भागवत धर्म की ही विशेषता है अवतारवाद की भावना

  • 2016-08-17 09:30:57.0
  • अशोक “प्रवृद्ध”

भागवत धर्म की ही विशेषता है अवतारवाद की भावना

अवतारवाद की भावना भागवत धर्म की ही विशेषता है। समस्त विश्व को भी प्रभु का अवतार माना जा सकता है, पर अवतारवाद वस्तुत: दिव्य जन्म एवं कर्म से सम्बन्ध रखता है। अत: विशेष गुण- सम्पन्न व्यक्ति को अवतार के रूप में आदृत करने की प्रणाली हो चली और इस विचार की पुष्टि स्पष्ट रूप से श्रीमद्भागवत पुराण और गीता में आई हुई भगवद्वाणी से होती है-
अवतारा ह्यसंख्येया हरे: सत्वनिधेद्र्विजा ।
यथाविदासिन: कुल्या: सरस: स्यु: सहस्त्रश:।।
ऋषयो मनवो देवा मनुपुत्रा महौजश: ।
कला:सर्वे हरेरेव सप्रजापतयस्तथा ।।
एते चीशकला: पूंस:कृष्णस्तु भगवान् स्वयम ।
इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृड्यन्ति हि युगे-युगे ।।
-भागवत महापुराण 1-3-26, 27, 28
भगवान विष्णु ने शौनकादि ऋषियों से कहा - जैसे अगाध सरोवर से हजारों छोटे-छोटे नाले निकलते हैं, वैसे ही एक सत्य निधि से भगवान श्रीहरि के असंख्य अवतार हुआ करते हैं । ऋषि, मुनि, देवता, प्रजापति, मनुपुत्र और जितने भी महान शक्तिशाली हैं , वे सब के सब भगवान के ही अंश हैं। ये सब अवतार तो भगवान के अंशावतार या कलावतार हैं, परन्तु भगवान श्रीकृष्ण तो स्वयं भगवान (अवतारी) ही हैं। जब लोग दैत्यों के अत्याचार से व्याकुल हो उठते हैं, तब युग- युग में अनेक रूप धारण करके भगवान उनकी रक्षा करते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता 4/7-8में भी इस अवतारवाद की पुष्टि होती है।

भागवत पुराण में अवतारों की मान्यता की कुछ भावना दिख पड़ती है। अवतारों में पूर्णावतार श्रीकृष्ण को ही माना जाता है और उन्हें साक्षात् विष्णु कहा जाता है। श्रीकृष्ण को सोलह कलाओं से युक्त अवतार माना गया है। अत: अवतारवाद भागवत धर्म के अभिन्न रूप के साथ प्रारम्भ हुआ जिसके प्रतिष्ठाता श्रीकृष्ण हुए। डॉ0 मुंशीलाल शर्मा का विचार है कि जब योगाचार्य भगवान श्रीकृष्ण ने पांचरात्र अथवा भागवत धर्म को अभिन्न रूप प्रदान किया, तब उनके अनुयायियों ने नारायण, विष्णु और श्रीकृष्ण में एक ही विभूति के दर्शन किये। अवतारवाद की नींव यहीं से पड़ी।
महाभारत शान्ति पर्व 335/29,32, 39, 81 भागवत धर्म को लोक धर्म कहता हैऔर उसका सम्बन्ध सांख्य योग तथा वेदारण्यक से जोड़ता है । भागवत धर्म पांचरात्र, ऐकान्तिक, नारायण, वासुदेव , वैष्णव, सात्वत आदि नामों से अभिहित किया गया है । महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 348 में कहा गया है
नूनमेकान्तधर्मोऽयं श्रेष्ठो नारायणप्रिय: ।
परस्पराङ्गन्येतानि पाञ्चरात्रञ्च कथ्यते ।।
एष एकान्तिनां धर्मानारायाण परात्मक: ।
एष ते कथितो धर्म: सारस्वत: कुरुनन्दन ।
- महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 348 , 81, 82
भागवत धर्म ने भगवान में एकान्त निष्ठा और अहैतुक भक्ति को ही जीव का उद्धार करने वाली माना है।

वैष्णवों में विष्णु और उनके अवतारों की संख्या बढ़ते गई , उसे ही महाभारत में पांचरात्र नाम मिला। महाभारत के नारायणीय उपाख्यान से यह जान पड़ता है कि महाभारत के समय में भगवद्भक्ति करने वाले भागवत कहलाते थे। इस संप्रदाय में विष्णु को परमेश्वर मान भक्ति की जाती थी। पांचरात्र तथा भागवत एक ही संप्रदाय के पर्यायवाची नाम हैं। महाभारत के नारायणीय आख्यान से पता चलता है कि विष्णु और श्रीकृष्ण परमेश्वर के दृश्य माने जाने लगे थे और उनको मानने वाले उनके प्रति अगाध श्रद्धा एवं भक्ति प्रदर्शित करते थे और ये भगवद्भक्ति करने वाले भागवत कहलाते थे। जनसाधारण के प्रति श्रीकृष्ण को अगाध प्रेम था और उनके हित के लिए उन्होंने अलौकिक और अद्भुत कार्य किये। फकत: सामान्य जन के साथ ही राजा एवं बड़े- बड़े शूर- वीर उनके कायल हो गये थे। अन्तत: सभी कृष्ण के शरणागत एवं भक्त हो गये । विष्णुरुपी श्रीकृष्ण के उस भक्ति में भक्तों का निर्मल प्रेम होने के कारण उन्होंने भक्तों का उद्धार किया ।तैतिरीय आरण्यक के दशम प्रपाठ के अनुसार सबमें बसने के कारण और सबको अपने में बसाने वाले वासुदेव नाम से प्रसिद्ध परमात्मा ही भगवत भगवान कहे जाते हैं।
अवतारवाद भागवत धर्म की ही देन है। श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भग्वद्गीता में जितने पुरावरण शब्दों में अवतारवाद का प्रतिपादन किया है उतना अन्यत्र उपलब्ध नहीं होता। पुराणों में जहाँ -जहाँ भी अवतारवाद का जिक्र किया गया है, वहाँ- वहाँ गीता के शब्दों को ही दुहराया गया है।
अवतार के स्वरुप के सम्बन्ध में भागवत पुराण 11/4/3 में कहा गया है-
भुतैर्यदा पञ्चभिरात्मसृष्टटै: पुरं विराजं विरच्चय तस्मिन् ।
स्वांशेन विष्ट: पुरुषाभिधानमवाप नारायण आदिदेव: ।।

अर्थात- भगवान ने ही पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश - इन पाँच भूतों की अपने आप में सृष्टि की है। जब वे इनके द्वारा विराट शरीर , ब्रह्माण्ड का निर्माण कर उसमें लीला से अपने अंश अन्तर्यामी रूप से प्रवेश करते हैं (भोक्ता रूप में नहीं, क्योंकि भोक्ता तो अपने पुण्य के फलस्वरूप जीव ही होता है।) तब उन आदिदेव नारायण को पुरुष नाम से संबोधित करते हैं। वही उनका प्रथम अवतार है। इसी पुरुष से अन्य अवतारों का भी जन्म होता है।

अवतारों की चर्चा समस्त पुराणों एवं महाभारत में आई है , परन्तु अवतारों के नाम और संख्या सम्बन्धी विभिन्नता है। श्री मद्भागवत पुराण में ही स्थल- स्थल पर विभिन्नता स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है। प्रथम स्कंध के तृतीय अध्याय में 22 अवतार , द्वितीय स्कंध के सप्तम अध्याय में 23 तथा एकादश स्कन्ध के चतुर्थ अध्याय में 16 अवतारों का उल्लेख है , किन्तु दशावतारों की भावना सर्वमान्य रही है। महाभारत शान्ति पर्व 339/77-78 नारद के पूछने पर कि महाप्रभो ! किन- किन स्वरूपों में आपका दर्शन और स्मरण करना चाहिए? भगवान ने कहा -
श्रृणु नारद तत्वेन प्रादुर्भावान महामुने।
मत्स्य: कुर्मो वराहश्च नरसिंहश्च वामन: ।।
रामो रामश्च रामश्च कृष्ण: कल्की च ते दश।।

अर्थात- महामुनि नारद ! तुम मेरे अवतारों के नाम सुनो। मत्स्य, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, बलराम, कृष्ण तथा कल्कि - दस अवतार हैं। परन्तु शान्ति पर्व 339/103-104में श्लोकों में स्वयं नारायण ने दशावतारों की कोटि से बलराम को हटाकर हंस का उल्लेख किया है। यथा-
हंस: कूर्मश्च मत्स्यश्च प्रादुर्भावा द्विजोतम: ।।
वराहो नरसिंहश्च वामन राम एव च ।
रामो दाशरथिश्चैव सात्वत: कल्किरेव च ।।
-महाभारत शान्ति पर्व 339/103-104
अर्थात - द्विजश्रेष्ठ ! हंस, कूर्म, मत्स्य, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम,राम, कृष्ण और कल्कि - ये सब मेरे अवतार हैं ।
मत्स्य पुराण में सर्वमान्य दशावतारों में हंस एवं बलराम दोनों को हटाकर बुद्ध की गणना अवतारों में की गई है।
कर्तु धर्मव्य:वस्थानं सुराणां च प्रणाशनम् ।
बुद्धो नवमको जज्ञे तपसा पुष्करेक्षण: ।।
देवसुन्दररूपेण द्वैपायनपुर: सर: ।।
धर्म की रक्षा तथा असुरों के विनाशानार्थ नवीं बार भगवान बुद्ध कमल के समान नेत्र वाले देव स्वरुप द्वैपायन के पौरोहित्य काल में उत्पन्न हुए ।
श्रीमद्भागवत् पुराण में बीस अवतारों का उल्लेख करने के पश्चात् बुद्धावतार का उल्लेख हुआ है तथा कहा गया है कि उसके बाद कलियुग के आ जाने पर मगध देश में देवताओं के द्वैषी - देवताओं को मोहित करने के लिए अंजन के पुत्र रूप में आपका बुद्धावतार होगा ।
तत: कलौ सम्प्रवृते सम्मोहाय सुरद्विषाम् ।
बुद्धो नाम्नाजनसुत: कीकटेषु भविष्यति ।।
ऐसा ज्ञात होता है बुद्ध को अवतार के रूप में मान्यता बहुत बाद में मिली तथा मत्स्य पुराण एवं भागवत पुराण के अतिरिक्त बुद्ध का उल्लेख अग्नि पुराण 16/49 और पद्म पुराण 5/73 , 6/250 में आया है ।

भागवत धर्म के इतिहास में पाणिनी सूत्र की साक्षी अमूल्य है ।
वासुदेवाज्र्जुनाभ्यां वुन । - पाणिनी सूत्र 4/3/98
अर्थात- वासुदेव और अर्जुन शब्दों पर षष्ठी विभक्ति के अर्थ में वुन प्रत्यय हो ।

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि पाणिनी के पूर्व यह भी संभव है कि उनसे बहुत पूर्व ही महाभारत की कथा प्रचलित थी, क्योंकि वासुदेवाज्र्जुनाभ्यां वुन सूत्र से वासुदेवक और अर्जुन शब्दों का अर्थ वासुदेव का उपासक और अर्जुन का उपासक निकलता है । अत: पाणिनी सूत्र की रचना के पूर्व ही कृष्णार्जुन देवता के रूप में स्वीकृत हो गए थे अस्तु, महाभारत मंर कृष्ण को वासुदेव के नाम से अभिहित किया गया हो । वसुदेव के पुत्र होने पर ही वासुदेव नाम पड़ता है, कहना ठीक नहीं । वसुदेव के पुत्र होने पर भी वासुदेव नाम हो सकता है । महाभारत में ही पुण्ड्राधिपति का नाम वासुदेव था ।
आग- वरुण, इन्द्र- सोम, इन्द्र -बृहस्पति जैसे वैदिक देवताओं के जोड़े या साहचर्य की भांति पाणिनी कल में कृष्ण- वासुदेव की भक्ति के विकास को प्राचीन और अर्वाचीन सभी विद्वानों ने स्वीकार किया है । श्रीकृष्ण- वासुदेव की भक्ति करने वाले वासुदेवक कहे जाते थे । कृष्ण के साथ- साथ उनके अभिन्न सखा अर्जुन की पूजा भी प्रचलित हो चली थीतथा कालान्तर में इनके धार्मिक साहचर्य का दूसरा रूप नर- नारायण की सह्पूजा थी , जिसमें नारायण प्रधान और नर उनके सखा थे । इसी को नारायणीय धर्म कहा है । महाभारत शान्ति पर्व 339 अध्याय में नारायणीय धर्म का विशेष रूप से वर्णन अंकित है । वासुदेव और अर्जुन का ही नामान्तर नर- नारायण है ।

डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल पाणिनी कालीन भारतवर्ष में कहते हैं, नर- नारायण की भांति संकर्षण और वासुदेव नए भक्ति धर्म का मुख्य सूत्र बन गया । इसी में आगे चलकर प्रद्युम्न और अनिरूद्ध के मिलने से चतुव्र्यूह का स्वरुप पूरा हुआ , जो पांचरात्र धर्म की सुनिष्पन्न मान्यता बनी । भारतीय धार्मिक इतिहास में यह परिवर्तन बहुत महत्वपूर्ण था, जिसकी गूँज पाणिनी के वासुदेवाज्र्जुनाभ्यां वुन (4/3/98) में सुनाई देती है । वासुदेव - संकर्षण (8/1/15) व्याकरण के उदाहरणों में जुड़वाँ देवता के रूप में है ।चतुव्र्यूह का सम्यक वर्णन महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 49 में अंकित है । उसमें कहा गया है कि श्वेतद्वीप में पहुँचकर देवर्षि नारद भगवान विष्णु की दर्शन की इच्छा से उनके नाम की दो सौ नामों द्वारा स्तुति करने लगे । स्तुति पर विश्वरूप धारण कर श्रीहरि ने उन्हें दर्शन दिया । भगवान का रूप विलक्षण था । श्रीहरि अपने स्वरूप में नाना प्रकार के रंग धारण किये हुए थे। उनके हजार नेत्र, हजारों मस्तक, हजारों पैर, हजारों उदर और हजारों ही हाथ थे । वे अपूर्वकान्ति से सम्पन्न थेतथा उनकी आकृति अव्यक्त थी । सबको वश में रखने वाले भगवान नारायण एक मुख से तो ओंकार तथा उससे सम्बन्ध रखने वाली गायत्री का जाप कर रहे थे एवं अन्यान्य चारों मुख से वेद तथा उनके आरण्यक भाग का जाप कर रहे थे ।

भगवान् ने आगे कहा है- विप्रवर धर्म के घर में अवतीर्ण हुए वे नर -नारायणादि चारों भाई मेरे ही स्वरुप हैं, अत: तुम उनका भजन किया करो तथा जो कार्य प्राप्त हो उसका साधन करो । जो नेत्रों से देखा नहीं जाता, त्वचा से जिसका स्पर्श नहीं होता, गंध ग्रहण करने वाली घ्रानेन्द्रिय नाली से जो सूंघने में नहीं आता, जो रसेन्द्रिय की पहुँच से परे है, सत, रज एवं तप नामक गुण जिस पर कोई प्रभाव नहीं डालते , जो सर्वव्यापी, साक्षी और सम्पूर्ण जगत का आत्मा कहलाता है, सम्पूर्ण प्राणियों का नाश हो जाने पर भी जो स्वयं नष्ट नहीं होता, जिसको अजन्मा, नित्य, सनातन, निर्गुण और निष्कलंक बतलाया गया है, जो चौबीसों तत्वों से परे पच्चीसवें तत्व के रूप में विख्यात है, जिसे अन्तर्यामी पुरुष निष्क्रिय तथा ज्ञानमय नेत्रों से ही देखने योग्य बताया जाता है, जिसमें प्रवेश करके श्रेष्ठ द्विज मुक्त हो जाता है, वही सनातन परमात्मा है । उसी को वासुदेव नाम से जाना जाता है। संसार में उस एकमात्र सनातन पुरुष वासुदेव को छोडक़र कोई भी चराचार भूत नित्य नहीं है । पांचरात्र साहित्य में मेरूगिरी निवासी चित्र- शिखण्डी (शिखण्डा) नाम सात ऋषियों ने मिल कर वेदों का निष्कर्ष निकालकर निर्माण किया था । मरीचि ऋषि का नाम मुख्य है, जिन्होंने बैखानस आगम की रचना की थी आगम की थी । दोनों आगम नारायण को परम देवता मानते थे।