ऋषि दयानंद एवं आर्य समाज के स्वर्णिम इतिहास की दिव्य धरोहर

  • 2016-07-07 13:30:57.0
  • उगता भारत ब्यूरो

ऋषि दयानंद


1. प्रथम स्वर्णिम अध्याय-त्रैतवाद:
अद्वैतवाद, द्वैतवाद एवं विशिष्ट अद्वैतवाद के समानांतर त्रैतवाद की घोषणा (आविष्कार) करके ऋषि दयानंद ने आर्य समाज के प्रथम स्वर्णिम अध्याय का शुभारंभ किया। ईश्वर, जीव एवं प्रकृति इन तीनों को सृष्टि की सनातन सत्ता मानने का विशद विवरण महर्षि द्वारा सत्यार्थ प्रकाश में किया गया। 1874 ई. में महर्षि द्वारा की गयी इस घोषणा को विज्ञान के अनुसंधान क्षेत्र में पहली बार 1911 ई. में आइंस्टीन की इस खोज से गौरव प्राप्त हुआ। (पदार्थ को ऊर्जा में परिवर्तित किया जा सकता है तथा ऊर्जा को पदार्थ में) तदनुसार महर्षि कहते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर सनातन हैं तो उनके द्वारा सृजित जीवन एवं प्रकृति दोनों भी सनातन हैं। विज्ञान द्वारा 2013 में की गयी खोज के अनुसार जीवन के पुनर्जन्म को मान्यता दी गयी और कहा गया है कि आत्मा अमर है, वह एक शरीर को छोडक़र दूसरे शरीर को धारण कर लेती है। 2016 फरवरी की खोज के अनुसार गुरूवाकर्षण तरंगों की सनातन धारा के आधार पर प्रकृति को भी विज्ञान में सनातन सत्ता स्वीकार किया गया है। 1874 में महर्षि दयानंद के त्रैतवाद को शास्त्रज्ञों द्वारा चुनौती दी गयी थी परंतु विज्ञान के नवीनतम आविष्कारों द्वारा त्रैतवाद का स्वर्णिम अध्याय विश्वभर में सर्वमान्य सिद्घ किया जा चुका है।

2. दूसरा स्वर्णिम अध्याय-वेदस्वत: प्रमाण हैं :-
महर्षि दयानंद ने लिखा है कि पृथ्वी गोल है एवं अपनी धुरी पर घूमती है। बाइबिल व कुरान की मान्यताएं भिन्न हैं। परंतु विश्वव्यापी विज्ञान पृथ्वी एवं सूर्य के संदर्भ में वैदिक मान्यताओं को स्वीकार कर चुका है। वेद के अनुसार पृथ्वी की आयु 4 अरब 32 करोड़ वर्ष है जिसे आधुनिक विज्ञान की खोज द्वारा 2005 में मान्य किया गया। 1983 ई. में बिग बंग थ्योरी पर नोबल पुरस्कार मिलने से पहले पृथ्वी की आयु दो अरब वर्ष पढ़ाई जाती थी। महर्षि द्वारा वेदों को स्वत: प्रमाण माना गया था। वर्तमान नवीनतम वैज्ञानिक अनुसंधान भी वैदिक तथ्यों को स्वीकार कर इन्हें स्वत: प्रमाणित सिद्घ कर चुके हैं।

3. तीसरा स्वर्णिम अध्याय - पूर्ण स्वराज्य अभियान :-

महर्षि द्वारा 1874 ई. में पूर्ण स्वराज्य की कल्पना को लिपिबद्घ कर विदेशी साम्राज्य के विरूद्घ देशभक्ति का आह्वान किया गया। 1885 में स्थापित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा इस प्रकार के पूर्ण स्वराज्य की मांग 1929 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पहली बार की गयी थी। इसीलिए स्वतंत्र भारत की प्रथम लोकसभा के अध्यक्ष श्री अनंत शयनम आयंगर ने कहा था कि 1929 में पूर्ण स्वराज्य की मांग करने वाले महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता माना गया तो उनसे भी 55 वर्ष पहले 1874 में पूर्ण स्वराज्य का शंखनाद करने वाले महर्षि दयानंद को ‘राष्ट्र पितामह’  की उपाधि से विभूषित किया जाना चाहिए। संदर्भ  1876 में लिखित आर्याभिविनय हे ईश्वर! हम वीरों के चक्रवर्ती राज्य को प्राप्त करें-दयानंद

4. चतुर्थ स्वर्णिम अध्याय-गोहत्या पर प्रतिबंध की मांग :

गोकरूणानिधि पुस्तिका के रचनाकर महर्षि दयानंद ने गवर्नर जनरल को 1882 में पत्र लिखकर मांग की थी कि भारत में गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए। गोमाता की रक्षार्थ किया गया महर्षि का यह तत्कालीन प्रयास देश के करोड़ों गोभक्तों के हृदय की हुंकार थी।

5. पंचम स्वर्णिम अध्याय-आर्य समाज :-

10 अप्रैल 1875 ई. को महर्षि द्वारा ‘आर्य समाज’ की स्थापना की गयी जो संपूर्ण विश्व के लिए ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ का उत्तम साधन सिद्घ हुआ।

6. षष्ठ स्वर्णिम अध्याय-परोपकारिणी सभा :
वैदिक साहित्य के प्रचार प्रसार हेतु महर्षि द्वारा परोपकारिणी सभा को पंजीकृत कराया गया तथा बंबई में वैदिक यंत्रालय भी संचालित किया गया। महर्षि द्वारा दिया गया यह अनुपम संस्थान आज भी संपूर्ण आर्यजगत के लिए सतत कार्य में संलग्न रहकर प्रचुर साहित्य का सृजन कर रहा है।

7. सप्तम स्वर्णिम अध्याय-नारी उत्थान :-

आर्य समाज ने स्त्रियों के लिए वेदाध्ययन पर लगे प्रतिबंध को ध्वस्त किया और प्रमाणित किया कि वेदमंत्रों का साक्षात्कार करने वाली नारी ऋषिकाएं भी हैं:लोपामुद्रा, श्रद्घा, विश्ववारा, यमी, घोषा, वाक आदि। आर्य कन्या विद्यालय, कन्या गुरूकुल आदि का संचालन आर्य समाज की ही देन है। तदनुसार अन्य वर्गों द्वारा भी बाद में इस तथ्य को अंगीकृत कर लिया गया।

8. अष्टम स्वर्णिम अध्याय-दलितों का उत्थान :-

‘स्त्री शूद्रोनाधीयताम’ (स्त्री व शुद्रों को वेद पढऩा मना है) की घोषणा करने वाले पाखण्डी धर्म प्रचारकों को चुनौती देकर महर्षि ने सबके लिए यह अधिकार प्रदान कर वेदाध्ययन को सर्वसुलभ बनाया। इसी आधार पर विश्व का प्रथम महिला विद्यालय पंजाब के जिला होशियारपुर के ग्राम हरियाणा में श्रीमती माता भागदेवी द्वारा सन 1882 में खोला गया।

9. नवम स्वर्णिम अध्याय-सामाजिक क्षेत्र में रूढि़वाद पर प्रहार :


विधवा विवाह निषेध को समाप्त करना, सती प्रथा मो समाप्त करने के अभियान को बल प्रदान करना, बाल विवाह की प्रथा को समाप्त कराना एवं दहेज आदि सामाजिक कुरीतियों के विरूद्घ आर्य समाज ने सशक्त अभियान चलाने में सफलता प्राप्त की।

10. दशम स्वर्णिम अध्याय-कर्म प्रधान वर्ण व्यवस्था :

महर्षि द्वारा अनुप्राणित आर्य समाज ने वेदों में वर्णित व्यवस्था को जन्म आधारित के स्थान पर कर्म आधारित सिद्घ किया। जाति भेद, छुआछूत (स्पर्शास्पृश्य) की भावना, स्त्री-पुरूष के अधिकारों में समानता आदि को चुनौती देकर वास्तविक समाजवाद एवं सामाजिक समरसता का उल्लेखनीय अभियान चलाकर आर्य समाज ने अतुलनीय श्रेय प्राप्त किया।
क्रमश:

उगता भारत ब्यूरो ( 2469 )

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