भूमंडलीकरण पर हो नव विमर्श

  • 2016-09-08 06:30:18.0
  • डॉ. अश्विनी महाजन

भूमंडलीकरण पर हो नव विमर्श

आज जब अमरीका और यूरोप में भूमंडलीकरण विफल हो रहा है और वहां के लोग भूमंडलीकरण से निजात पाने की कोशिश में हैं, दुर्भाग्य का विषय है कि भारत के नीति-निर्माता अभी भी भूमंडलीकरण के गुणगान में व्यस्त हैं और देश के विकास के विदेशी पूंजी, विदेशी आयात, विदेशी टेक्नोलॉजी और विदेशी सोच की अनिवार्यता से अभिभूत हैं। आज समय आ गया है कि हमारे नीति-निर्माता वैश्विक पटल पर भूमंडलीकरण से होने वाले नुकसानों को भलीभांति समझते हुए देश की अर्थव्यवस्था को सही दिशा प्रदान करने का काम करें.


जून 2016 को ब्रिटेन द्वारा यूरोपीय संघ से अलग होने वाले (ब्रैक्जिट) जनमत संग्रह के फैसले ने दुनिया को हतप्रभ कर दिया। आर्थिक और राजनीतिक पंडित जनता के फैसले को समझ ही नहीं पाए। फैसले के बाद यह कहा जाने लगा कि ब्रिटेन के इस फैसले से उसे भारी नुकसान होगा। फैसले के बाद पाउंड के अवमूल्यन और शेयर बाजारों में आई गिरावट के चलते आर्थिक पंडितों की राय मानो सही सी भी लगने लगी। यह कहा जाने लगा कि ब्रिटेन के विदेशी व्यापार को धक्का लगेगा, क्योंकि ब्रिटेन का 55 प्रतिशत विदेशी व्यापार तो यूरोपीय समुदाय के देशों के साथ ही होता है। लेकिन यह एकतरफा नहीं था। यूरोपीय संघ को भी डर सताने लगा कि इतने बड़े सदस्य देश के बिछुडऩे के बाद उसका भविष्य अधर में लटक जाएगा। हालांकि ब्रिटेन की जनता के इस फैसले के बाद उसे यूरोपीय संघ से अलग होने में दो साल से अधिक का समय लग सकता है, लेकिन इस फैसले से गुस्साए यूरोपीय संघ ने यह कहना शुरू कर दिया कि ब्रिटेन तुरंत यूरोपीय संघ से अलग हो जाए।

क्या था अंडर करंट?
चुनाव हो या जनमत संग्रह, उसके नतीजों के पीछे एक अंडर करंट होता है, जिसका सही जायजा नतीजों के आने के बाद ही लग पाता है। कहते हैं कि जनमत संग्रह में बुजुर्गों ने यूरोपीय संघ से अलग होने के लिए वोट दिया और युवाओं ने यूरोपीय संघ में शामिल रहने के पक्ष में वोट डाला। इसके पीछे का कारण शायद यह रहा होगा कि पिछले लगभग 10 सालों से बुजुर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा बाधित हुई है, लेकिन यह विश्लेषण भी पूरा चित्र स्पष्ट नहीं करता। हम देखते हैं कि केवल तीन क्षेत्रों-स्कॉटलैंड, आयरलैंड और लंदन ने यूरोपीय संघ के पक्ष में और नौ ने उसके विरोध में वोट डाला।

कुछ वर्ष पूर्व ग्रीस द्वारा अपनी देनदारियां चुकता न कर पाने के कारण यूरोपीय संघ और कर्जदाता देशों द्वारा कटौती की शर्तों से नाराज उसने यूरोपीय संघ से अलग होने का फैसला लगभग ले ही लिया था और अभी भी ग्रीस के लोग यूरोपीय संघ से लगातार नाराज ही दिखते हैं। लंबे संमय से कठिनाइयों से गुजर रहे पुर्तगाल, आयरलैंड, स्पेन, साइप्रस समेत कई यूरोपीय देश यूरोपीय संघ से उकता रहे हैं और यूरो जोन और यूरोपीय संघ दोनों से अलग होने की बात सोच रहे हैं। भूमंडलीकरण के नाम पर देशों के बीच दीवारों को खत्म करने की कवायद में यूरोपीय संघ के निर्माण के बाद कई दशकों तक सदस्य देशों को कोई विशेष कठिनाई नहीं आई। लेकिन वर्ष 2008 के बाद आई मंदी ने कई देशों को लगभग खोखला कर दिया है। इन देशों में आर्थिक गतिविधियां बाधित हुई हैं, गरीबी और बेरोजगारी बढ़ी है, कर्ज बढ़ा है, सरकारों का राजस्व भी घटा है और इस कारण से पेंशन और अन्य सामाजिक सुरक्षा खर्च में कटौतियां होने लगी हैं।

हालिया शोध के अनुसार वर्ष 2008 के बाद ग्रीस, इटली, साइप्रस, स्पेन, पुर्तगाल इत्यादि में गरीबी सोवियत रूस से अलग हुए देशों की उस समय की गरीबी से भी ज्यादा हो गई है। अब यूरोपीय संघ कह रहा है कि 200 लाख लोगों को गरीबी से उबारा जाएगा, लेकिन यूरोपीय संघ के कई सदस्य देशों, खास तौर पर दक्षिण यूरोप में तो गरीबी में बेतहाशा वृद्धि हो रही है। हालांकि 2008 से 2011 के बीच गरीबी लगभग पूरे यूरोप में ही बढ़ी है। ऐसे में ब्रैक्जिट का नतीजा, दक्षिण यूरोप के देशों में अलग होने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दे सकता है।

अमरीका में भी है असंतोष
बाहरी दुनिया में ऐसा लगता है कि राष्ट्रपति पद के रिपब्लिकन दावेदार डोनाल्ड ट्रंप के मुस्लिमों और प्रवासियों के खिलाफ बयानबाजी ही अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव को प्रभावित कर रही है, लेकिन अमरीका में बढ़ती विषमताएं और गिरता आर्थिक ग्राफ वास्तविक मुद्दों के रूप में उभर रहे हैं। ट्रंप का यह कहना है कि अमरीका में बढ़ती बेरोजगारी और आर्थिक विषमताओं के पीछे गलत आर्थिक नीतियां ही हैं। भूमंडलीकरण के नाम पर चीन से सस्ते सामानों के आयात के कारण रोजगार घट रहे हैं। ट्रंप का यह तर्क हाल ही में प्रकाशित शोध से पुष्ट होता है कि 1999 और 2011 के बीच चीनी आयात के चलते 24 लाख रोजगार के अवसर घटे। श्रमिकों को वैकल्पिक रोजगार नहीं मिला, जिसके कारण उनकी आर्थिक हालत कमजोर हुई। दुनिया भर में विदेशी व्यापार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और मंदी के चलते पूरी दुनिया में विदेशी व्यापार मानों स्थिर हो गया है और उसमें वृद्धि नहीं हो रही। ऐसे में उद्योग और सेवा क्षेत्र में विकास की संभावनाएं समाप्त हो रही हैं। अमरीकी केंद्रीय बैंक 'फेडरल रिजर्व' के पास नीतिगत विकल्प नहीं हैं कि वह उपभोक्ता मांग या निवेश को बढ़ा सके। अमरीकी सरकार के पास और ज्यादा 'बेल आउट' पैकेज देने की क्षमता भी नहीं है। पहले यह कहा जाता था कि प्रौद्योगिकी के विकास से रोजगार के अवसर जुटाए जा सकेंगे, लेकिन यह बात असत्य सिद्ध हो रही है। अमरीकी विशेषज्ञ यह मान रहे हैं कि प्रौद्योगिकी के विकास ने रोजगार घटाया है। इसका सीधा असर आय के वितरण पर पड़ा है। ऊपर के 20 प्रतिशत गृहस्थों के पास पहले 44.3 प्रतिशत आय होती थी, जो बढक़र अब 49 प्रतिशत हो गई है। जीडीपी में मजदूरी का हिस्सा 2000 में 66 प्रतिशत से घटकर अब मात्र 61 प्रतिशत रह गया है यानी कहा जा सकता है कि अमीर और ज्यादा अमीर हो रहे हैं और गरीब पहले से ज्यादा गरीब हुए हैं।

यूरोप के बहुसंख्यक लोग बेरोजगार और गरीब हो रहे हैं और अमरीका में भी आज गरीबों की हालत और खराब हो रही है। आज यूरोप के विभिन्न देशों में युवा बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है। स्पेन और ग्रीस में लगभग 50 प्रतिशत युवा बेरोजगार हैं, जबकि इटली में 43 प्रतिशत, साइप्रस में 34 प्रतिशत और पुर्तगाल में 32.6 प्रतिशत युवा बेरोजगार हैं। इंग्लैंड में भी 16 प्रतिशत युवा बेरोजगार हैं।

अमरीका में कई लोग महंगी दवाओं और महंगी स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण कई बार अपना इलाज भी भलीभांति नहीं करवा पाते। यूरोप और अमरीका में बेरोजगार युवा बेरोजगारी भत्ते पर आश्रित है। अमरीका और यूरोप के देशों के बहुसंख्यक लोग अब भूमंडलीकरण से परेशान हैं और अपना पुराना वैभव दोबारा प्राप्त करना चाहते हैं, लेकिन वहां की सरकारें इस बात के लिए तैयार नहीं है। उन सरकारों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियां हावी हैं। ऐसे में अमरीका और यूरोप में लोकतांत्रिक व्यवस्था के माध्यम से सरकारों पर यह दबाव बनना स्वाभाविक ही है कि भूमंडलीकरण के नाम पर गरीबों और वंचितों का शोषण बंद हो। इस संदर्भ में रिपब्लिकन पार्टी उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप का यह कथन उल्लेखनीय है कि 'वह भूमंडलीकरण के बजाय अमरीकीकरण को तरजीह देंगे'। आज जब अमरीका और यूरोप में भूमंडलीकरण विफल हो रहा है और वहां के लोग भूमंडलीकरण से निजात पाने की कोशिश में हैं, दुर्भाग्य का विषय है कि भारत के नीति-निर्माता अभी भी भूमंडलीकरण के गुणगान में व्यस्त हैं और देश के विकास के विदेशी पूंजी, विदेशी आयात, विदेशी टेक्नोलॉजी और विदेशी सोच की अनिवार्यता से अभिभूत हैं। आज समय आ गया है कि हमारे नीति-निर्माता वैश्विक पटल पर भूमंडलीकरण से होने वाले नुकसानों को भलीभांति समझते हुए देश की अर्थव्यवस्था को सही दिशा प्रदान करने का काम करें।