जेंडर बजट की जरूरत

  • 2016-08-31 09:30:50.0
  • उगता भारत ब्यूरो

जेंडर बजट की जरूरत

आश्चर्य, भारत को सिंधू, साक्षी और कर्मकार के रूप में जेंडर चैंपियन तो मिल गईं, रियो में अन्य महिला भागीदारों की आंखों में तैरते सफलता के सपनों की कशिश भी देश ने शिद््दत से महसूस की, हालांकि तब भी जेंडर बजट का मुद््दा हमारी चर्चा से नदारद है। बेशक, ओलंपिक बाद के तमाम विश्लेषणों के केंद्र में खिलाडिय़ों की तैयारी पर होने वाले खर्च का आंकड़ा जरूर उद्धृत हो रहा है। ओलंपिक के दौरान ही पटियाला में राष्ट्रीय

स्तर की हैंडबॉल की एक लडक़ी ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिख कर इसलिए आत्महत्या कर ली कि उसे कॉलेज के छात्रावास में रहने की जगह नहीं दी गई, जबकि उसके पिता घर से रोज उसके आने-जाने का लगभग तीन हजार महीने का खर्च उठाने में असमर्थ थे। पिछले दिनों महाराष्ट्र के एक गांव में पंद्रह वर्षीय कबड््डी खिलाड़ी की अभ्यास से लौटते हुए स्थानीय लम्पटों ने सामूहिक बलात्कार के बाद हत्या कर दी। क्या शौचस्थलों के बाद
क्रीड़ास्थल भी गांवों में यौन अपराधों के अड््डे बनते जा रहे हैं? पिछले वर्ष केरल के साई हॉस्टल में रहने वाली ग्रामीण पृष्ठभूमि की तीन व्यथित तैराक लड़कियों ने आत्महत्या कर ली थी। उनसे दुव्र्यवहार के आरोपों की पृष्ठभूमि में साई ने एक आंतरिक जांच बिठाई, जिसकी प्रगति को आज तक बाहर साझा नहीं किया गया। ऐसे सैकड़ों-हजारों दृष्टांत हैं जो खेलों में जेंडर बजट के मोहताज हैं। इस माहौल में, रियो ओलंपिक में
महज लड़कियों के ही खाते में दो पदकआने से आम भारतीय बेहद भावुक हो उठा है। वह इस तर्क का कायल लगता है कि एक मध्यवर्गीय खेल परिवार की बेटी (पीवी सिंधू), एक किसान पृष्ठभूमि की बेटी (साक्षी मलिक) और एक श्रमिक की बेटी (दीपा कर्मकार) के ओलंपिक में क्रमश: रजत पदक, कांस्य पदकऔर चौथे स्थान की कीमत भारत जैसे देश के लिए कई-कई स्वर्ण पदकों जितनी होनी चाहिए! आखिर भारत वह देश है जहां एक ओर आम किसान-श्रमिक का जीवन
कर्ज और शोषण से भरा रहता है और दूसरी ओर पूंजीशाहों को देश के लाखों करोड़ हड़पने दिए जाते हैं। जबकि साक्षी मलिक के गांव मोखरा खास (रोहतक, हरियाणा) में लिंग अनुपात है एक हजार पुरुषों के पीछे आठ सौ स्त्रियों का! नीतिकारों-योजनाकारों और शासकों-प्रशासकों का समूह ही खेल की दुनिया में भी महिलाओं को जेंडर बजटिंग से वंचित रखे हुए है। तमाम सभ्य संसार में महिलाओं को समान अवसर सामाजिक सुरक्षा देने और यौनिक
हिंसा के विरुद्ध सुरक्षा-हर्जाना-परामर्श कवच के रूप में जेंडर बजटिंग की अवधारणा एक सफल रणनीति की तरह इस्तेमाल हो रही है। क्या हमारे पास धन की कमी है? 'निर्भया फंड' में पिछले तीन वर्षों में तीन हजार करोड़ रुपए जमा हो चुके हैं, पर जुमलेबाजी से सरकारों को इतनी भी फुरसत नहीं कि इस मद से एक पैसा भी खर्च कर सकें। अन्यथा, देश की बेटियों ने शायद मेडल की बाढ़ लाने की जिद बेहतर निभाई होती! साक्षी मालिक ने
रियो में पदक जीतने पर कहा कि पहलवान बनने का निर्णय उसका अपना निर्णय था और ओलंपिक का सपना उसने बारह वर्ष जिया। दरअसल, भारतीय स्त्रियों ने शिक्षा के मोर्चे पर डटने के बाद खेल के मैदान को लैंगिक