अनंत से अनंत की ओर : मैं छिपता हुआ सितारा हूं

  • 2016-10-14 03:30:56.0
  • विजेंदर सिंह आर्य

अनंत से अनंत की ओर : मैं छिपता हुआ सितारा हूं

(जीवन कहां से आया, और किधर जा रहा है? यह शाश्वत प्रश्न विद्वानों के लिए प्राचीन काल से एक अबूझ पहेली के रूप में उपस्थित रहा है। इस प्रश्न को अपने आपसे पूछना और उसके उत्तर पर विचार करना हर विवेकशील व्यक्ति का जीवनोद्देश्य होता है। जैसे-जैसे ये उत्तर समझ में आता जाता है, व्यक्ति के लिए यह संसार वैराग्य और विरक्ति का पर्याय बनता जाता है, उसके हृदय में यह विचार एक ज्ञान के रूप में प्रकट हो जाता है कि मैं अनंत से अनंत की ओर चलने वाला एक पथिक हूं। बस, इसी सत्य को उकेरतीं 'उगता भारत' के मुख्य संरक्षक प्रो. विजेन्द्रसिंह आर्य की ये पंक्तियां हमें बहुत कुछ बता रही हैं, मानो 'मैं' 'मैं' से बात कर रहा है-बी.एन. मिश्र, साहित्य संपादक)


गुम होता हुआ नजारा हूं,
मैं छिपता हुआ सितारा हूं....
मानस पटल पर अंकित हूं,
मैं जिस-जिस का भी प्यारा हूं............1

मैं अर्चि हूं उस ज्योति की,
जिसने ब्रह्मण्ड बनाया है।
चौबीस तत्वों का तन देकर,
सृष्टा ने मुझे सजाया है।।

मैं अनंत से अनंत की ओर चला,
मेरा अंतिम वही ठिकाना है।
मैं आनंद लोक का राही हूं,
यह देश तो मित्र बिराना है।।

तुम नीड से बिछुड़े पंछी हो,
दाने दाने पर लड़ते हो।
जड़ता के खोल में लिपटे हो,
इसलिए आपस में भिड़ते हो।।

आंतरिक सौंदर्य बेचते हो,
बाह्य प्रदर्शन करते हो।
क्या शांत और एकांत बैठकर,
आत्मस्वरूप का दर्शन करते हो

मैं ओजस्वी तेजस्वी हूं
या बुझाता हुआ अंगारा हूं
गुम होता हुआ नजारा हूं,
मैं छिपता हुआ सितारा हूं..........1
जिस दल-दल से तुम्हें निकलना था,
नित उसमें फंसते जाते हो,
स्वयं को निर्दोष समझते हो,
औरों पर हंसते जाते हो।

यह विक्षिप्तता है या नादानी,
क्या इस पर कभी विचार किया?
तूने भक्ति भलाई कितनी की,
क्या आत्मा का परिष्कार किया?

मैं कौन कहां मुझको जाना,
किसलिए यहां मैं आया था?
मैं मायाधीश को भूल गया,
बस माया को अपनाया था।।

दिग्भ्रमित हूं पथ भ्रमित हूं,
इसलिए तो मैं बेचारा हूं
गुम होता हुआ नजारा हूं
मैं छिपता हुआ सितारा हूं..........2

जीवन के बहुत बसंत गये,
अब बुढ़ापे का पतझड़ आया।
इंद्रीक्षीण बलहीन हुआ मैं,
रोगों की गड़बड़ लाया।।
गालों पर झुर्री उभर रही,
और मनस्ताप भी झलक रहा।
अपमान उपेक्षा के कारण
गम आंसू बनकर ढुलक रहा।।

कभी दिन परिवर्तन होता था,
कभी ऋतु परिवर्तन होता था।
परिवर्तन और विवर्तन से,
तन-मन परिवर्तन होता था।।

बिट्टू से बाबा बन बैठा,
मैं परिवर्तन का मारा हूं
गुम होता हुआ नजारा हूं
मैं छिपता हुआ सितारा हूं..........3
मैं अस्ताचल का सूरज हूं
यह लाली तो कुछ पल की है
हालात विकट है मृत्यु निकट,
जो स्वामिनी अतुलित बल की है।

कब मार झपट्टा प्राण हरै,
वह इसी ताक में रहती है।
जीवन को मृत्यु खाती है,
हर शाख की कलियां कहती हैं।।

मैं नदी किनारे का दरखत,
जल प्रलय में बह जाऊंगा।
क्षणभंगुर जीवन की कलिका,
संदेश यह देकर जाऊंगा।।

सब काल के गाल में बैठे हैं,
मैं प्रात:काल का तारा हूं
गुम होता हुआ नजारा हूं
मैं छिपता हुआ सितारा हूं..........4

श्वेत बाल होने तक मेरे,
क्या कर्म भी मेरे श्वेत हुए?
जो मन में शत्रु बैठे थे,
क्या वे भी कभी अचेत हुए
ये हंस सरोवर की शोभा,
क्या जीते जी कभी बन पाया?
क्या वाणी भी कभी वाक बनी
अध्यात्म का फल लगने पाया

क्या बुद्घि पुण्य में लीन रही,
क्या तन सेवा में लग पाया?
क्या ईश भजन में समय बिता,
क्या चित भी निर्मल हो पाया?

मैं जुड़ा रहा प्रभु चरणों से
इसलिए न हिम्मत हारा हूं,
गुम होता हुआ नजारा हूं
मैं छिपता हुआ सितारा हूं..........5

विजेंदर सिंह आर्य ( 326 )

उगता भारत Contributors help bring you the latest news around you.