महदाश्चर्य

  • 2016-08-14 08:30:50.0
  • उगता भारत ब्यूरो

महदाश्चर्य

अजब हैरान हूं भगवान, तुम्हें कैसे रिझाऊं मैं।
कोई वस्तु नही ऐसी जिसे सेवा में लाऊं मैं।।

करूं किस तरह आवाह्न कि तुम सर्वत्र व्यापक हो।
निरादर है बुलाने को अगर घंटी बजाऊं मैं।।

तुम्ही हो मूरती में भी तुम्ही व्यापक हो फूलों में।
भला भगवान को भगवान पर कैसे चढ़ाऊं मैं।।

लगाना भोग कुछ तुमको ये इक अपमान करना है।
खिलाता है, जो सब जग को उसे कैसे खिलाऊं मैं।।

तुम्हारी ज्योति से रोशन हैं सूरज, चांद और तारे।
महा अंधेर है तुमको अगर दीपक दिखाऊं मैं।।

भुजाएं हैं न गरदन है न सीना है न पेशानी।
तू है निरलेप नारायण कहां चंदन लगाऊं मैं।।

बड़े नादान हैं वे जन जो गढ़ते आपकी मूरत।
बनाया विश्व को तुमने तुम्हें कैसे बनाऊं मैं।

-दीपांशु चौधरी

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