भक्ति परम्परा के प्रमुख स्तम्भ महाकवि विद्यापति

  • 2018-01-10 14:26:41.0
  • अशोक “प्रवृद्ध”

भक्ति परम्परा के प्रमुख स्तम्भ महाकवि विद्यापति

भारतीय साहित्य की भक्ति परंपरा के प्रमुख स्तंभों में से एक और मैथिली भाषा के सर्वोपरि कवि के रूप में प्रख्यात विद्यापति का संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश एवं मातृभाषा मैथिली पर समान अधिकार था। हिन्दी साहित्यभ के अभिनव जयदेव के नाम से प्रख्यात विद्यापति का बिहार प्रान्त के मिथि?ला क्षेत्रवासी होने के कारण इनकी भाषा मैथिल थी। इनकी भाषा मैथिल होने के बावजूद़ विद्यापति की सर्वाधिक रचनाएँ संस्कृैत भाषा मे थी, इसके अतिरिक्तक अवहट्टा भाषा में भी ये रचना करते थे। मैथिली भाषा के रचनाकारों की लोकप्रियता में शीर्ष पर स्थापित महाकवि विद्यापति के समतुल्य आज लगभग छ: शताब्दी उपरांत भी कोई नजर नहीं आता ।विद्यापति ने संस्कृत, अवह_, एवं मैथिली में कविता रची। इसके अतिरिक्त भूपरिक्रमा, पुरुषपरीक्षा, लिखनावली आदि अनेक रचनाएँ साहित्य को दीं।कीर्तिलता और कीर्तिपताका नामक रचनाएं अवह_ में लिखी हैं। पदावली उनकी हिन्दी-रचना है और वही उनकी प्रसि़द्धि का कारण हैं। पदावली में कृष्ण-राधा विषयक श्रृंगार के पद हैं। इनके आधार पर इन्हें हिन्दी में राधा-कृष्ण-विषयक श्रृंगारी काव्य के जन्म दाता के रूप में जाना जाता है। कर्मकाण्ड ,धर्म, दर्शन ,न्याय, सौन्दर्य शास्त्र , भक्ति रचना, विरह व्यथा,अभिसार, राजा का कृतित्व गान,सामान्य जनता के लिए गया में पिण्डदान, सभी क्षेत्रों में विद्यापति अपनी कालजयी रचनाओं के बदौलत जाने जाते हैं। शास्त्र और लोक दोनों ही संसार में उनका असाधारण अधिकार था।काव्य और साहित्य के क्षेत्र में महाकवि ने पुरुष परीक्षा,भूपरिक्रमा, कीर्तिलता, कीर्ति पताका, गोरक्ष विजय, मणिमंजरा नाटिका नामक ग्रन्थों की रचना की।धर्मशास्त्र के क्षेत्र में भी महाकवि विद्यापति का असाधारण योगदान है। इस विषय पर इन्होंने गंगावाक्यावली, दानवाक्यावली, वर्षकृत्य, दुर्गाभक्तितरंगिणी, शैवसर्वस्वसार, गयापत्तालक, विभागसार नामक सात ग्रन्थों की रचना की है।

संस्कृत, अवहट्ट, एवं मैथिली तीनों भाषाओं में प्राप्य विद्यापति की काव्य रचनाओं में मध्यकालीन मैथिली भाषा के स्वरूप का दर्शन किया जा सकता है। इन्हें वैष्णव और शैव भक्ति के सेतु के रुप में भी स्वीकार किया गया है। मिथिलावासियों को देसिल बयना सब जन मि_ाका सूत्र दे कर इन्होंने उत्तरी-बिहार में लोकभाषा की जनचेतना को जीवित करने का महती प्रयास किया है। मिथिलांचल के लोकव्यवहार में प्रयोग किये जाने वाले गीतों में आज भी विद्यापति की श्रृंगार और भक्ति रस में पगी रचनाएँ दृष्टिगोचर होती हैं। पदावली और कीर्तिलता इनकी अमर रचनाएँ हैं। बाबा विद्यापति और उनकी कलम से निकली रचना - जय जय भैरवि, जो देवी स्तुति मुख्यत: मैथिली एंव अवहट्ट भाषा में है, जो अत्यंत लोकप्रिय है।विद्यापति ने मैथिल, अवहट्ट, प्राकृत ओर देशी भाषओं मे चरित काव्यै और गीति पदों की रचना की है। विद्यापति के काव्यल में वीर, श्रृंगार, भक्ति के साथ-साथ गीति प्रधानता मिलती है। विद्यापति की यही गीतात्माकता उन्हें अन्यं कवियों से भिन्नव करती है। जनश्रुति के अनुसार जब चैतन्यध महाप्रभू इनके पदों को गाते थे, तो महाप्रभु गाते गाते बेहोश हो जाते थे। भा?रतीय काव्यो एवं सांस्कृ तिक परिवेश मे गीतिकाव्यच का बड़ा महत्वर था। विद्यापति की काव्यातत्मोक विविधता ही उनकी विशेषता है।
महाकवि कोकिल विद्यापतिका पूरा नाम विद्यापति ठाकुर था। उनकी माता का नाम हँसिनी देवी और पिता का नाम गणपति ठाकुर था।उनका जन्म स्थल विसपी माना जाता है।श्री गणपति ठाकुरने कपिलेश्वर महादेव की अराधना कर ऐसे पुत्र रत्न को प्राप्त किया था। कहा जाता है कि स्वयं भोले नाथ ने कवि विद्यापति के यहाँ उगना (नौकर का नाम) बनकर चाकरी की थी।विद्यापति के जन्मा स्थान, जन्म तिथि, बाल्यकाल, जीवन वृत्त व मृत्यु वर्षके सम्ब न्ध में भी विद्वानों में मतभेद है।फिर भी विद्वान् इन्हें दरभंगा जनपद के विसकी नामक स्थाउन का मानते है। विद्यापति का वंश ब्राह्मण तथा उपाघि ठाकुर थी। विसकी ग्राम को इनके आश्रय दाता राजा शिवसिंह ने इन्हें दानस्वरूप दिया था। इनका पूरा परिवार पैत्रिक रूप से राज परिवार से सम्ब द्ध था। इनके पिता गणपति ठाकुर राम गणेश्वयर के सभासद थे। इनका विवाह चम्पार देवी से हुआ था। विद्यापित की मृत्युा सन 1448 ईस्वीमें कार्तिक त्रयोदशी को हुई थी।महाकवि कोकिल विद्यापति ठाकुर के जन्म दिवस के बारे में आज भी विवाद है । इसका कारण है कि इनके जन्म दिन के बारे में कोई लिखित प्रमाण नहीं है । हालांकि महाकवि के एक पद से स्पष्ट होता है कि लक्ष्मण-संवत् 293, शाके 1324 अर्थात् सन् 1402 ईस्वी में देवसिंह की मृत्यु हुई और राजा शिवसिंह मिथिला नरेश बने। मिथिला में प्रचलित किंवदन्तियों के अनुसार उस समय राजा शिवसिंह की आयु 50 वर्ष की थी और कवि विद्यापति उनसे दो वर्ष बड़े, यानी 52 वर्ष के थे। इस प्रकार 1402 में से 52 घटा दें तो 1350 बचता है। इस आधार पर कुछ विद्वान् 1350 ईस्वी में विद्यापति की जन्मतिथि मानते हैं । लेकिन दूसरी ओर लक्ष्मण-संवत् की प्रवत्र्तन तिथि के सम्बन्ध में भी विवाद है। कुछ विद्वान सन् 1109 ईस्वी से, तो कुछ 1119 ईस्वी से इसका प्रारंभ मानते हैं । स्व. नगेन्द्रनाथ गुप्त ग्रिपर्सन और महामहोपाध्याय उमेश मिश्र आदि ने लक्ष्मण-संवत् 293 को 1412 ईस्वी मानकर विद्यापति की जन्मतिथि 1360 ईस्वी में मानी है। परन्तु कुछ विद्वान् सन् 1350 ईस्वी को उनका जन्मतिथि का वर्ष मानते हैं तो कुछ विद्यापति का जन्म सन् 1374 ईस्वी के आस- पास मानते हैं । इस प्रकार यह निश्चिततापूर्वक नहीं कहा जा सकता है कि विद्यापति का जन्म कब हुआ था और वे कितने दिन जीते रहे?यह भी जनश्रुति ही है कि विद्यापति राजा शिवसिंह से बहुत छोटे थे।
महाकवि की जन्म तिथि व जन्म स्थान की तरह ही उनकी बाल्यावस्था के बारे में भी विशेष जानकारी नहीं है।एक किंवदन्ती के अनुसार बालक विद्यापति बचपन से तीव्र और कवि स्वभाव के थे। एक दिन जब ये आठ वर्ष के थे तब अपने पिता गणपति ठाकुर के साथ शिवसेंह के राजदरबार में पहुँचे। राजा शिवसिंह के कहने पर इन्होंनेदो पंक्तियों का पद्य निर्माण किया-
पोखरि रजोखरि अरु सब पोखरा।
राजा शिवसिंह अरु सब छोकरा।।
जनश्रुतियों के अनुसार विद्यापति ने प्रसिद्ध हरिमिश्र से विद्या ग्रहण की थी। विख्यात नैयायिक जयदेव मिश्र उर्फ पक्षधर मिश्र इनके सहपाठी थे। महाकवि अपने पिता गणपति ठाकुर के साथ बचपन से ही राजदरबार में जाया करते थे। किन्तु चौदहवीं सदी का शेषार्ध मिथिला के लिए अशान्ति और कलह का काल था। राजा गणेश्वर की हत्या असलान नामक यवन-सरदार ने कर दी थी। कवि के समवयस्क एवं राजा गणेश्वर के पुत्र कीर्तिसिंह अपने खोये राज्य की प्राप्ति तथा पिता की हत्या का बदला लेने के लिए प्रयत्नशील थे। संभवत: इसी समय महाकवि ने नसरतशाह और गय़िासुद्दीन आश्रमशाह जैसे महपुरुषों के लिए कुछ पदों की रचना की। राजा शिवसिंह विद्यापति के बालसखा और मित्र थे, अत: उनके शासन-काल के लगभग चार वर्ष का काल महाकवि के जीवन का सबसे सुखद समय था। राजा शिवसिंह ने उन्हें यथेष्ठ सम्मान दिया। बिसपी गाँव उन्हें दान में पारितोषिक के रुप में दिया तथा अभिनवजयदेवकी उपाधि से नवाजा। कृतज्ञ महाकवि ने भी अपने गीतों द्वारा अपने अभिन्न मित्र एवं आश्रयदाता राजा शिवसिंह एवं उनकी सुल पत्नी रानी लखिमा देवी (ललिमादेई) को अमर कर दिया। सबसे अधिक लगभग 250 गीतों में शिवसिंह की भणिता मिलती है।
महाकवि विद्यापति ठाकुर के पारिवारिक जीवन का कोई स्वलिखित प्रमाण नहीं है, किन्तु मिथिला के उतेढ़पोथी से ज्ञात होता है कि इनके दो विवाह हुए थे। प्रथम पत्नी से नरपति और हरपति नामक दो पुत्र हुए थे और दूसरी पत्नी से एक पुत्र वाचस्पति ठाकुर तथा एक पुत्री का जन्म हुआ था। संभवत: महाकवि की यही पुत्री दुल्लहिनाम की थी जिसे मृत्युकाल में रचित एक गीत में महाकवि अमर कर गये हैं। कालान्तर में विद्यापति के वंशज किसी कारणवश विसपी को त्यागकर सदा के लिए सौराठ गाँव (मधुबनी ज़िला में स्थित समागाछी के लिए प्रसिद्ध गाँ) आकर बस गए। वर्तमान समय में महाकवि के सभी वंशज इसी गाँव में निवास करते हैं।जन्मतिथि की तरह महाकवि विद्यापति ठाकुर की मृत्यु के सम्बन्ध में भी विद्वानों में मतभेद है। कुछ विद्वान् 1440 ईस्वी तो कुछ विद्यापति का मृत्युकाल 1447 मानते है। लेकिन स्पष्ट तौर पर जनश्रुतियाँ बताती है कि आधुनिक बेगूसराय ज़िला के मउबाजिदपुर (विद्यापतिनगर) के पास गंगातट पर महाकवि ने प्राण त्याग किया था। उनकी मृत्यु के सम्बन्ध में यह पद जनसाधारण में आज भी प्रचलित है, जिससे स्पष्ट होता है कि उनकी मृत्यु कार्तिक मास की शुक्ल त्रयोदशी को हुआ था-
विद्यापतिक आयु अवसानकातिक धवल त्रयोदसि जान।
विद्यापति शिव एवं शक्ति दोनों के प्रबल भक्त थे। शक्ति के रुप में उन्होंने दुर्गा, काली, भैरवि, गंगा, गौरी आदि का वर्णन अपनी रचनाओं में यथेष्ठ किया है। मिथिला के लोगों में यह बात आज भी व्याप्त है कि जब महाकवि विद्यापति काफ़ी उम्र के होकर रुग्न हो गए तो अपने पुत्रों और परिजनों को बुलाकर यह कहा कि मेरी इच्छा है कि मं। गंगा के किनारे गंगाजल को स्पर्श करता हुआ अपने दीर्घ जीवन की अन्तिम सांस लूं। अत: आप लोग मुझे गंगालाभ कराने की तैयारी में लग जाएं।
परिवार के लोगों ने महाकवि का आज्ञा का पालन करते हुए चार कहरियों को बुलाकर महाकवि के जीर्ण शरीर को पालकी में सुलाकर सिमरिया घाट गंगालाभ कराने के लिए चल पड़े। आगे-आगे कहरिया पालकी लेकर और पीछे-पीछे उनके सगे-सम्बन्धी। रात-भर चलते-चलते जब सूर्योदय हुआ तो विद्यापति ने पूछा- भाई, मुझे यह तो बताओ कि गंगा और कितनी दूर है? साथ चलने वालों ने बताया कि अभीकऱीब पौने दो कोस दूर है ।इस पर महाकवि ने वहीँ अपनी पालकी रोक देने की आज्ञा दी और कहा कि गंगा यहीं आएंगी। साथ चलने वालों के गंगा तक चलने की प्रार्थना करने पर भी वे नहीं माने और कहते रहे कि हमें और आगे जाने की जरुरत नहीं। गंगा यहीं आएगी। इतना कहकर महाकवि ध्यानमुद्रा में बैठ गए। पन्द्रह-बीस मिनट के अन्दर गंगा अपनी उफनती धारा के प्रवाह के साथ वहाँ पहुँच गयी। सभी लोग आश्चर्य में थे। महाकवि ने सर्वप्रथम गंगा को दोनों हाथ जोडक़र प्रणाम किया, फिर जल में प्रवेश कर एक गीत की रचना की और प्रार्थना करते हुए उसमें अपनी प्राण त्याग दी ।
उल्लेखनीय है कि विद्यापति के समय मे संस्कृत भाषा का चलन था । इस संबंध में विद्यापति ने टिप्पणी करते हुऐ कहा था - संस्कृत प्रबुद्धजनोंकी भाषा है तथा इस भाषा से आम जनों को कोई सरोकार नही है ।प्राकृत भाषा मे वह रस नही है जो आम जन को समझ में आये ।शायद इसलिए ही उन्होंने अपभ्रंश भाषा में अधिकांश रचना की थी ।विद्यापति के पदों में घोर भक्तिवाद और घोर श्रृंगार रस दोनों ही देखने को मिलता है । इनकी रचना के सांगोपांग अध्ययन सेश्रृंगार सरिता में डूबते हुए कब भक्ति के सुरम्य तट पर आ खड़े हुए यह स्पष्ट पता ही नहीं चलता है । भक्ति और श्रृंगार रस का ऐसा संगम शायद ही कही और देखने को मिलेगा । औरविद्यापति को पढऩे वाले भी इनको भक्त या श्रृंगारिक दोनों रूप के कवि मानतेहैं, जो सत्य भी है ।विद्यापति के काव्य में भक्ति एंव श्रृंगार के साथ -साथ गीति प्रधानता भी मिलती है । इनकी यही गीतात्मकता इन्हें अन्य कवियों से भिन्न करती है ।उनकी इसी गीतात्मक शैली का प्रत्यक्ष उदाहरण है -जय जय भैरवि असुर भयाउनि, पशुपति - भामिनी माया ।जो मैथिली भाषा क्षेत्र के हर व्यक्ति के जिह्वा पर आज भी विराजित है ।इसकी लोकप्रियता का आकलन इसी बात से किया जा सकता है कि मिथिला क्षेत्र का कोई भी शुभ कार्य का आरम्भ इसी गीत से किया जाता है।छोटा और बड़ा सभी प्रकार के आयोजनों का शुभारम्भ एंव समापन इसी से होता है ।