'राजनीति का हिन्दूकरण' और सावरकर, भाग-8

  • 2016-08-31 02:45:39.0
  • राकेश कुमार आर्य

गीता में श्रीकृष्णजी के सारे उपदेश का सार केवल ये है कि हर मनुष्य को संसार में आकर सज्जनों के कल्याण=परित्राण और दुष्टों के विनाश (परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय दुष्कृताम्) में लगे रहना चाहिए। यदि हर व्यक्ति इस उद्देश्य के साथ जीवन संग्राम में उतरेगा तो प्रथम तो बुराई ही नही सकती और यदि आएगी तो हर व्यक्ति के सजग रहने के कारण उसको शीघ्र ही भगा दिया जाएगा या मिटा दिया जाएगा। जब हर व्यक्ति इसी लक्ष्य

के प्रति समर्पित हो जाएगा तो विश्वशांति अपने आप ही स्थापित हो जाएगी।

'परित्राणाय साधूनाम्' का फल

'परित्राणाय साधूनाम्' से पवित्रता और वैचारिक समभाव का विस्तार होता है, लोग एक दूसरे के प्रति सहयोगी और सदभावी बनते हैं, और एक दूसरे के जीवन का सम्मान करना सीखते हैं, प्राणिमात्र के प्रति दयाभावना प्रदिर्शत करना उनकी प्रवृत्ति बन जाती है। जिससे समाज में सकारात्मक विचारों की ऊर्जा का प्रवाह तीव्रता से होता है और विनाशकारी शक्तियों को सिर उठाने का अवसर ही नही मिलता। हमारी राज्य व्यवस्था का भी अंतिम लक्ष्य 'परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्' ही रहा है। इसी बात को वेद ने सृष्टि प्रारंभ में ही हमारे संविधान (वेद) के सारतत्व के रूप में 'इंद्रंवर्धन्तो अप्तुर: कृण्वन्तो विश्वमाय्र्यम् अप्घ्नन्तो अराव्ण:।'' कहकर हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है। इसमें वेद की आज्ञा है कि अच्छे लोगों का सम्मान और वृद्घि होने से तथा दुष्टों का संहार करने से ही विश्व को आर्य बनाया जा सकता है।

रामचंद्र जी समुद्र के किनारे खड़े हैं। समुद्र से बार-बार मार्ग देने का अनुरोध कर रहे हैं, पर समुद्र (संबंधित क्षेत्र का कोई ठेकेदार जैसा व्यक्ति) रास्ता देने को तैयार नही होता है। तीन दिन इसी अनुनय विनय में बीत जाते हैं। तब रामचंद्रजी लक्ष्मण जी से कहते हैं :-

''विनय न मानत जलधि जड़ गये तीन दिन बीत।

लक्ष्मण बाण संभालेहुं भय बिन होइ न प्रीत।।''

गीता, वेद, रामायण तीनों एक ही बात को अपने-अपने शब्दों से कह रहे हैं कि शांति के लिए दुष्टों का विनाश और सज्जनों का कल्याण करना आवश्यक है। दुष्ट बिना भय के सीधे रास्ते पर नही चल सकता, वह तभी प्रीत करेगा जब उसे आपके हाथ में डण्डा दिखाई देगा।

गांधीजी का वेद ज्ञान

गांधीजी वेदों के विद्वान नही थे, पर वह गीता अवश्य पढ़ते थे और देश में रामराज्य लाने की बात भी करते थे। ऐसे में उनसे वेद के आदेश को न मानने की अपेक्षा तो की जा सकती है पर गीता और राम के वचनों की उपेक्षा की अपेक्षा नही की जा सकती। परंतु सच यही है कि गांधीजी ने 'गीता' और राम के वचनों की उपेक्षा की वह बुराई को मिटाना तो चाहते थे परंतु बुराई के सामने मौन खड़े रहकर मिटाने का अतार्किक प्रयास कर रहे थे। यद्यपि पाकिस्तान उनकी इसी नीति के कारण बन गया, जिसे उन्होंने अपनी आंखों से देखा, पर फिर भी वह अपनी नीति को छोडऩे को उद्यत नही थे।

इधर सावरकर वेद, गीता और रामायण के तत्वज्ञान को भली प्रकार समझते थे, इसलिए वह उन्हीं के निर्देशों का पालन करते हुए बुराई के विनाश के लिए मैदान में उतरे। फलस्वरूप सावरकरजी ने 'राजनीति का हिंदूकरण और हिंदुओं का सैनिकीकरण' करने की बात कही। उनके इस उद्घोष के दो पक्ष हैं-(1) राजनीति का हिंदूकरण और (2) हिंदुओं का सैनिकीकरण। राजनीति का हिंदूकरण उनके उद्घोष का आध्यात्मिक पक्ष है या कहिए कि यह तैयारी है बुराई से लडऩे की। इसे वेद के 'इंद्रं वर्धन्तो अप्तुर:' के साथ समायोजित करके देखना चाहिए और गीता के 'परित्राणाय साधूनाम्' के साथ समायोजित करके देखना चाहिए। सावरकर जी का 'राजनीति का हिंदूकरण' करने का अभिप्राय वही है जो वेद के 'इंद्रं वर्धन्तो अप्तुर:' और गीता के 'साधूनाम् परित्राणाय' का है। इसी प्रकार तुलसीदास जी राम जी के मुंह से 'लक्ष्मण बाण संभालेहुं' कहलवा रहे हैं, यह भी 'राजनीति का हिंदूकरण' है क्योंकि इसका अंतिम लक्ष्य भी दुष्ट की दुष्टता का अंत कर प्रीत=शांति स्थापित करना है। इस प्रकार समीकरण यों बना :-

वेद=इंद्रं वर्धन्तो अप्तुर:

गीता= साधूनाम परित्राणाय

रामायण=लक्ष्मण बाण संभालेहुं

सावरकर=राजनीति का ंिहन्दूकरण।

अब यह देखना है कि यह समीकरण क्यों बन रहा है? इस पर हम प्रारंभ में ही प्रकाश डाल चुके हैं कि दुष्टों के संहार के लिए और शांति व्यवस्था स्थापित करने के लिए अच्छे लोगों का कल्याण=परित्राणाय=संगठनीकरण् आवश्यक है। अत: वेद, गीता, रामायण (रामचरित मानस) सावरकरजी इस पर क्या कहते हैं? यह भी इस समीकरण से स्पष्ट हो जाता है,

वेद=अप्घ्नन्तो अराव्ण:, गीता=विनाशाय च दुष्कृताम्

रामायण=भय बिन होय न प्रीत

सावरकर=हिंदुओं का सैनिकीकरण।

इस समीकरण में 'हिन्दुओं' शब्द के स्थान पर आप 'सज्जनों' शब्द रखिए। जिससे अर्थ और भी अधिक स्पष्ट हो जाएगा। इससे बना 'सज्जनों का सैनिकीकरण', अर्थात संगठनीकरण। सज्जन शक्ति का संगठनीकरण हर युग की आवश्यकता रही है, आज भी है और कल भी रहेगी। यदि यह मिट गयी तो समाज से बुराई समाप्त नही की जा सकेगी। सावरकरजी ने भारत में संदर्भ में इतिहास का बड़ा सूक्ष्मता से अध्ययन किया था। उन्होंने इतिहास के सच को समझकर ही राजनीति का हिन्दूकरण और हिन्दुओं का सैनिकीकरण करने का उद्घोष किया था। वे भारत देश के आध्यात्मिक पक्ष (अर्थात विश्व की सज्जनशक्ति का संगठनीकरण) = राजनीति का हिन्दूकरण करके उसे भौतिक पक्ष अर्थात हिंदुओं का सैनिकीकरण = (दुष्टों के संहार का उपक्रम, सैनिकीकरण का अभिप्राय किसी वर्ग विशेष के विरूद्घ युद्घ की तैयारी कदापि नही था) के साथ जोड़ देना चाहते थे।

1955 में जोधपुर में हिन्दू महासभा के अधिवेशन में भाषण देते हुए सावरकर जी ने कहा था-''जब तक देश की राजनीति का हिन्दूकरण और हिंदुओं का सैनिकीकरण नही किया जाएगा, तब तक भारत की स्वाधीनता, उसकी सीमाएं, उसकी सभ्यता व संस्कृति सुरक्षित कदापि नही रह सकेगी। मेरी हिन्दू युवकों से यही अपेक्षा कि वे अधिकाधिक संख्या में सेना में भर्ती होकर सैन्य विद्या का ज्ञान प्राप्त करें, जिससे समय पडऩे पर वे अपने देश की स्वाधीनता की रक्षा में योग दे सकें।''

हिंदुओं के सैनिकीकरण की बात सावरकर जी क्यों कह रहे थे? इसका उत्तर यही है कि प्राचीन काल से ही हिंदू स्वराष्ट्र की सेवार्थ स्वेच्छा से अपने आपको सैनिक रूप में तैयार रखता था। जब देश पर विदेशी आक्रमण आरंभ हुए तो हमारे राजाओ को उनका सामना करने के लिए इन स्वयंसेवी सैनिकों की सेवाएं अपने-आप नि:शुल्क मिल जाया करती थी। ये ऐसे सैनिक होते थे जिन्हें विशेष प्रशिक्षण की भी आवश्यकता नही होती थी। कारण कि शस्त्र निर्माण और धनुर्विद्या हमारे विद्यालयों के पाठ्यक्रम में एक अनिवार्य विषय होता था। जिसे देश प्रत्येक बालक अनिवार्यत: सीखता था। उन्होंने आचार्य लोग शास्त्रों की ऐसी सात्विक विद्या दिया करते थे, जिससे वह स्वयं की तथा दूसरों की संकटकाल में प्राणरक्षा कर सकें और निजदेश को शत्रु से सुरक्षित रख सकें। तुर्कों और मुगलों के आक्रमण के समय ऐसे कितने ही अवसर आए थे जब हमारे देश के युवाओं और योद्घाओं ने राजा की आज्ञा की प्रतीक्षा किये बिना ही या राजा के मारे जाने पर स्वयं सेना बनाई और शत्रु से भिड़ गये। देश के लिए बच्चा-बच्चा सैनिक बन गया। उस 'सैनिकीकरण' की प्रक्रिया को अपनाने से ही भारत पर्याप्त क्षति उठाकर अपना और अपने धर्म की रक्षा कर सका था।

कालांतर में जब अंग्रेज इस देश में आये तो उन्होंने 1857 की क्रांति के समय देखा कि लोग घरों में हथियार बना-बनाकर उनसे अंग्रेजों का संहार कर रहे थे, तब उन्होंने इस देश में हिन्दू के नि:शस्त्रीकरण की प्रक्रिया प्रारंभ की। इसी समय से भारत में हिंदू के लिए शस्त्र लाइसेंस की प्राप्ति अनिवार्य की, देशी हथियारों को अवैध घोषित किया गया। हमारे लिए अनिवार्य किया गया कि अंग्रेजों की कंपनी से बने हथियार ही खरीद सकेंगे, यदि कोई हथियार घर में बना मिलता है तो उसे अवैध घोषित किया जाएगा और ऐसे हथियार रखने वाले व्यक्ति के विरूद्घ कानूनी कार्यवाही की जाएगी। यहां से हिंदू का सैनिकीकरण अभियान बाधित हो गया। अब यदि हम थोड़ा अपने क्रांतिकारी इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि हमारे क्रांतिकारियों ने (जिसमें सावरकर जी भी सम्मिलित थे) हिंदू के सैनिकीकरण अभियान को निरंतर जारी रखा, और उसी के परिणामस्वरूप देश के हजारों लाखों युवकों में आजाद हिंद फौज जैसी कई छोटी बड़ी सेनाएं तैयार कर लीं। परिणामस्वरूप अंग्रेजों को देश छोडक़र भागना पड़ा।

किसी भी देश को और उसकी संस्कृति को खतरा सदा ही बना रहा है। देश की स्वतंत्रता के पश्चात गांधीजी और उनकी कांग्रेस को लगा था कि अब संकट टल गया है, पर संकट टला नही था।

वह नये रूप में हमारे सामने खड़ा था। जिसके समाधान के लिए सावरकरजी ने इस देश के युवाओ का आह्वान किया कि देश की रक्षा के लिए अधिकाधिक संख्या में सेना में जाएं। जिससे समय पडऩे पर वे अपने देश की स्वाधीनता की रक्षा में योग दे सकें।

सावरकर जी का हिंदुओं के सैनिकीकरण का उद्देश्य भारत देश की संस्कृति और धर्म की रक्षा करना था-''प्रत्येक विद्यापीठ, विद्यालय, महाविद्यालय में अनिवार्य सैनिक शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए, जिससे हमारे युवक नाविक वैमानिक तथा सैनिक क्षेत्रों में निपुणता प्राप्त कर सकें।'' (वीर वाणी पृ. 78)

15 जनवरी 1961 को उन्होंने पुणे में आयोजित स्वागत समारोह में बोलते हुए कहा था-''मुझे राष्ट्राध्यक्ष होने की किंचित भी अभिलाशा नही है, फिर भी कल्पना करो कि सत्ता हस्तगत हुई और जनता ने साथ दिया तो केवल दो वर्ष के अंदर-अंदर भारत को खु्रश्चेव व रूस से भी प्रबल व श्ािक्तशाली कर दिखाऊंगा। आधुनिकता शास्त्रास्त्रों से लैस सेना से देश की शक्ति बढ़ाऊंगा, और फिर यदि वैसा ही समय आया तो आवश्यकता पडऩे पर जिस प्रकार खु्रश्चेव ने राष्ट्रसंघ में अपना जूता हाथ में लिया था ठीक उसी प्रकार अपना बूट हाथ में लूंगा। किसी देश की धाक उसकी सैनिक क्षमता पर निर्भर करती है। ख्रुश्चेव व रूस की धाक रूस के अणुअस्त्रों के कारण ही है।''

नायक को ऐसी ही ओजस्वी वाणी से राष्ट्र का संबोधन और मार्गदर्शन करना चाहिए। दुर्भाग्य रहा इस देश का कि कांग्रेसी सरकारों के किसी भी प्रधानमंत्री ने ऐसी ओजस्विता का प्रदर्शन कभी नही किया। विशेषत: नेहरू जी ने तो कभी नही। वह तो गांधीजी की अहिंसा के दीवाने थे इसलिए पूरे देश के लिए ही 'नि:शस्त्रीकरण' की प्रक्रिया लागू कर बैठे। उन्हें लगता था कि अहिंसा से जैसे आजादी लेली वैसे ही देश की रक्षा भी हो जाएगी। उपरोक्त समारोह में बोलते हुए ही सावरकर जी ने कहा था-

'देश स्वतंत्र हुआ किंतु आगे क्या होगा? यह प्रश्न आज हम सबके समक्ष खड़ा है। प्राप्त स्वतंत्रता की रक्षा का दायित्व देश के नवयुवकों पर है। देश के नौजवान जल सेना, भू सेना और वायुसेना में प्रयत्नत: प्रवेश करे अद्यावत शस्त्रास्त्र उपलब्ध है उन्हें आत्मसात करें स्वयं नवीन अस्त्रों की खोज करें, भीरू या डरपोक लोग यह नही कर सकेंगे। हम आज नवीन कारखाने खोल रहे हैं सडक़ें बना रहे हैं, परंतु राष्ट्र पर संकट के समय आधुनिकतम शस्त्रास्त्रों की ही आवश्यकता होगी। शक्तिशाली सेना है काम आएगी। हम जनतंत्र की बातें कर रहे हैं, किंतु प्रबल सेना के बिना तो जनतंत्र भी नही टिक पाएगा।'

कितना व्यावहारिक दृष्टिकोण था सावरकर जी का जिस बात को वह वर्षों पूर्व समझ रहे थे उसे गांधीजी और नेहरूजी जीवन भर नही समझ पाये जब 1962 में चीन से ठोकर लगी तो फटे पांव को पकडक़र रोने लगे। अच्छा होता कि समय रहते चेत जाते और सावरकर जी की बात मान लेते। दूरदृष्टा सावरकर को नमन।