करामाती चश्मा

  • 2016-08-11 11:30:50.0
  • अमन आर्य

करामाती चश्मा

हाँ उस दिन कमाल हो गया
मैं पत्नी प्रेम से मालामाल हो गया
पत्नी ने बडे माल के बडे शोरूम से
एक चश्मा उठाया और मेरी आँखों पर लगाया
और बडे प्यार से बोली देखो जी यह पोलेरोइड ग्लास है

अब नही बिगाड सकता आपका कुछ भी वो धूप से धहकता हुआ रवि,
इस चश्मे को लगाकर आप लग रहे हो देश के बहुत बडे कवि।
फिर अपने आप ही की अपनी बढाई,
आखिर मैने भी की है आपकी जेब से कुछ कमाई।
और सामने खडे सेल्समैन से गिडगिडाई,
इक्कीस हजार तो ज्यादा हैं बीस हजार ही ले लो मैरे भाई।

इतना सुनते ही मैने उसे टोका
पर्स में घुसे हाथ को रोका
अरे भाग्यवान यह क्या कर रही हो
जीते जी मुझे अंधा कर रही हो
अगर यह करामाती चश्मा मैरी आखों पर
चढ जायेगा तो वीर शहीदों और गौ माता की कोन कह पायेगा
अरे इस देश के ज्यादातर लोग इसी चश्मे को लगाकर तो घूम रहे हैं

अरे उन्हें जमीन कब भाती है वो तो बस आसमान चूम रहे हैं।
इसीलिए श्रीमति जी मुझे तो जमीन पर रहकर ही चलना है,
अंधी गलियों में जाकर खुद दीपक की तरह जलना है।
इसलिए है प्राण प्रिय चाहे मुझसे कुछ भी करवाना
पर मैरी आखों पर यह चश्मा कभी मत लगवाना।।

-संदीप वशिष्ठ, दिल्ली
(एक कदम साहित्यिक सुचिता एवं गौ रक्षा के लिए )

अमन आर्य ( 358 )

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