अनंत से अनंत की ओर : मैं छिपता हुआ सितारा हूं 2

  • 2016-10-17 12:00:02.0
  • विजेंदर सिंह आर्य

अनंत से अनंत की ओर : मैं छिपता हुआ सितारा हूं 2

सदा अपयश से मैं दूर रहा,
नही मेरे धन का निधन हुआ।
मैं चला धर्म के मारग पर,
इसलिए मेरा धन धान्य हुआ।।

सद्बुद्घि और सद्भावों की,
हृदय में होती थी वृष्टि।
प्रज्ञापराध से दूर रहा,
और पवित्र रही मेरी दृष्टि।।

तेरी सृष्टि में सर्वोत्तम रचना,
मानव का मुझे शरीर मिला।
सौहार्द्र को सिंचित करता रहा,
नही अंतिम क्षण में कोई गिला।।

तू सूरज है मैं किरण तेरी,
यह रिश्ता बड़ा पुराना है।
जीवन भर इसका भान रहा,
अब तेरी शरण में आना है।।

तुझे खोज रहा हूं कण-कण में,
तेरे स्वरूप में खोना चाहता हूं।
हे प्रेरक! अंगुली थाम मेरी,
मैं तुझ सा होना चाहता हूं।।

मैं प्रेमी पागल सा बनकर
बस तेरे विरह का मारा हूं....
गुम होता हुआ नजारा हूं
मैं छिपता हुआ सितारा हूं..........6

जर्रे-जर्रे में खोज लिया,
पर खोजने से नही पाया था।।
हे रसों के रस! तुझको पाया,
जब तुझमें ध्यान लगाया था।।

कर्माशय से संसार बना,
सत्कर्मों से झोली भर लो।
अरे! अमृत-घाट पै आए हो,
तुम अमृत से गागर भर लो।।

यदि लौटे खाली हाथ सखे,
तो जनम-जनम पछताओगे।
गर पदस्खलन हो गया कहीं,
तो धीर नरक में जाआगे।

नाम जन्म स्थानों को,
प्रभु ! केवल तू ही जानता है।
तू नियंता और न्यायकारी है,
तुझे हर कोई ईशान मानता है।।

सृष्टि में चराचर जितने हैं,
सब तेरे आगे झुकते हैं।
है तुझसे ही सब गतिशील,
और तेरे संकेत से रूकते हैं।।

हे प्रभु ! मैं तेरा अंशी हूं,
मल विक्षेप के कारण न्यारा हूं....
गुम होता हुआ नजारा हूं
मैं छिपता हुआ सितारा हूं.........7

राग और द्वेष किनारे थे,
जिनमें यह जीवन बहता था।
कहीं तन्मात्राओं के भंवर पड़े,
कहीं शोकों की तपन मैं सहता था।।

बस कुछ दिन की है बात सखे।
तुम ढूढ़ोगे नहीं पाओगे।
जब याद मेरी तुम्हें आएगी,
मेरे फोटो से बतियाओगे।।

तेरा तन है ब्रह्मण्ड पिता,
मेरा तन पिण्ड कहाता है।
निर्बीज समाधि में जाकर,
कोई योगीजन तुझे पाता है।।

लग रही डोर बनकर चकोर,
मैं तुझसे मिलना चाहता हूं।
मैं सत-चित हूं तू आनंदघन,
तेरी एक बूंद को पीना चाहता हूं।।

तू मेरा है मैं तेरा हूं,
इस भाव से प्रेम पियारा हूं.......
गुम होता हुआ नजारा हूं।
मैं छिपता हुआ सितारा हूं..........8

काम क्रोध मद लोभ मोह की,
करनी तुझे निगरानी है।
धृति-क्षमा दम-शम करूणा,
प्रभुता की यही निशानी है।।

वाणी यह वाक बनानी है,
जड़ता की परत हटानी है।
विवेक की ज्योति जलानी है,
सद्भाव की फसल उगानी है।।

मदमस्त न हो धन-यौवन में,
जिंदा रखना तू मानवता।
मुखरित करना तू दिव्यता को,
जो नतमस्तक हो दानवता।।

अपने चैतन्य से दूर न हो,
नहीं जाना कभी अंधी गलियां।
तू सूर्य की रश्मि बनकर,
धरती पर खिला अनगिन कलियां।।

रखवाला तुझको भेजा है,
उस सृष्टा ने इस सृष्टि का।
तू ईश्वर का है प्रतिनिधि,
मालिक बन महान दृष्टि का।।

जिजीविषा और जिज्ञासा से,
जीवन आलोकित करना है।
चित्त की निर्मलता से बंधु,
आत्मा को पुलकित करना है।।

हे प्रेरक! मुझको भान रहे,
'मैं' तेरा ही उजियारा हूं....
गुम होता हुआ नजारा हूं
मैं छिपता हुआ सितारा हूं..........5

मन मिला प्रभु से जुडऩे को,
तन मिला है सेवा करने को।
बुद्घि मिली सुनिर्णय करने को,
धन मिला यशस्वी बनने को।।

मिला साहस गमों से लडऩे को,
अहंकार चुनौती से भिडऩे को।
प्रतिभा और पराक्रम दोनों,
पंख हैं ऊंचा उडऩे को।।

रिश्ते मिले प्रेम निभाने को,
जीवन मिला मोद मनाने को।
क्यों कोयले इसके बना रहे,
तुम्हें आएगा कौन समझाने को?

संसार बना सब तेरे लिए,
पर कुछ भी नहीं यहां तेरा है।
सब यहीं पड़ा रह जाएगा,
तू जिसको कहता मेरा है।।

जीवन का रस तो प्रेम-रस,
या शांति और आनंद को।
तू इनमें ही तन्मय रहना,
यदि पाना सच्चिदानंद को।।

तृष्णा में फंसता जाता है,
किसके लिए पाप कमाता है?
'भाव-शरीर' को निर्मल रख,
गर भगवान को पाना चाहता है।।

संकल्प सदा यह मन में रख,
मैं प्रभु पर निसारा हूं...........
गुम होता हुआ नजारा हूं
मैं छिपता हुआ सितारा हूं..........10

निसारा अर्थात समर्पित होना

विजेंदर सिंह आर्य ( 326 )

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