.......उनका नाम पिता था

  • 2016-09-26 05:00:34.0
  • विजेंदर सिंह आर्य

.......उनका नाम पिता था

प्रस्तुति प्रो. विजेन्द्र सिंह आर्य
मुख्य संरक्षक 'उगता भारत'
हे पूज्य पिता!
प्रस्तावना-चराचर जगत के स्वामी प्रजापति को जब प्रजा की उत्पत्ति की कामना हुई, तो उसने 'तप' किया। तप करने के बाद उसने मिथुन को अर्थात जोड़े को उत्पन्न किया। ये मिथुन है - 'रयि' और 'प्राण'। ये प्रजापति की दो शक्तियाँ हैं- 'प्राण' पुल्लिंग है अर्थात पुरुष है। 'रयि' स्त्रीलिंग है अर्थात मातृ-शक्ति है। सूर्य 'प्राण-शक्ति' है, चंद्रमा 'रयि' शक्ति है। भोक्तृ-शक्ति को बढ़ाने वाला सूर्य है, जबकि भोग्यशक्ति को बढ़ाने वाला चंद्रमा है। सूर्य की किरणें प्रकाश संश्लेषण क्रिया के द्वारा पौधों में पर्णहरिमा भर देती हैं अर्थात हरापन भर देती हैं, जिससे जीव-जंतुओं के रक्त में हीमोग्लोबिन बनता है, नवजीवन का संचार होता है, जबकि चंद्रमा की किरणें अन्न औषधियों में रस और गूदा भरती हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो सूर्य की उष्ण किरणें अन्न औषधियों को पकाती हैं, जबकि चंद्रमा की शीतल चाँदनी उन्हें सहेजती है, परिवर्धित करती है। ठीक इसी प्रकार आत्मतत्व ने जब अपने आपको पुरुषतत्त्व और स्त्रीतत्त्व में परिणत किया तो संसार में जीव-जंतुओं का सृष्टिक्रम प्रारम्भ हुआ। पुरुषतत्त्व और स्त्रीतत्त्व कोई और नहीं अपितु माता-पिता हैं। माँ जहां कोमलता, वात्सल्य और ममता की प्रतिमूर्ति है, वहाँ पिता साहस और शक्ति का अनुपम स्रोत है। दोनों का महत्व बराबर है, सापेक्ष है, किन्तु विडम्बना यह है कि माँ की ममता और वात्सल्य को प्राय: लोग अधिक महत्व देते हैं, जबकि पिता की डांट-फटकार अथवा कठोरता के कारण उन्हें नजरंदाज किया जाता है, जो न्यायसंगत नहीं है। ऐसा करके हम अपने ही द्वारा अपने जनक के साथ घोर अन्य करते हैं। यह संकीर्ण मानसिकता का परिचायक है। पिता एक व्यक्ति नहीं, अपितु एक शक्ति है, जिसके माध्यम से हम इस दृश्यमान जगत में आते हैं। इस दृष्टि से माता-पिता दोनों ही हमारे 'चेतन देवता' हैं। ये दोनों देवता एक सूर्य हैं, तो दूसरा चाँद है अर्थात एक धूप है तो दूसरा छाया है।
इन दोनों से हमारा अन्योन्याश्रित संबंध है। इनके प्यार अथवा वात्सल्य के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं किन्तु दोनों का अभीष्ट लक्ष्य है-'अपनी संतान का सर्वांगीण विकास करना'। अत: जितनी माता पूजनीय है, पिता भी उतना ही पूजनीय है, दोनों ही हमारे जीवन की आधारशिला हैं। 'माँ' की ममता, तप, त्याग, और वात्सल्य पर तो अनेक कवियों और लेखकों ने गद्य और पद्य में रचना की है किन्तु पिता भी अपनी संतान के लिए तिल-तिल करके जलता है उसके प्रेम, तप, त्याग, साहस और सुनहले सपनों पर बहुत कम कवियों और लेखकों का ध्यान गया है। इस बात पर मैंने गहन चिंतन और मनन किया है, इस दृष्टि से यहाँ मेरी लेखनी का प्रयास 'पिता' के अनुपम अतुलनीय महत्व को उद्घाटित करना है। मैंने पिता को अपना 'पूज्य' माना है, एक 'चेतन देवता' माना है, 'जीवनदाता' और 'निर्माता' माना है 'विचित्र शिल्पकार' माना है। अत: प्रस्तुत कविता का शीर्षक है - 'हे पूज्य पिता!'
मेरे एक चेतन देवता थे,
उनका नाम था पिता....
अरे उनका नाम पिता था....

हम बहक न जाएँ कुमार्ग पर,
इसलिए हमें वो टोकते थे।
जो स्वयं छाता बन जाते थे,
दु:खों की वर्षा रोकते थे॥

कभी अंगुली पकड़ घूमते थे,
हमको चलना सिखलाते थे।
निज कंधों पर बैठाते थे,
और दुनिया हमें दिखाते थे॥
उनका नाम पिता था..........1

अपनी इच्छाएँ कुचलते थे,
बच्चों की पूरी करते थे।
मोमबत्ती की तरह जलते थे,
हमको प्रकाशित करते थे॥

वो खुद भूखा रह लेते थे,
पर हमको भोजन देते थे।
गम के आँसू पी जाते थे,
मगर हमें होंसला देते थे॥
उनका नाम पिता था..........2

अरमा आसमां से ऊंचे,
जिनके लिए वे बेताब रहे।
अमलीजामा पहनते थे,
दिल में जो सुनहले ख्वाब रहे॥

धुन के पक्के मन के सच्चे,
कांटों में खिले गुलाब रहे।
स्वाभिमान हिमालय जैसा था,
बिन रियासत के वे नवाब रहे॥
उनका नाम पिता था..........3

मेरी तोतली भाषा बोल-बोल,
मेरा घोड़ा बन जाते थे।
देखा पचपन में बचपन को,
जब झूमकै लोरी गाते थे॥

गिरकर उठना बतलाते थे,
कभी गलती पर धमकाते थे।
वो फूल भी थे और शूल भी थे,
जो आईना हमें दिखाते थे॥
उनका नाम पिता था..........4

'पालने' से प्यारी थी गोदी,
बाहों में कभी झ्ुालाते थे।
बेटा आओ! चीजी खाओ,
अधिकार से मुझे बुलाते थे॥

अधरों पर मुस्कान देख,
वे रोमांचित हो जाते थे।
'शाबाशी' का कोई काम किया,
तो फूले नहीं समाते थे॥
उनका नाम पिता था..........5

आँखों में चमक आ जाती थी,
दिल होंसले से भर जाते थे।
वरद-हस्त रख कर सिर पर,
जब हमें प्यार कर जाते थे॥

वो पीठ पर थपकी देते थे,
और माथा मेरा चूमते थे।
बाहों में उठाया जब मुझको,
नभ अवनि बौने लगते थे॥
उनका नाम पिता था..........6

जो कल्याण की चिंता करते थे,
मारग से कंट हटाते थे।
ऊपर से क्रोध हटाते थे,
अंदर करुणा बरसाते थे॥

जो अस्तित्व को पोषित करते थे,
स्वाभिमान की रक्षा करते थे।
'मेरा लाल' न पीछे रह जाए,
इसलिए वो गुस्सा करते थे॥
उनका नाम पिता था..........7

जानें कितनी कर कंजूसी,
वो घर का खर्च चलाते थे।
उपेक्षा और अपमान की बातें,
हमको नहीं बताते थे॥

इतना होने पर भी हमसे,
मुस्काकर बतियाते थे।
भय, तनाव, चिंता आदि से,
हमको नित्य बचाते थे॥
उनका नाम पिता था..........8

किसका लेना किसका देना,
नहीं होने दिया भान हमको।
वो अक्सर हम से कहते थे,
तुम सूरज-चाँद बनकर चमको॥

रहे ऊर्जा के वे स्रोत सदा,
हमको ऊर्जान्वित करते थे।
अभाव विषमता ने घेरा,
फिर भी आशान्वित रखते थे॥
उनका नाम पिता था..........9

उनकी वाणी में जादू था,
टूटे दिल को वो जोड़ते थे।
कुल की मर्यादा के रक्षक,
कभी फर्ज से मुंह नही मोड़ते थे।

तूफानों को टक्कर देते थे,
ऐसे सीने के फौलादी थे।
जो दौर-ए-तरक्की दिखती है,
वे उसके पत्थर बुनियादी थे।।
उनका नाम पिता था..........10

लोक-लाज और समाज की बातें,
हमें शिष्टाचार सिखाते थे।
अब तुम मेरी पहचान बनो,
यह कहकर जुनून जगाते थे।।

गर पहुंच गये तुम मंजिल पर,
तो मेरी मन्नत पूरी होगी।
वो खुदा-ए-रहमत बरसेगी,
क्या जन्नत से दूरी होगी?
उस हशरत का नाम पिता था......11

जिसकी मैं आंख का तारा था,
जीने का एक सहारा था।
जो कभी न हिम्मत हारा था,
वो प्राणों से भी प्यारा था।।

मुख चूम लिया मेरा तब भी,
जब सना धूल में रहता था।
सीने से लगाया था जिसने,
मुझे धूल का फूल वो कहता था।।
उनका नाम पिता था..........12

हमारे लिए दाना चुगने,
पौ फटते ही उड़ जाते थे।
भूखे-प्यासे और हारे-थके,
वो शाम को ही घर आते थे।।
घर का खर्चा चलता कैसे,
इस बात से हम निश्चिंत रहे।
वे कर्मठ और तपस्वी थे,
सफेद कपड़ों में जो संत रहे।।
उनका नाम पिता था..........13

हम रूठ गये या मचल गये,
वे हंसकर हमें मनाते थे।
मनोबल ऊंचा रखने के लिए ,
सपनों के महल बनाते थे।।

वो स्वयं विकास की सीढ़ी थे,
जिस पर चढक़र हम खड़े हुए।
वो शिल्पकार और प्रेरक थे,
जिनके कारण हम बड़े हुए।
उनका नाम पिता था..........14

वो सौम्यता की एक मूरत थे,
और उदारमना कहलाते थे।
दीन-हीन और शरण आए के,
वे मददगार बन जाते थे।।

आंखों में घूर शेर की थी,
हृदय में करूणा की गंगा।
वो ज्वालामुखी बन जाते थे,
जब लेता कोई हमसे पंगा।।
उनका नाम पिता था..........15

नित पूजा प्रभु की करते थे,
और हमसे भी करवाते थे।
देते थे दान यथा-शक्ति,
और हमसे भी दिलवाते थे।

यदि कोई अतिथि आ जाता,
तो देते थे सत्कार उसे।
जो न्याय का गला घोंटता था,
तो देते थे दुत्कार उसे।।
उनका नाम पिता था..........16

क्या पाप यहां, क्या पुण्य यहां,
इनका भी अंतर समझाया।
इंसानियत को जिंदा रखना,
निष्कर्ष धर्म का बतलाया।।

शर जमीं ये प्यारे भारत की
संस्कृति उनको प्यारी थी।
संस्कार दिये देश-भक्ति के,
वो ऐसी विभूति हमारी थी।।
उनका नाम पिता था..........17

शुचिता और सात्विकता का,
वो देते थे उपदेश हमें।
जीओ, और जीने दो सबको,
था उनका प्यारा संदेश हमें।।

सद्भाव हृदय का भूषण है,
कभी इसको तुम मत खो देना।
इस जीवन की पगडंडी पर,
बेटा! यश अपना बो देना।।
उनका नाम पिता था..........18

यदि पराक्रम को पा जाओ,
तो विनम्रता का भूषण रखना।
प्रतिशोध नही प्रतिबोध रहे,
कड़वी यादों को मत लखना।।

रखना तुम सोच सदा ऊंची,
प्रभु-कृपा को पा जाओगे।
जग में जो दिव्य कार्य है,
उनके निमित्त बन जाओगे।।
ऐसे उन्नायक का नाम पिता था..........19

वो आस-पास अब भी मेरे,
एक प्रेरक बनकर रहते हैं।
मानस के मुकुर में झांक रहे,
आगे बढऩे को कहते हैं।।

जो पंचतत्व से विरत रहा,
वो चेतन तत्व मुझे लाया।
ऐसी कोई दिव्य आत्मा थी,
जिसका मैं आत्मज कहलाया।।
उनका नाम पिता था..........20

पिता व्यक्ति नही एक शक्ति है,
जो इस धरती पर लाती है।
जीवन का दे उपहार हमें,
फिर जानें कहां चली जाती है?

निश्चिंत किया हर संकट से,
जो ढाल स्वयं बन जाते थे।
रक्षण-पोषण संवर्धन कर,
अपने सब फर्ज निभाते थे।।
उनका नाम पिता था..........21

यदि माता निर्माता होती है,
तो पिता भी हमें तराशता है।
मां से ममता और पिता से साहस,
हर बच्चे में आता है।।

तू परमपिता का रूप पिता,
मेरा तन तेरा रूप पिता।
जो संस्कारों का दाता था,
इस जीवन का निर्माता था।।
उनका नाम पिता था..........22
जो अलग-अलग भूमिकाओं में
ब्रह्मा, विष्णु और रूद्र बना।
संतान के लालन-पालन में,
कभी ब्राह्मण तो कभी शूद्र बना।।

हंसकर सब कुछ बर्दाश्त किया,
निज खंू तक का भी दान किया।
रातों की नींद गंवा डाली,
सुख-चैन का भी बलिदान दिया।
उनका नाम पिता था..........23

तू पहचान न पाया जीते जी,
वो नूर खुदा का आया था।
वह एक रूहानी ज्योति थी,
जिसने तुझको चमकाया था।।

तुम बुरा समझते रहे जिसे,
तुम्हें हीरे की तरह तराशता था।
इंसानी चोले में आया,
धरती पर एक फरिश्ता था।।
उनका नाम पिता था..........25

दुर्दशा देख इस देवता की,
मेरा हृदय भी रोता है।
जो जनक हमारा कहलाता,
वो वृद्घाश्रम में सोता है।।

है अति दुखद और लज्जाजनक,
व्यवहार जो ऐसा करते हैं।
होता है न्याय विधाता का,
आहों का दण्ड वे भरते हैं।।
क्योंकि उस पीडि़त का नाम पिता था..........26

तुम में गुण अनेक अपरिमित थे,
जो जिंदा है संस्कारों में।
जिनकी है मंद सुगंध अभी,
जीवन की मस्त बहारों में।।

हे पूज्य पिता! हे प्यारे पिता!
तू सृष्टा की शक्ति सविता।
तेरे चरणों में अर्पित है,
श्रद्घा से भरी मेरी कविता।।
ये जीवन जिनके साथ बिता था...
अरे! उनका नाम पिता था..........27

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