एशिया में बनता-उभरता तनाव का त्रिकोण

  • 2016-12-07 11:00:51.0
  • संजीव पांडेय

एशिया में बनता-उभरता तनाव का त्रिकोण

वैसे तो पीठ थपथपाने के लिए यह काफी है कि अमृतसर में आयोजित 'हार्ट ऑफ एशिया' सम्मेलन में पाकिस्तान आतंकवाद के मसले पर अलग-थलग पड़ गया। 'अमृतसर घोषणापत्र' में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का खुलकर उल्लेख हुआ। गोवा में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में भारत को खास सफलता नहीं मिली थी। गोवा घोषणापत्र में पाकिस्तान को भारत घेर नहीं पाया था क्योंकि चीन पाकिस्तान के बचाव की खातिर दबाव बनाने में कामयाब हो गया था। जबकि 'हार्ट ऑफ एशिया' में आतंकवाद पर पाकिस्तान को घेरने में भारत सफल रहा। पर सवाल यह है कि क्या सिर्फ घोषणापत्रों में घेरे जाने से पाकिस्तान सुधर जाएगा? अमृतसर में हुए इस सम्मेलन में मुख्य मुद््दा आतंकवाद और नशीले पदार्थों की तस्करी पर रोक, व्यापार व निवेश में बढ़ोतरी, क्षेत्रीय आधारभूत संरचना का विकास और शिक्षा था।


हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन शुरू करने का मुख्य उद््देश्य अफगानिस्तान से 2014 तक अमेरिकी फौजों के लौटने के बाद अफगानिस्तान और इसके पड़ोसी मुल्कों के बीच आर्थिक विकास और क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग को बढ़ाना है। क्षेत्रीय सहयोग और सुरक्षा के केंद्र में अफगानिस्तान है। लेकिन अभी तक सम्मेलन रस्म अदायगी मात्र है। अफगानिस्तान में तालिबान के हमले बढ़े हैं। वहां की सरकार की मुसीबत बढ़ी है। अफगानिस्तान के आर्थिक विकास में क्षेत्रीय सहयोग न के बराबर है। अपने सैन्य-खर्च से लेकर तमाम विकास कार्यों के लिए अफगान सरकार को यूरोपीय संघ और अमेरिका की सहायता-राशि पर निर्भर करना पड़ रहा है।जहां तक अफगानिस्तान और इसके पड़ोसी मुल्कों के बीच आर्थिक विकास और क्षेत्रीय सहयोग की बात है, यह तभी संभव है जब हार्ट ऑफ एशिया के महत्त्वपूर्ण सदस्य-देशों के बीच तनाव कम हो। लेकिन इसकी संभावना फिलहाल नहीं दिखती। क्योंकि चीन और पाकिस्तान, भारत को अफगानिस्तान की विकास-प्रक्रिया से बाहर करना चाहते हैं। यही नहीं, ये दोनों मुल्क दक्षिण एशिया में भारत की भूमिका को कम करना चाहते हैं। चीन और पाकिस्तान से भारत का तनाव क्षेत्रीय विकास और सहयोग में मुख्य बाधा है। पाकिस्तान अफगानिस्तान के साथ आर्थिक सहयोग तो चाहता है, लेकिन अफगानिस्तान और भारत के बीच होने वाले व्यापार में सेतु बनने को तैयार नहीं है। क्षेत्रीय आर्थिक विकास की बात हो रही है, लेकिन भारत और पाकिस्तान के बीच खराब संबंधों के बीच यह संभव नहीं है।

हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन को अमृतसर में आयोजित किए जाने के पीछे भारत का उद््देश्य साफ था। अमृतसर दक्षिण एशिया का महत्त्वपूर्ण व्यापारिक रास्ता है। यहां से लाहौर, इस्लामाबाद और काबुल का रास्ता खुलता है। कोलकाता और ढाका का रास्ता भी। भारत ने संकेत दिया कि अमृतसर दक्षिण एशिया में आर्थिक सहयोग बढ़ाने का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र है, जिसका महत्त्व भारत में इस्लामिक काल से है। यह पाकिस्तान की सांस्कृतिक राजधानी लाहौर से मात्र चालीस किलोमीटर की दूरी पर है और शेरशाह सूरी द्वारा निर्मित ग्रैंड ट्रंक रोड पर स्थित है।लेकिन पाकिस्तान ने तय कर रखा है कि वह एशियाई विकास में भारतीय भागीदारी को स्वीकार नहीं करेगा। इसका उदाहरण भारत और अफगानिस्तान के पाकिस्तान के रास्ते व्यापार को रोकना है।
हालांकि अफगानिस्तान कुछ चुनिंदा वस्तुएं पाकिस्तान के रास्ते भारत भेज सकता है, लेकिन भारत से कोई सामान पाकिस्तान के रास्ते नहीं मंगवा सकता। जबकि अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच 2010 में पारगमन व्यापार संधि हो चुकी है। अफगानिस्तान इसके तहत पाकिस्तान के ग्वादर और कराची के रास्ते कोई भी सामान मंगवा सकता है। आज भी अफगानिस्तान से भारत के व्यापारिक संबंध ईरानी बंदरगाहों के रास्ते हैं।

निश्चय ही सम्मेलन में आतंकवाद के मुद््दे पर पाकिस्तान घिर गया। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के विदेश मामलों के सलाहकार सरताज अजीज के सामने अपनी पीड़ा रखी। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान अफगानिस्तान के अंदर आतंकियों की मदद कर रहा है। लेकिन लगता नहीं कि इससे पाकिस्तानी सेना के रवैए में कोई बदलाव आएगा। भारत और अफगानिस्तान को छद्म युद्ध में उलझाए रखना पाकिस्तानी सेना की फितरत है। इसमें निकट भविष्य में कोई परिवर्तन आने के आसार नहीं हैं। अफगानिस्तान में शांति बहाली में पाकिस्तान ने मध्यस्थता की। पाकिस्तान के प्रयासों से अफगान सरकार और तालिबान बातचीत के लिए राजी हो गए। इसी बीच तालिबान के हमले अफगानिस्तान में बढ़ गए। पिछले दो साल में तालिबान के हमले में अफगान नेशनल आर्मी के दस हजार से ज्यादा जवान शहीद हुए हैं।

अफगानिस्तान के सौ से ज्यादा जिलों में पाकिस्तान समर्थित तालिबान लड़ाकों का प्रभाव बढ़ गया है। हेलमंड, कंधार और गजनी के कई शहरों को तालिबान लड़ाकों ने चारों तरफ से घेर रखा है। इन राज्यों में अफगान सेना की हालत खराब है। अशरफ गनी ने अमृतसर में कहा कि पाकिस्तान में छिपा तालिबान अफगानिस्तान में आतंकी घटनाओं को लगातार अंजाम दे रहा है।
हार्ट ऑफ एशिया के एजेंडे में नशीले पदार्थों की तस्करी रोकना एक अहम मुद््दा है। अफीम की खेती का केंद्र अफगानिस्तान है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान में सक्रिय आतंकी संगठनों की फंडिग का मुख्य स्रोत अफगानिस्तान में होने वाली अफीम की खेती है। इस समय अफगानिस्तान में लगभग छह लाख हेक्टेयर जमीन में अफीम की खेती हो रही है। वहां अफीम का सालाना उत्पादन दस हजार टन के करीब पहुंच चुका है। जिन इलाकों में अफीम की खेती हो रही है वहां अफगान सरकार के पैर उखड़ चुके हैं।

सालाना अ_ाईस अरब डॉलर के नशीले पदार्थ पाकिस्तान के रास्ते दुनिया के तमाम मुल्कों में जाते हैं। नशे के कारोबार पर पूरी तरह से तालिबान और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों का कब्जा है। नशीले पदार्थों के व्यापारिक रूट को पाकिस्तान नियंत्रित करता है। पाकिस्तानी खुफिया एंजेसी को नशीले पदार्थों की तस्करी से बड़े पैमाने पर 'चुंगी' मिलती है, जो कि सालाना एक अरब डॉलर तक पहुंच जाती है। इस पैसे का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों में होता है। नशीले पदार्थों की तस्करी पर भी नियंत्रण तभी होगा जब पाकिस्तान से खुला सहयोग मिलेगा।
हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन में आतंकवाद पर पाकिस्तान को घेरने में बेशक हम कामयाब हो गए, लेकिन कागजों में पाकिस्तान को अकेले करना सिर्फ खबर बन सकता है। इसे हम नजरअंदाज नहीं कर सकते कि पाकिस्तान को चीन के बाद रूस का भी सहयोग मिलना शुरू हो गया है। रूस पाकिस्तान के सामरिक केंद्रों का इस्तेमाल करना चाहता है। पाकिस्तान ने रूस को ग्वादर बंदरगाह इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी है। उधर चीन 'वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट' के द्वारा पूरे एशिया को घेरने की कोशिश में है। चीन अपनी शर्तों पर भारत को इसमें सहयोगी बनाना चाहता है। चीन पूरे एशियाई क्षेत्र में समग्र विकास की बात कर रहा है, पर इसमें भारत की भूमिका न के बराबर रखना चाहता है।

भारत के विरोध के बावजूद चीन ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के अंदर कई विकास योजनाओं में निवेश शुरू कर दिया है, इस क्षेत्र को वन बेल्ट वन रोड परियोजना का हिस्सा बना लिया है। ग्वादर से काशगर तक बनने वाले चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर के बहाने चीन भारत को घेर रहा है। चीन ने पाकिस्तान में 52 अरब डॉलर निवेश की घोषणा की है। ग्वादर बंदरगाह को व्यापार के साथ-साथ चीन सैन्य जरूरतों के हिसाब से भी इस्तेमाल करने वाला है। हाल ही में ग्वादर बंदरगाह पर चीनी पनडुब्बियों की गतिविधियां देखी गईं। पाकिस्तान की तर्ज पर चीन अफगानिस्तान में वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट का विस्तार चाहता है। चीन इसीलिए तालिबान से शांति वार्ता का समर्थक है। लेकिन चीन भारत को अफगानिस्तान से बाहर करने के पाकिस्तानी कुचक्र में सहयोगी है।