ए सूर्य और गणेश में सिर्फ इनकी गणना ही नहीं है बल्कि ये आदिपूज्य हो गए । स्मरणीय है कि तैतिरीय आरण्यक 10/1 में किसी देवता का वक्रतुण्ड और दन्ति कहते हुए वर्णन आया है । यह मन्त्र गायत्री मन्त्र के तर्ज पर बना है।

गृहसूत्रों से ज्ञात होता है कि आरम्भ में इस देवता को विघ्नों और बाधाओं का देवता माना गया है। सूत्रकाल में विनायक विघ्नकर्ता थे ए अच्छे कामों में भी बाधा डालते थे अतएव प्रत्येक शुभ कार्य के प्रारम्भ में उनको मनाया जाता था। कुछ भेंट करके उनका विसर्जन कर दिया जाता था और तब मूल कृत्यों का आरम्भ किया जाता था। कालान्तर में विनायक विघ्नराज की जगह मंगलकर्ता ए विघ्नपति हो गये ए तथा भावी विपति को टालने के लिए प्रसन्न किये जाने के स्थान पर उनसे सिद्धि माँगी जाने लगी । आज तो हालत यह है कि विघ्नों के नाश के लिए फिर सामान्य रूप से सफलता के लिए विनायक पूजा मंगल कार्य का अनिवार्य अंग हो गई है। यात्रा के आरम्भ पुस्तक पत्र बही. खाता या किसी भी प्रकार का लिखा .पढी का कार्य आरम्भ करने के पूर्व श्रीगणेश का स्तवन या श्री गणेशाय नम: लिखने की परिपाटी पुरानी हो चली है । गृह द्वार पर भी गणेश की मूर्ति की स्थापना की जाती है। इसके पीछे यही विश्वास है कि समस्त विघ्नों का नाश करने की शक्ति गणेश में विद्यमान है । भारतीय जीवन का आदर्श ए भारतीय सभ्यता. संस्कृति तथा भारतीय विद्या . वैभव के उत्कर्ष का वास्तविक ज्ञान प्रदान करने वाले पुराणादि ग्रन्थों में भगवान श्रीगणेश का विषद वर्णन अंकित है।पद्म पुराण ए लिंग पुराण ए ब्रह्म वैवर्त पुराण ए स्कन्द पुराण ए शिव पुराण ए वराह पुराणादि ग्रन्थों में भगवान गणेश के स्वरुप ए जन्म ए गणेश तत्व ए महिमा ए उनके अवतार एवं माधुरी लीला ए व्रत दृपूजा ए उपासना आराधना ए गणेश मन्त्र महात्म्य आदि का विस्तृत विवरण अंकित है। पुराणों में शिव. पार्वती के आत्मज भगवान श्रीगणेश को सर्वात्मा ए अनादि ए अनन्त ए अखण्ड ए ज्ञान सम्पन्न ए पूर्णतम परमात्मा एवं उनके पञ्च देवात्म्क स्वरुप का विशद उल्लेख करते हुए उन्हें परब्रह्म ए परमेश्वर ए भगवान श्रीगणेश कहा गया है। पुराणों में गणपति के जन्म का आश्चर्य जनक रूपकों में अतिरंजित वर्णन करते हुए सर्वोच्च पद प्रदान कर ईश्वर मान आदिपूज्य घोषित किया गया है।

अशोक “प्रवृद्ध” ( 99 )

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